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विश्व गैंडा दिवस 2025: वन्यजीव संरक्षण की अद्भुत सफलता का पैमाना बना असम का काजीरंगा नेशनल पार्क, यहाँ दुनिया के 70% एक सींग वाले गैंडों का बसेरा

भारत में एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण की कहानी विलुप्ति के कगार पर पहुँचने से लेकर आज 4,000 से अधिक समृद्ध आबादी तक पहुँचने तक एक चमत्कार से कम नहीं है।

हर साल 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को इस बात के लिए जागरूक करना है कि धरती के सबसे प्राचीन और प्रतीकात्मक जीवों में से एक गैंडे का संरक्षण कितना जरूरी है।

यह दिवस इस बात पर भी जोर देता है कि गैंडे की आबादी को बचाए रखना पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक धरोहर और जंगलों के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह पूरी दुनिया से गैंडे की रक्षा की मुहिम में हाथ मिलाने की अपील है।

विश्व गैंडा दिवस की शुरुआत 2010 में हुई, जब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-साउथ अफ्रीका (WWF-South Africa) ने इसे एक एक्शन डे के रूप में घोषित किया। इसके अगले ही साल 2011 में इसे वैश्विक पहचान मिली। इसका श्रेय वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं लिसा जेन कैंपबेल और रिश्जा को जाता है, जिन्होंने इसे पूरी दुनिया तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

ब्लैक, व्हाइट, ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (भारतीय), जावन और सुमात्रन ये गैंडे की आखिरी बची हुई पाँच प्रजातियाँ हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि ये सभी विलुप्ति के कगार पर हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, सींगों के लिए शिकार (Poaching), गैरकानूनी वन्यजीव व्यापार और वनों की कटाई व मानव बस्तियों के फैलाव से आवास का नष्ट होना।

विश्व में गैंडों की पांच प्रजातियां (फोटो साभार : बेबी राइनो रेस्क्यू)

विश्व गैंडा दिवस मनाकर दुनिया इन खतरों पर रोशनी डालती है और ठोस कदम उठाने की अपील करती है, चाहे वह शिकार पर रोक अभियान हों, आवास संरक्षण हो या फिर कड़े कानूनों का सख्ती से पालन।

इन्हीं अंतरराष्ट्रीय कहानियों के बीच भारत की धरती पर एक अलग ही अध्याय लिखा गया है। वो अध्याय है काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का, जहाँ गैंडों ने वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय वापसी (Turnaround) की मिसाल पेश की है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान: 12 गैंडों से बढ़कर 3,000 से अधिक

20वीं सदी की शुरुआत में असम के काजीरंगा की स्थिति बेहद चिंताजनक थी। 1908 में यहाँ ग्रेटर वन-हॉर्न्ड (एक सींग वाले) गैंडों की संख्या घटकर सिर्फ 12 रह गई थी। सदियों से चले आ रहे मनोरंजन के लिए शिकार, अवैध शिकार (Poaching) और आवास के विनाश ने इस प्रजाति को विलुप्ति की कगार पर पहुँचा दिया था।

(फोटो साभार – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान)

खतरा इतना गंभीर था कि 1986 में भारतीय गैंडों को संकटग्रस्त (Endangered) घोषित कर दिया गया। उनका विशिष्ट एकल सींग, जिसे काले बाजार में स्टेटस सिंबल माना जाता था और उनका प्रागैतिहासिक रूप हमेशा उन्हें खतरे में डालता रहा।

रिपोर्टों के अनुसार, औपनिवेशिक काल में खासकर 1800 के आकीर समय में और 1900 के शुरुआती दशकों में असम में ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने मनोरंजन के लिए 200 से अधिक गैंडों का शिकार किया।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की सफलता की कहानी पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि असम में गैंडों की संख्या 600 से बढ़कर 4,000 से अधिक हो चुकी है।

उन्होंने कहा “#WorldRhinoDay पर हम गैंडे के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। ऑप फाल्कन (Op Falcon), आवास विस्तार और उन्नत मॉनिटरिंग जैसी पहलों के जरिए असम ने गैंडे की आबादी 600 से बढ़ाकर 4,000 से अधिक की है और हम इस दिशा में और आगे बढ़ने के लिए संकल्पित हैं।”

यह परिवर्तन विश्व के सबसे बड़े वन्यजीव संरक्षण सफलताओं में से एक माना जाता है। काजीरंगा में गैंडे अब विलुप्ति के कगार पर नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह फल-फूल रहे हैं। असम आज इस प्रजाति के लिए वैश्विक मजबूत केंद्र (Global Stronghold) बन चुका है।

वैश्विक स्तर पर गैंडे के शिकार (poaching) के खिलाफ एक भावनात्मक और प्रभावशाली संदेश देने के लिए असम सरकार ने 2022 में ‘दहा संस्कार’ यानी मृत गैंडों का पूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया।

यह संदेश देने के लिए कि गैंडे असम में परिवार के समान हैं, सरकार ने दशकों से जब्त किए गए 2479 गैंडे के सींगों का दाह संस्कार भी किया, जो शिकार मामलों की कानूनी कार्रवाई के दौरान संग्रहित थे। इस संस्कार का उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि गैंडे के सींगों का कोई औषधीय मूल्य नहीं है, बल्कि ये असम के बच्चों के अवशेष हैं, जिनका जीवन शिकारियों के कारण समय से पहले समाप्त हो गया।

गैंडे लगभग विलुप्त क्यों हो गए?

असम में गैंडों की आबादी में गिरावट का मुख्य कारण मनोरंजन के लिए शिकार (Sport Hunting) था। राजघरानों और ब्रिटिश अधिकारियों ने गैंडों का निरंतर शिकार किया और उन्हें अपने ट्रॉफी के रूप में रखा। 1908 तक काजीरंगा में केवल कुछ ही गैंडे बचे थे।

साथ ही सींगों के लिए शिकार (Rhino Horn Poaching) भी एक लगातार बनी रहने वाली समस्या रही है। 20वीं सदी की शुरुआत में भी शिकारियों ने गैंडों को मारने के विभिन्न तरीके ढूँढ निकाले, ताकि उनके सींगों को काले बाजार में बेचा जा सके, यह झूठा माहौल बनाते हुए कि उनके औषधीय या सजावटी मूल्य हैं।

ग्राफ – PIB

1980 से 1993 के बीच भारत में अकेले 692 गैंडे शिकारियों का शिकार बने। हालाँकि हाल के वर्षों में कड़े कानून लागू होने के बावजूद शिकार की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। 2008 से 2019 के बीच भारत में 102 गैंडे शिकार किए गए, जिनमें अधिकांश असम में थे।

आवास का नाश (Habitat Loss) भी एक बड़ी समस्या थी। जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ी, गैंडों द्वारा उपयोग किए जाने वाले घास के मैदान कम होने लगे। गैंडों को भोजन की तलाश में गाँवों में आना पड़ता, जिससे ग्रामीणों के साथ संघर्ष होता और कई गैंडों की मौत हो गई।

जनसंख्या घनत्व (Population Density) भी समस्या बन गया। जैसे ही काजीरंगा और पोबितोरा वाइल्डलाइफ सेंचुरी जैसी छोटी जगहों में गैंडों की संख्या बढ़ी, संसाधनों की कमी और प्रजनन अनुपात पर असर पड़ा। यही कारण था कि बाद में संरक्षण कार्यकर्ताओं ने गैंडों को अन्य उद्यानों में स्थानांतरित किया, ताकि उन्हें अधिक विशाल और सुरक्षित आवास मिल सके।

भारत ने विश्व स्तर पर कैसे एक उदाहरण स्थापित किया

अब भारत को गैंडों के संरक्षण की दुनिया की सबसे सफल कहानी के रूप में वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है, लेकिन यह सफलता एक दिन में हासिल नहीं हुई। इसके पीछे कानूनों का निर्माण, उनका सख्ती से पालन, लोगों की सक्रिय भागीदारी और वैश्विक सहयोग जैसी मुख्य कोशिशें रही हैं, जिन्होंने गैंडों के संरक्षण में मूलभूत बदलाव लाए हैं।

असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन एक्ट 1891 और बंगाल राइनोप्रेसर्वेशन एक्ट 1932 गैंडों के संरक्षण के लिए पहली कानूनी पहल थीं। ये प्रारंभिक नियम गैंडों के औपचारिक संरक्षण की शुरुआत थे। इन कानूनों ने विभिन्न वन संबंधी अपराधों को परिभाषित किया, जैसे वन में अवैध प्रवेश, आग लगाना या वनस्पति का विनाश और इनके लिए सजा का प्रावधान किया गया। सबसे महत्वपूर्ण यह था कि इन कानूनों ने गैंडों को मारने, घायल करने या पकड़ने पर रोक लगा दी, सिवाय आत्मरक्षा या विशेष अनुमति के मामलों को छोड़कर।

गैंडे को बचाने के लिए सरकार के प्रयास (फोटो -पीआईबी)

वाइल्डलाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट 1972 सबसे प्रभावशाली कानून साबित हुआ, जिसने शिकार (Poaching) के खिलाफ एक मजबूत कानूनी ढाँचा दिया। असम में 2009 में इस कानून में संशोधन किया गया, जिससे यह और भी सख्त हो गया और बार-बार अपराध करने वालों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान रखा गया। इन कानूनों ने स्पष्ट संदेश दिया कि गैंडे के शिकार को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

लेकिन केवल कानून ही पर्याप्त नहीं थे। असम सरकार को स्थानीय समुदायों के साथ भी मिलकर काम करना पड़ा, जो गैंडों के आवास के पास रहते हैं। सालों से जागरूकता अभियान और पर्यटन से मिलने वाले लाभों ने स्थानीय समर्थन बनाने में मदद की। लोग अब गैंडों को संकट या खतरे के रूप में नहीं, बल्कि गौरव और आजीविका का प्रतीक मानने लगे।

भारतीय राइनो विजन 2020: एक महत्वपूर्ण मोड़

यह पहल 2005 में शुरू की गई थी और इसका उद्देश्य एक सींग वाले गैंडों के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना था। इस परियोजना को असम सरकार, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल, इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन (IRF), वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) और यूएस फिश & वाइल्डलाइफ सर्विस ने मिलकर चलाया।

इस योजना का लक्ष्य था कि भारत में गैंडों की आबादी को दोगुना करके 2020 तक 3,000 पहुँचाया जाए और उन्हें असम के सात अभयारण्यों (Sanctuaries) में भेजा जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गैंडों की संख्या किसी एक उद्यान में अत्यधिक न हो, बल्कि उन्हें मानस नेशनल पार्क, लाओखोवा-बुराचापोरी-कोचमोरी और डिब्रू-सैखोवा जैसे अन्य संरक्षित उद्यानों में फैलाया जाए, ताकि वे सुरक्षित वातावरण में प्रजनन कर सकें।

2008 से 2012 के बीच, काजीरंगा और पोबितोरा से 18 गैंडों को मानस नेशनल पार्क में स्थानांतरित किया गया और बाद में 8 और गैंडों को वहाँ ले जाया गया। यह प्रयास सफल रहा क्योंकि इसके बाद मानस में नए बच्चों का जन्म हुआ। यह केवल स्थानांतरण अभियान नहीं था। इसमें गश्त के रास्ते, प्रहरी चौकियाँ और मॉनिटरिंग सिस्टम भी बनाए गए, ताकि शिकार पर नियंत्रण रखा जा सके।

राष्ट्रीय गैंडा संरक्षण रणनीति और आईआरवी 2.0

भारत ने IRV 2020 की सफलता के बाद नेशनल राइनो कंसर्वेशन स्ट्रैटेजी शुरू किया, जो भारत के संकटग्रस्त ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति है। इसके प्रमुख कार्यक्रमों में भारत के सभी गैंडों के लिए डीएनए प्रोफाइल विकसित करना शामिल है, ताकि उन्हें प्रभावी ढंग से सुरक्षा और निगरानी प्रदान की जा सके।

Indian Rhino Vision 2020 जैसी संरक्षण अभियानों की सफलता के बाद यह नीति भविष्य-केंद्रित ढांचा पेश करती है, जो लंबे समय तक इस प्रजाति के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में मदद करेगी। यह भारत की गैंडों के संरक्षण के लिए पहली स्वतंत्र और समग्र नीति है। यह अभूतपूर्व पहल भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक बड़ा कदम है, जो देश की सबसे प्रतीकात्मक प्रजातियों में से एक को संरक्षित करने के लिए एक केंद्रित और एकीकृत रणनीति पेश करती है।

अब यह अभियान दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है, जिसे Indian Rhino Vision 2.0 कहा जाता है। इसका लक्ष्य है कि 2030 तक असम में कम से कम तीन मेटा-आबादी में 4,500–5,000 ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों की संख्या सुरक्षित और बनाए रखी जाए।

IRV 2.0 में आवास सुधार (Habitat Enhancement), गैंडे के विस्तार क्षेत्र (Rhino Range Extension), समुदाय की भागीदारी, अपराध निगरानी और सक्रिय संरक्षण कार्रवाई पर विशेष ध्यान दिया गया है।

काजीरंगा: संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल

आज काजीरंगा की प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में है। यह वास्तव में वैश्विक गैंडे संरक्षण परियोजना की रीढ़ है, जहाँ विश्व के लगभग 70% ग्रेटर वन-हॉर्न्ड गैंडों का आवास है। केवल 2022 की जनगणना में ही 2,613 गैंडों की संख्या दर्ज की गई।

यह उद्यान यह भी दिखाता है कि लगातार प्रयास और दृढ़ता से संरक्षण से क्या हासिल किया जा सकता है। 1908 में केवल 12 गैंडों के साथ शुरू होकर, काजीरंगा ने अब 3,000+ गैंडों की संख्या पार कर ली है, और यह विश्व स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की सबसे सफल पुनरुद्धार कहानियों में से एक बन चुका है।

असम में गैंडों की जनसंख्या में वृद्धि 1966-2022 (वास्तविक जनगणना रिकॉर्ड के आधार पर) (ग्राफ़ पीआईबी द्वारा)

गैंडों की आबादी बढ़ाने के लिए इतनी सारी पहलों के बावजूद, वे शिकार  के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। पिछले दस सालों में लगभग 10,000 गैंडों का शिकार उनके सींगों की माँग को पूरा करने के लिए किया गया, जिन्हें परंपरागत औषधि और स्टेटस सिंबल के रूप में, विशेषकर चीन और वियतनाम में, उच्च मूल्य दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एंड क्राइम कार्यालय (UNODC) के अनुसार, गैंडे से बने उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी किए जाने वाले अवैध वन्यजीव सामान का 29% हिस्सा हैं।

इसी कारण विश्व गैंडा दिवस (World Rhino Day) का महत्व है। यह याद दिलाता है कि संरक्षण कभी पूर्ण नहीं होता। गैंडे केवल जीव-जंतु नहीं हैं, बल्कि भारत की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित करना प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना है।

भारत में एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण की कहानी 1900 के दशक की शुरुआत में विलुप्ति के कगार पर पहुँचने से लेकर आज 4,000 से अधिक समृद्ध आबादी तक पहुँचने तक एक चमत्कार से कम नहीं है। इस कहानी के केंद्र में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान है, जो अब दुनिया का सबसे मजबूत गैंडों का किला बन चुका है। काजीरंगा विश्व प्रसिद्ध वन्यजीव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है, जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के पर्यटकों को आकर्षित करता है और गैंडे संरक्षण के प्रति जागरूकता और समर्थन को और बढ़ावा देता है।


(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में शृति सागर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

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Shriti Sagar
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Journalist

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