Wednesday, February 11, 2026
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गुजरात हासिल करने जा रहा अंतरिक्ष विनिर्माण में एक बड़ी उपलब्धि, साणंद में बनेगा देश का पहला निजी उपग्रह: जानें ये ‘आत्मनिर्भर भारत’ को कैसे देगा गति?

सरकार की योजना साणंद को केवल एक कारखाने तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसा केंद्र बनाने की है जहाँ उपग्रह डिजाइन से लेकर परीक्षण तक सब कुछ एक ही स्थान पर हो सके।

भारतीय अंतरिक्ष अन्वेषण का इतिहास हमेशा से गुजरात से जुड़ा रहा है। अहमदाबाद की धरती से डॉ विक्रम साराभाई का जो सपना था, वह आज साणंद की खोराज में साकार हो रहा है। अब तक उपग्रह निर्माण का कार्य पूरी तरह से सरकारी संगठन इसरो की जिम्मेदारी थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियानों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया है।

इस क्रांति का केंद्र वर्तमान में गुजरात का साणंद है। साणंद में देश के पहले एकीकृत निजी उपग्रह निर्माण संयंत्र की आधारशिला रखी गई है। अजीस्ता स्पेस ने भारत की महत्वाकांक्षी ‘इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री’ की आधारशिला रखी है।

यह अत्याधुनिक कारखाना साणंद के खोराज औद्योगिक क्षेत्र में बनाया जाएगा। इस कारखाने की आधारशिला रखकर इसका उद्घाटन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने किया। इस संयंत्र से कई चीजें जुड़ी हैं, जैसे केंद्र सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और गुजरात सरकार का 2047 तक विकसित गुजरात का लक्ष्य। आज हम इस पूरे संयंत्र और इससे गुजरात और भारत को भविष्य में मिलने वाले लाभों के बारे में चर्चा करेंगे।

भूमि पूजन की तस्वीरें (फोटो साभार: गुजराती जागरण)

यह परियोजना क्या है?

इस परियोजना का मुख्य नाम इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल पेलोड फैक्ट्री है, जिसे कंपनी के आंतरिक संदर्भ में ‘पामनारो’ संयंत्र के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत में निजी क्षेत्र की पहली एकीकृत उपग्रह निर्माण इकाई है, जहाँ उपग्रह का संपूर्ण उत्पादन यानी डिजाइन, इंजीनियरिंग, घटक निर्माण, संयोजन, एकीकरण, परीक्षण और प्रमाणीकरण सभी कार्य एक ही स्थान पर किए जाएंगे।

यह संयंत्र उच्च-रिजॉल्यूशन इमेजिंग, रिमोट सेंसिंग और मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरों जैसे उन्नत ऑप्टिकल पेलोड पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो कृषि, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन और रक्षा जैसे नागरिक क्षेत्रों के लिए उपयोगी हैं। यह संयंत्र अहमदाबाद के साणंद स्थित खोराज औद्योगिक एस्टेट में स्थापित किया जाएगा, जहाँ प्लॉट संख्या K-19 से K-24/1 तक के क्षेत्र में कारखाने का निर्माण किया जाएगा।

इस संयंत्र की आधारशिला गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने 22 जनवरी 2026 को रखी थी। इस अवसर पर संयंत्र के विकास, अवसंरचना और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए गुजरात सरकार के साथ 500 करोड़ रुपए से अधिक के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौता ज्ञापनों के तहत, भारत के निजी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए गुजरात सरकार द्वारा भूमि, प्रोत्साहन और सहायता प्रदान की जाएगी।

अजीस्ता विवरण

अजीस्ता स्पेस एक भारत-जर्मन संयुक्त उद्यम है, जिसमें अजीस्ता इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड (भारत, हैदराबाद स्थित) और बर्लिन स्पेस टेक्नोलॉजीज जीएमबीएच (जर्मनी) शामिल हैं। कंपनी के पास पहले से ही अहमदाबाद के साणंद जीआईडीसी, सरखेज-साणंद रोड स्थित प्लॉट नंबर 16 पर एशिया का पहला निजी उपग्रह कारखाना है, जो 30,000 वर्ग फुट के क्लीन रूम, एआईटी (असेंबली, इंटीग्रेशन और टेस्टिंग) लैब और परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित है।

मौजूदा कारखाने की वार्षिक उत्पादन क्षमता 50 उपग्रहों की है, जिसे बढ़ाकर 250 तक किया जा सकता है। पावर सिस्टम, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियों का निर्माण कारखाने के भीतर ही किया जाता है। इससे निर्माण समय में 250 गुना की कमी आती है और लागत में 40 गुना की बचत होती है

अजीस्ता की फैक्ट्री साणंद में स्थित है। (फोटो साभार: अजीस्ता वेबसाइट)

इस नए संयंत्र का उद्देश्य

यह नया संयंत्र केवल पुर्जों या पेलोड के निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी के लिए बनाया गया है। इससे मेगा-कॉन्स्टेलेशन (हजारों उपग्रहों के नेटवर्क, जैसे स्टारलिंक) के लिए त्वरित और सस्ती आपूर्ति संभव हो सकेगी। इस संयंत्र का मुख्य उद्देश्य निजी क्षेत्र द्वारा भारत में पूरी तरह से स्वदेशी उपग्रहों और उन्नत ऑप्टिकल पेलोड का उत्पादन करना है।

यह एक संपूर्ण एकीकृत सुविधा होगी, जहाँ डिजाइन से लेकर अंतिम उत्पादन, परीक्षण और प्रमाणीकरण तक सब कुछ एक ही छत के नीचे किया जाएगा। इस संयंत्र में अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी, जैसे उन्नत क्लीन रूम, अंशांकन प्रयोगशालाएं और अनुसंधान एवं विकास केंद्र, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय उपग्रह वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।

अजीस्ता की मुख्य उपलब्धि

कंपनी की सबसे बड़ी उपलब्धि एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह है। यह उपग्रह अजीस्ता बीएसटी एयरोस्पेस का पहला उपग्रह है। यह भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र द्वारा निर्मित पहला उच्च-प्रदर्शन वाला रिमोट सेंसिंग उपग्रह है, जिसका वजन 80 किलोग्राम है और इसे विस्तृत क्षेत्र में मध्यम-रिजॉल्यूशन वाली ऑप्टिकल इमेजिंग के लिए डिजाइन किया गया है।

यह उल्लेखनीय है कि उपग्रह का वजन केवल 80 किलोग्राम है, यानी यह एक बड़े सूटकेस जितना हल्का है। इसका आकार लगभग 60 सेमी x 60 सेमी x 40 सेमी है। इसमें एक विशेष कैमरा लगा है, जो पृथ्वी की तस्वीरें लेता है। यह कैमरा लगभग 550 किलोमीटर ऊपर से तस्वीरें लेता है, जिनमें कार जैसी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इसे ‘4.6 मीटर रिजॉल्यूशन’ कहा जाता है यानी 4.6 मीटर से छोटी वस्तुएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

एबीए फर्स्ट रनर (एएफआर) उपग्रह (फोटो साभार: अजीस्टा वेबसाइट)

यह कैमरा एक बार में 60 किलोमीटर चौड़ाई तक के भूभाग की तस्वीरें ले सकता है, जिसे ‘वाइड-स्वैथ’ कहा जाता है । यह रंगीन तस्वीरें (लाल, हरे और नीले रंग में) और विशेष प्रकार की तस्वीरें भी ले सकता है, जैसे कि पौधों के स्वास्थ्य का पता लगाने के लिए इन्फ्रारेड तस्वीरें। यह उपग्रह सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करता है यानी, यह हर दिन एक ही समय पर एक ही स्थान के ऊपर से गुजरता है, इसलिए तस्वीरें हमेशा एक ही प्रकार के प्रकाश में ली जाती हैं।

इस उपग्रह का उपयोग कृषि में फसलों की स्थिति की निगरानी करने, पानी की आवश्यकता है या नहीं, जंगलों, नदियों, पर्यावरण प्रदूषण, नए निर्माण, सड़कों, बाढ़ की निगरानी करने, भूकंप के समय सहायता की आवश्यकता वाले स्थानों का पता लगाने आदि जैसे कार्यों के लिए किया जा सकता है ।

इस उपग्रह को 13 जून 2023 को अमेरिका से स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था। यह एक साझा मिशन था, जिसका अर्थ है कि कई छोटे उपग्रह एक साथ भेजे गए थे। यह अब दो साल से अधिक समय से अंतरिक्ष में कार्यरत है।

इसने हजारों तस्वीरें ली हैं, बड़ी मात्रा में डेटा भेजा है और पृथ्वी के 10% से अधिक हिस्से की तस्वीरें खींची हैं। यह अभी भी अच्छी तरह से काम कर रहा है और अगले तीन वर्षों तक कार्य करने की योजना है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को गति प्रदान करना

गुजरात के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने इस संयंत्र की आधारशिला रखते हुए कहा , “अज़ीस्ता स्पेस की यह सुविधा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि उपग्रह का संपूर्ण डिज़ाइन, विकास और परीक्षण स्वदेशी तकनीक का उपयोग करते हुए एक ही मंच के अंतर्गत किया जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों को मजबूत करेगी।” इसका अर्थ यह है कि इस संयंत्र द्वारा निर्मित उपग्रह रक्षा, कृषि, आपदा प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता का निर्माण करेंगे।

साणंद में अजीस्ता बीएसटी द्वारा स्थापित उपग्रह निर्माण इकाई केवल ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों के लिए एक परियोजना नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव है। अब तक, भारत सुरक्षा और सीमा निगरानी के लिए अपने अत्याधुनिक उपग्रहों के लिए अक्सर विदेशी प्रौद्योगिकी या घटकों पर निर्भर रहता था।

लेकिन अब स्थिति बदलेगी। इसके अलावा, जब कोई उपग्रह भारत में बनता है, तो उसका डिजाइन और उसके द्वारा भेजा गया डेटा पूरी तरह से भारतीय नियंत्रण में रहता है। सुरक्षा की दृष्टि से यह ‘आत्मनिर्भरता’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, भारत अपनी आवश्यकता के अनुसार तेजी से छोटे उपग्रहों का निर्माण और प्रक्षेपण कर सकेगा, जो पहले संभव नहीं था।

वैश्विक विनिर्माण केंद्र: दुनिया भर की कई कंपनियाँ अब चीन के विकल्प तलाश रही हैं। साणंद स्थित यह संयंत्र अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को चीन के एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है। अजीस्ता का संयंत्र प्रति वर्ष 36 उपग्रहों का निर्माण कर सकता है।

इसका अर्थ है कि भारत अब अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का ‘खुदरा विक्रेता’ से ‘थोक विक्रेता’ बन रहा है। ऐसे सफल निजी उद्यमों को देखते हुए, अन्य विदेशी एयरोस्पेस कंपनियां भी भारत में निवेश करने और यहाँ कारखाने स्थापित करने के लिए प्रेरित होंगी।

लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र का विकास: उपग्रह बनाना किसी एक कंपनी का काम नहीं है, इसके लिए हजारों छोटे-छोटे पुर्जों की आवश्यकता होती है। साणंद में संयंत्र की स्थापना से आसपास के सैकड़ों लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सेंसर, बोल्ट, पैनल और वायरिंग हार्नेस बनाने के ऑर्डर मिलेंगे। गुजरात पहले से ही इंजीनियरिंग और विनिर्माण के क्षेत्र में अग्रणी है। अब यहाँ के उद्योगों को अंतरिक्ष-स्तरीय पुर्जे बनाने का कौशल प्राप्त होगा, जो ‘मेक इन इंडिया’ की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी: एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी फिलहाल केवल 2% या 8.4 अरब डॉलर है। भारत सरकार 2033 तक इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 8% से अधिक या 44 अरब डॉलर करना चाहती है । यह संयंत्र इसमें महत्वपूर्ण योगदान देगा। इसके अलावा, इसरो अब गगनयान और आदित्य एल1 जैसे बड़े मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा, जबकि साणंद जैसी निजी इकाइयाँ वाणिज्यिक उपग्रहों के निर्माण का काम संभालेंगी। यह विभाजन ‘आत्मनिर्भर भारत’ को और बढ़ावा देगा।

प्रतिभा पलायन रोकना: ‘आत्मनिर्भर भारत’ का अर्थ ‘आत्मनिर्भर युवा’ भी है। अब तक भारत के सर्वश्रेष्ठ एयरोस्पेस इंजीनियर अवसरों की तलाश में नासा या स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के लिए अमेरिका जाते थे। अब जब भारत की धरती पर, और वह भी गुजरात जैसे राज्य में, विश्व स्तरीय कारखाने मौजूद हैं, तो प्रतिभाशाली युवा भारत में ही रहेंगे और देश के लिए प्रौद्योगिकी का विकास करेंगे।

आयात घटेगा और रोजगार बढ़ेगा: इस संयंत्र में विद्युत प्रणाली, संचार और नियंत्रण इकाइयों जैसे 80% से अधिक उप-प्रणालियाँ भारत में निर्मित होंगी। इससे आयात घटेगा, लागत कम होगी और निर्माण प्रक्रिया तेज होगी। संयंत्र बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है, जिससे भारत हजारों उपग्रहों के विशाल समूह जैसी परियोजनाओं में अग्रणी भूमिका निभा सकेगा।

यह परियोजना गुजरात को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उच्च-तकनीकी विनिर्माण में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनाएगी और इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और रिमोट सेंसिंग जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करेगी।

गुजरात: अनुसंधान से लेकर अंतरिक्ष विनिर्माण के वैश्विक केंद्र तक

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात का अंतरिक्ष से संबंध भारत की स्वतंत्रता के साथ ही शुरू हुआ। 1947 में, डॉ विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में पीआरएल की स्थापना की। इसे ‘भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का उद्गम स्थल’ कहा जाता है। यहीं से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रारंभिक वैज्ञानिक नींव रखी गई थी। फिर भारतीय वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के फलस्वरूप, 1969 में इसरो की स्थापना हुई, जिसमें डॉ साराभाई का योगदान प्रमुख था।

इसके अलावा, अहमदाबाद में स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) को इसरो का हृदय माना जाता है। एसएसी रिमोट सेंसिंग, संचार और नेविगेशन पेलोड (उपग्रहों के मुख्य उपकरण) बनाने में विशेषज्ञता रखता है। चंद्रयान-3 मिशन में उपयोग किए गए 11 महत्वपूर्ण उपकरण, जैसे लैंडर कैमरा, अल्टीमीटर और रडार आदि, अहमदाबाद स्थित एसएसी केंद्र में ही तैयार किए गए थे । लैंडिंग साइट के चयन की 80% प्रक्रिया भी यहीं पूरी हुई थी।

अनुसंधान से आगे बढ़ते हुए, गुजरात अब ‘उपग्रह निर्माण’ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। अजीस्ता बीटीएस एयरोस्पेस एशिया का पहला निजी कारखाना है जो ‘उपग्रहों का बड़े पैमाने पर उत्पादन’ करने में सक्षम है। इस संयंत्र की क्षमता प्रति सप्ताह 2 उपग्रह या प्रति वर्ष लगभग 100 सूक्ष्म उपग्रहों के निर्माण की है।

सरकार की योजना साणंद को सिर्फ एक कारखाने तक सीमित रखने की नहीं है, बल्कि इसे एक ऐसा केंद्र बनाने की है जहाँ उपग्रह डिजाइन से लेकर परीक्षण तक सब कुछ एक ही स्थान पर किया जा सके। अज़ीस्ता के अलावा, साणंद में अन्य सहायक उद्योगों की स्थापना की प्रक्रिया भी चल रही है।

साणंद का यह क्षेत्र न केवल गुजरात बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए ‘उपग्रह निर्माण की राजधानी’ बनने जा रहा है। सरकार की नीतियों और निजी क्षेत्र के उत्साह को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगला दशक ‘गुजरात में निर्मित’ उपग्रहों का दशक होगा।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रार्थना आमीन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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