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अब प्रकाश को छू भी सकते हैं… क्या है ‘सुपर सॉलिड लाइट’, इससे कितना बदलेगा हमारा जीवन: सरल शब्दों में समझिए विज्ञान

इस खोज से ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए कई नए विकल्प मिल सकते हैं। अक्षय ऊर्जा, बैटरी और सुपर कंडक्टिविटी को बेहतर बना कर बिजली की खपत को कम किया जा सकता है।

सुबह-सुबह सूरज की रोशनी को देखकर दिन की शुरुआत करना लगभग हर व्यक्ति की चाहत होती है। इस रोशनी से ऊर्जा मिलती है, दिन अच्छा बीतेगा, ऐसा माना जाता है। लेकिन अगर यही रोशनी देखने के साथ छूने के लिए मिल जाए तो?

सोचने को तो कुछ भी सोचा जा सकता है। लेकिन अब धरातल पर भी साइंस फिक्शन की ये बात सच हो रही है। इटली के सीएनआर नैनोटेक (Consiglio Nazionale delle Ricerche) के एटोनियो गियानफेट (Antonio Gianfrate) और यूनिवर्सिटी ऑफ पाविया (University of Pavia) के डेविड निग्रो (Davide Nigro) की टीम ने रिसर्च कर ये दिखा दिया है कि प्रकाश भी ठोस हो सकता है।

17वीं सदी से अब तक शोध चालू

प्रकाश को लेकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में शोध शुरू हुए। न्यूटन और हाइजेंस जब लाइट पर काम कर रहे थे, तब से ही यह बहस चल रही है कि प्रकाश असल में है क्या? कोई कण या तरंग? न्यूटन का मानना था कि प्रकाश कणों से बना है।

इसके बाद 20वीं सदी में एल्बर्ट आइंस्टीन ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ लेकर आए और बताया कि प्रकाश दो तरह से काम कर सकता है। यानी लाइट का डुअल बिहेवियर होता है। इसमें कण भी हैं और तरंग भी। 1905 में आई इस थ्योरी में आइंस्टीन ने ये बताया कि पदार्थ के द्रव्यमान से ऊर्जा बनाई जा सकती है। वैसे ही ऊर्जा से पदार्थ बन सकता है। हालाँकि उन्होंने भी इसके ठोस में बदलने की संभावना से इनकार कर दिया था।

इसके बाद 1942 में एनरीको फर्मी ने संयुक्त राष्ट्र में ये दिखाया कि यूरेनियम जैसे पदार्थ से हम ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। हालाँकि ऊर्जा या फोटॉन से कोई ठोस पदार्थ बने, इस तरह के शोध में सफलता नहीं मिल पा रही थी। यही कारण है कि बाद में भी शोध जारी रहे।

प्रकाश को लेकर इतनी संभावनाओं के बावजूद अब तक सफलता क्यों नहीं मिली? इसका उत्तर है कि किसी भी ठोस पदार्थ का द्रव्यमान होता है। इसके उलट प्रकाश फोटॉन से बनता है, जिसका कोई द्रव्यमान या रेस्ट मास नहीं होता या कहा जाए शून्य होता है।

लाइट बन गई ‘सुपर सॉलिड’

नेचर पत्रिका में छपी इटली के वैज्ञानिकों की रिसर्च अब कौतूहल का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि प्रकाश को एक ‘सुपर सॉलिड’ पदार्थ में बदला जा सकता है। इसे ‘सुपर सॉलिड लाइट’ नाम दिया गया है। असल में सुपर सॉलिड एक ऐसी अवस्था है, जिसमें किसी पदार्थ को इस तरह ठंडा किया जाता है कि उसके परमाणु एक ही क्वांटम अवस्था में पहुँच जाते है। इसमें पदार्थ होता तो ठोस है, लेकिन उसकी संरचना फ्लुइड की तरह होती है। यानी ये बिना रुकावट के बहता रहता है।

इस तरह के सुपर सॉलिड पदार्थ को अब तक सिर्फ बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट्स (बीईसी) में ही देखा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस रिसर्च से भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग और ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इस रिसर्च को क्वांटम फिजिक्स के लिए एक अहम मील का पत्थर कहा जा सकता है।

कैसे जम गया प्रकाश?

वैज्ञानिकों ने प्रकाश को सामान्य रूप से तापमान कम करके नहीं जमाया, बल्कि इसके लिए खास तकनीक का उपयोग किया। उन्होंने क्वांटम तकनीक का उपयोग कर गैलियम आर्सेनाइड की संरचना में माइक्रोस्कोपिक रिज (सूक्ष्म लकीरें) के जरिए फोटॉन को नियंत्रित किया। इसके बाद प्रकाश को सुपर सॉलिड अवस्था में बदला गया।

इस रिसर्च से क्वांटम कंप्यूटिंग में नई टेक्नोलॉजी के नए आयाम सामने आ सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक तरह के सुपर कंप्यूटर होते हैं, जिनका उपयोग बड़े रिसर्च और जटिल गुणा-भाग करने के लिए किया जाता है। नया शोध इन सुपर कंप्यूटर की स्पीड और अधिक तेज कर सकता है। इससे सेमी कंडक्टर, स्पेस रिसर्च, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, साइबर सुरक्षा के साथ अन्य रिसर्च में मदद मिल सकती है।

आम इंसान को इस रिसर्च से क्या मिलेगा?

आम आदमी के लिए ये रिसर्च तुरंत तो नहीं पर भविष्य में कई तकनीकी बदलाव ला सकता है। इससे हमारे रोजमर्रा के जीवन में बेहतरी आ सकती है। भविष्य में आम इंसान भी बेहतर आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (AI) और स्मार्ट तकनीक का उपयोग कर सकता है।

नए मोबाइल और गैजेट्स के लिहाज से देखा जाए तो नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अत्याधुनिक ऑप्टिकल विकसित किए जा सकते हैं। अल्ट्रा थिन डिस्प्ले के मोबाइल और अत्यधिक शक्तिशाली प्रोसेसर तैयार हो सकते हैं। बैटरी लाइफ बढ़ जाएगी।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि आगे चलकर आपका मोबाइल चार्जर मिनटों में फोन की बैटरी फुल चार्ज कर देगा। आपके डेटा ट्रांसफर की गति कई गुना तेज हो सकती है। सुपरफास्ट इंटरनेट की सुविधा दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी पहुँच सकती है।

क्वांटम इंटरनेट पद्धति विकसित की जाएगी, जिससे इंटरनेट अधिक सुरक्षित हो जाएगा और हैकिंग नहीं हो पाएगी। कैंसर जैसी बीमारी के लिए बेहतर शोध हो सकते हैं। क्वांटम सेंसर और इमेजिंग तकनीक पैथालॉजी और एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जाँच सुविधाओं को सटीक बना सकता है।

पर्यावरण के लिहाज से भी ये शोध एक बेहतर विकल्प बन कर सामने आ सकते हैं। हरित ऊर्जा को भी बढ़ावा मिलेगा जो पर्यावरण के संरक्षण में सहायक होगा। इस खोज से ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए कई नए विकल्प मिल सकते हैं। अक्षय ऊर्जा, बैटरी और सुपर कंडक्टिविटी को बेहतर बना कर बिजली की खपत को कम किया जा सकता है। इससे उन जगहों तक बिजली पहुँचने के आसार होंगे जहाँ आज तक बिजली नहीं पहुँच पाई है।

फिक्शन से असल रिसर्च पर पहुँच गई साइंस

स्कूल में साइंस की पढ़ाई में बेंजीन और कार्बन के बारे में बच्चों को कई रिएक्शन समझाए जाते हैं। साइंस फिक्शन की ये बात सिर्फ याद करने तक ही सीमित रहती थी। वैज्ञानिकों के इस शोध ने फिक्शन को वास्तविक दुनिया के करीब ला दिया है। सूर्य के जिस प्रकाश को हमें सिर्फ देखने भर से ही गर्मी महसूस होने लगती है, जरा सोचिए कि अगर उसे ठोस में बदला जाएगा तो कितने नए शोध सामने आएँगे और कितने अविष्कारों से हम परिचित होंगे।

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