नया कानून उस दायित्व व्यवस्था में सुधार करेगा, जिसने देश में उदारीकरण के बावजूद कंपनियों के निवेश को सीमित कर रखा है। परमाणु ऊर्जा काफी संवेदनशील क्षेत्र है, इसलिए अब तक सरकार का पूर्ण नियंत्रण इस क्षेत्र पर रहा है। अब ऐसी कंपनियाँ लगेंगी जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र मिलकर उपक्रम लगाएँगे, हालाँकि सरकार ने साफ कर दिया है कि बेहद संवेदनशील पदार्थों पर अभी भी सरकार का पूर्ण नियंत्रण होगा।
लोकसभा में 'शांति (SHANTI) विधेयक 2025' पारित, परमाणु ऊर्जा में निजी निवेश को मिली हरी झंडी ।#ShantiBill2025 pic.twitter.com/1Sn2pXpDa7
— Office of Dr. Jitendra Singh (@OfficeOfDrJS) December 18, 2025
क्या है SHANTI बिल
परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु संयंत्रों से होने वाले नुकसान के लिए सिविल दायित्व अधिनियम 2010 की जगह SHANTI बिल 2025 यानी भारत के ट्रांसफॉर्म के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन विधेयक, 2025 (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill, 2025) को लाया गया है। परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड (AERB) को बिल के माध्यम से सांविधिक दर्जा (Statutory Status) प्रदान किया गया है। इससे यह संस्था रेडिएशन और परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित कर सकेगी।
इस कानून के लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की एंट्री परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हो जाएगी। हालाँकि, सरकार ने सदन में साफ किया है कि ये बिल पुराने बिल के उद्देश्यों को और मजबूत करना है। इस बिल के माध्यम से परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्ज दिया गया है, ताकि इसे और प्रभावी बनाया जा सके। सरकार निजी क्षेत्र को यूँ ही नहीं एंट्री करने देगी। सरकार का साफ कहना है कि निजी संस्थानों का संवेदनशील पदार्थों पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। सरकार सुरक्षा संबंधी मानदंड तय करेगी। रेडियोएक्टिव पदार्थ, ईधन और हेवी वाटर पर सरकार की निगरानी होगी।
परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और सिविल दायित्व अधिनियम 2010 को निवेश की राह में रोड़ा माना जाता रहा है। खास कर आपूर्तिकर्ताओं पर दायित्वों को लेकर। इसकी वजह से विश्वस्तर के उद्योग भारत में आने में हिचकिचा रहे हैं। इसको देखते हुए भी बिल में आपूर्तिकर्ताओं के दायित्वों को साफ किया गया है।
क्या मुआवजे को कम किया जा रहा है, सुरक्षा मापदंड क्या हैं
विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस कानून से मुआवजे को कम किया जा रहा है। साथ ही विपक्ष कह रहा है कि आपूर्तिकर्ता के उत्तरदायित्व का प्रावधान इसमें नहीं है और यह संवेदनशील क्षेत्र में निजी कॉरपोरेट समूहों के लिए रास्ता खोलने वाला है।
इसका जवाब देते हुए केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा कि इस विधेयक से पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे को कम नहीं किया गया है। उन्होंन स्पष्ट किया कि रिएक्टर की क्षमता के मुताबिक इसके मालिक के दायित्व को तय किया गया है, ताकि छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी नई तकनीकों को प्रोत्साहित किया जा सके। इसके तहत दायित्व सीमा 100 करोड़ से 3000 करोड़ रुपए तक होगी।
प्रभावितों को पूरा मुआवजा सुनिश्चित किया जा सके। इसके लिए संचालक का दायित्व, सरकार के परमाणु दायित्व फंड और दूसरे मुआवजे से जुड़ी संधि में भारत की भागीदारी से अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय मुआवजा भी मिलेगा। कानून में संचालक की लापरवाही के लिए सजा के प्रावधान भी लागू रहेंगे। अगर क्षतिपूर्ति राशि रिएक्टर का संचालक पूरा नहीं कर पा रहा है, तो बाकी बचा पैसा केन्द्र सरकार देगी।
विधेयक में परमाणु संचालन से संबंधित विवादों के समाधान के लिए एक परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद की स्थापना का भी प्रस्ताव है। नियम तोड़ने के लिए जुर्माना मामूली उल्लंघनों के लिए 5 लाख रुपए से लेकर गंभीर अपराधों के लिए 1 करोड़ रुपए तक है। सभी ऑपरेटरों, चाहे वे सार्वजनिक हों या निजी, उन्हें सरकार से लाइसेंस और एईआरबी से सुरक्षा मंजूरी प्राप्त करना जरूरी होगा।
‘नो-फॉल्ट दायित्व’ की पहले की व्यवस्था जारी रहेगी। इसका अर्थ यह है कि दुर्घटना या क्षति के लिए लापरवाही साबित हुए बिना भी दुर्घटना के लिए ऑपरेटर ही जिम्मेदार होगा। ये अनिवार्य किया गया है कि ऑपरेटर दायित्व राशि के बराबर का बीमा कराएगा।
नया विधेयक के मुताबिक, भारत में हुई किसी परमाणु दुर्घटना से यदि किसी अन्य देश के क्षेत्र में भी नुकसान होता है, तो कुछ शर्तों के साथ वहाँ हुए नुकसान के लिए भी क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है।
परमाणु ऊर्जा दूसरे ऊर्जा के विकल्पों मसलन कोयला, जल की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को कई स्वतंत्र सुरक्षा लेयर के साथ डिजाइन किया जाता है, ताकि एक भी विफलता बड़ी दुर्घटना का कारण न बन सके।
क्या निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर किया जा रहा है?
विपक्ष ने सदन में बिल का विरोध करते हुए कहा है कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों की दुश्मन है और एक के बाद एक सार्वजनिक क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपती जा रही है। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र को भी अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। इस आरोप को केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन में खारिज करते हुए कहा कि इस कानून से सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता में कमी नहीं आएगा।
दरअसल सरकार ने पिछले एक दशक में परमाणु ऊर्जा विभाग के बजट में लगभग 170 प्रतिशत की वृद्धि की है। भारत के समकक्ष देशों की तुलना में ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का योगदान अभी भी कम है। ऐसे में कोयला, पानी, हवा से प्राप्त होने वाली बिजली के अलावा परमाणु ऊर्जा को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है, ताकि डेटा प्रोसेसिंग, स्वास्थ्य सेवा और उद्योग जैसे क्षेत्रों की बढ़ती माँग को पूरा किया जा सके।
केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक, यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा या जनहित से समझौता किए बिना, संसाधन संबंधी बाधाओं को दूर करने, परियोजनाओं के निर्माण की अवधि को कम करने और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार निजी और संयुक्त उद्यम की भागीदारी को संभव बनाता है। इसका मकसद 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य और 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्तमान लगभग 8.2 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है।
जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को कम करने में कैसे है सहायक
इस विधेयक में पहली बार परमाणु क्षति की परिभाषा में पर्यावरण और आर्थिक नुकसान को शामिल किया गया है। शांति बिल 2025 का उद्देश्य स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करना है और साथ ही परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को भी कायम रखना है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों और अनुसंधान और नवाचार को भी प्रोत्साहित करना इसका मकसद है।
नया कानून भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है, क्योंकि ये बहुत ही कम कार्बन उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्रोत है। इससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। यह विधेयक स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों जैसी विकसित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है, जो कोयले के उपयोग को रोकने में मददगार है। इतना ही नहीं उद्योगपतियों को कार्बन उत्सर्जन टैक्स से भी बचाता है। दरअसल कोयले से चलने वाले पावर प्लांट के विपरीत न्यूक्लियर रिएक्टर चलते समय वायु प्रदूषण नहीं करते हैं और ये कार्बन डाइऑक्साइड नहीं बनाते हैं।
हालाँकि, यूरेनियम की माइनिंग और रिफाइनिंग और रिएक्टर फ्यूल बनाने के प्रोसेस में बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। न्यूक्लियर पावर प्लांट में भी बहुत ज़्यादा मेटल और कंक्रीट होता है, जिसे बनाने के लिए बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। अगर यूरेनियम ओर की माइनिंग और रिफाइनिंग के लिए कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, या अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाते समय कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, तो उन फ्यूल को जलाने से होने वाला एमिशन न्यूक्लियर पावर प्लांट से बनने वाली बिजली से जुड़ा हो सकता है।
न्यूक्लियर एनर्जी से रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है
न्यूक्लियर पावर से जुड़ी एक बड़ी समस्या रेडियोएक्टिव कचरे का बनना है, जैसे यूरेनियम मिल टेलिंग्स, रिएक्टर फ्यूल और दूसरे रेडियोएक्टिव कचरे। ये इंसानों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। इसलिए इसकी हैंडलिंग, ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज और डिस्पोजल को सरकार कंट्रोल करती है।
रेडियोएक्टिव तत्वों की क्षमता को पहले कम किया जाता है, फिर इसे डिस्पोज किया जाता है। इसके लिए रेडियोएक्टिव कचरे को लो-लेवल कचरे या हाई-लेवल कचरे में बाँटा जाता है। दोनों का तरीका अलग-अलग होता है। हालाँकि इन कचरों की तुलना अगर कोयले या दूसरे बिजली बनाने के संसाधनों से की जाए तो ये काफी कम हैं। इसलिए विकसित देश न्यूक्लियर एनर्जी पर लगातार निर्भरता बढ़ा रहे हैं।
परमाणु ऊर्जा एक स्वच्छ और साफ-सुथरा बिजली का स्रोत है, जो दिन-रात और 24 घंटे उपलब्ध रह सकता है। परमाणु ऊर्जा का उत्सर्जन हाइड्रो और पवन ऊर्जा की तरह है। इसलिए परमाणु ऊर्जा 2070 तक नेट जीरो के संकल्प को पूरा करने में ये अहम भूमिका निभाएगा।
कृषि और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में इस्तेमाल
एटोमिक ऊर्जा का इस्तेमाल कृषि से लेकर फूड तकनीक में तेजी से होने लगा है। भारत में ही रेडिएशन का इस्तेमाल कर 72 तरह की नई फसलें, जिनमें सरसों, सोयाबीन, सनफ्लावर जैसी तिलहन और उरद, मूँग समेत कई दालें, चावल जूट और केले शामिल हैं, पैदा की गई हैं।
इसके अलावा फूड रेडिएशन पर आधारित फूड संरक्षण तकनीक से कोल्ड स्टोरेज समेत कई काम कम खर्च पर और आसानी से किसानों को उपलब्ध हो सकती हैं। इससे न सिर्फ अनाज, मसालों की उम्र बढ़ जाएगी, बल्कि उन्हें रेडिएशन के माध्यम से कीटों और कीड़ों से भी मुक्ति मिल जाएगी। इसका फायदा एग्रीकल्चर सेक्टर में दूरगामी पड़ेगा। इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने, कृषि लागत को कम करने, किसानों की आय में सुधार लाने और वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
हेल्थ सेक्टर को होगा फायदा
इस विधेयक को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। हेल्थ सेक्टर में इसका काफी महत्व है खास कर कैंसर के इलाज में, इसमें रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा शोध विकास और नवाचार के क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अलावा कृषि और उद्योग से जुड़े अनुसंधान में आयोनाइजिंग रेडिएशन (ionising radiation) का इस्तेमाल कर कई आयाम जोड़े जा सकते हैं।
Bhabha Atomic Research Centre (BARC) ने न्यूक्लियर एनर्जी के माध्यम से पानी की बाढ़ वाले इलाके में कम खर्च पर सफाई करने की तकनीक कई राज्यों में इस्तेमाल की है। इसके व्यापक इस्तेमाल से बाढ़ वाले इलाके में फैलने वाली बीमारी से निजात मिलेगी। पानी की सफाई से बैक्टीरिया वायरस तो पानी से अलग होंगे ही मिट्टी और दूसरे पदार्थ भी अलग हो जाएँगे। यहाँ तक कि पानी के खारेपन को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में हो रहा है।
प्राइवेट पूँजी निवेश और हाई तकनीक के साथ साथ वैश्विक साझेदारी जरूरी है। इसलिए लगातार सरकार इस कोशिश में लगी है कि ज्यादा से ज्यादा पूँजी निवेश को आमंत्रित किया जा सके। हमारे देश में रिलायंस इंडस्ट्री, टाटा पावर और अडानी पावर इस क्षेत्र में आगे आए हैं। विदेशी कंपनियाँ भी दिलचस्पी दिखा रही हैं।
विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की अपार संभावना की ओर देश को बढ़ना ही होगा। इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है। परमाणु ऊर्जा सिर्फ बिजली पैदा नहीं करता बल्कि इससे हेल्थ सेक्टर, दूसरे उद्योग, एक्सपोर्ट, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को भी फायदा होता है। इन क्षेत्रों के विकास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए ये कानून मील का पत्थर साबित होगा।


