दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में गुरुवार (25 जून 2026) को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो विनाशकारी भूकंपों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पिछले 100 वर्षों के इस सबसे शक्तिशाली जलजले में अब तक कम से कम 235 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1,500 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं और सैकड़ों इमारतें जमींदोज हो चुकी हैं।
वेनेजुएला की इस भीषण त्रासदी के बाद भारत के भूवैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के बीच हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चर्चा बेहद तेज हो गई है। भारतीय वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि भारत और यूरेशियाई टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलन स्थल पर स्थित हिमालयी क्षेत्र में कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, जिसका असर दिल्ली-एनसीआर तक देखने को मिलेगा।
भारत के पास ‘भूदेव’, ये बचाएगा लाखों की जान
इस बड़े खतरे से निपटने के लिए भारत ने हिमालय की कोख में एक बेहद आधुनिक सुरक्षा कवच तैयार किया है, जिसे ‘भूदेव (BhuDEV)’ प्लान नाम दिया गया है। दुनिया के किसी भी देश के पास भूकंप आने से पहले उसकी सटीक भविष्यवाणी (समय, स्थान और तीव्रता) करने की तकनीक आज भी मौजूद नहीं है। लेकिन भूकंप की शुरुआत होते ही तबाही मचाने वाले झटकों के पहुँचने से कुछ सेकंड पहले अलर्ट जारी करने वाली तकनीक विकसित कर ली गई है।
इसी तकनीक को ‘अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (EEW) कहा जाता है, जो आज के समय में लाखों लोगों की जान बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है।
आईआईटी रुड़की ने तैयार किया है खास सिस्टम
भारत में इस दिशा में सबसे सफल और ऐतिहासिक प्रयास उत्तराखंड सरकार के सहयोग से आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) ने किया है। आईआईटी रुड़की ने एक अत्याधुनिक भूकंप अर्ली वॉर्निंग मोबाइल ऐप और सिस्टम ‘भूदेव’ तैयार किया है। तकनीकी रूप से यह सिस्टम भूकंप के दौरान पैदा होने वाली तरंगों के सिद्धांत पर काम करता है।
जब जमीन के नीचे फॉल्ट लाइनों में हलचल होती है, तो सबसे पहले ‘पी-वेव’ (Primary Wave) निकलती है। यह तरंग बेहद तेज गति से चलती है लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता। इसके कुछ सेकंड बाद सबसे विनाशकारी ‘एस-वेव’ (Secondary Wave) और अन्य सतही तरँगें पहुँचती हैं, जो इमारतों को गिराती हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में जमीन के भीतर लगाए गए सेंसरों का घना नेटवर्क इन गैर-नुकसानदेह पी-वेव्स को तुरंत पकड़ लेता है। जैसे ही सेंसर इन तरंगों को डिकोड करते हैं, वे कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए सीधे केंद्रीय सर्वर और आम लोगों के मोबाइल ऐप ‘भूदेव’ पर अलर्ट भेज देते हैं।
यह चेतावनी मिलने का समय इस बात पर निर्भर करता है कि कोई खास शहर या इलाका भूकंप के केंद्र (Epicenter) से कितनी दूरी पर स्थित है। यदि कोई क्षेत्र भूकंप के केंद्र के बिल्कुल नजदीक है, तो वहाँ लोगों को संभलने का समय लगभग न के बराबर मिलेगा, लेकिन केंद्र से दूर स्थित घने बसे मैदानी शहरों को कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक का अमूल्य मार्जिन मिल जाता है।
इस बेहद महत्वपूर्ण समय अंतराल का उपयोग बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए किया जा सकता है। कुछ ही सेकंड के इस लाइफ-सेविंग मार्जिन के दौरान स्वचालित प्रणालियों के जरिए हाई-स्पीड ट्रेनों को रोका जा सकता है, घरेलू और औद्योगिक गैस पाइपलाइनों की सप्लाई को ऑटोमेटिक कट किया जा सकता है, मेट्रो सेवाओं को स्टेशनों पर ही थामने के निर्देश दिए जा सकते हैं और बिजली ग्रिडों को नियंत्रित कर बड़े शॉर्ट-सर्किट या आगजनी की घटनाओं को टाला जा सकता है। इसके साथ ही बहुमंजिला इमारतों और घरों में मौजूद आम नागरिकों को खुले मैदानों या सुरक्षित स्थानों पर भागने का मौका मिल जाता है।
भारत सरकार के वैज्ञानिक प्रतिष्ठान इस तकनीक को और अधिक सटीक और व्यापक बनाने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं। सरकार ने इस संबंध में संसद को भी आधिकारिक रूप से अवगत कराया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, “हिमालयी क्षेत्र में भूकंप की पूर्व चेतावनी (EEW) के लिए एक रियल-टाइम सिस्मिक नेटवर्क पूरी तरह से शुरू कर दिया गया है। इसके साथ ही, नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) क्षेत्रीय डेटा का इस्तेमाल करते हुए पी-वेव्स (P-Waves) का तेजी से पता लगाने, भूकंप की तीव्रता का तत्काल अनुमान लगाने और संभावित झटकों की जल्द भविष्यवाणी करने के लिए नए प्रोटोटाइप एल्गोरिदम भी विकसित कर रहा है।”
गढ़वाल और कुमाऊँ में तैनात हैं खास सेंसर
वर्तमान में ये एडवांस सेंसर मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों की सक्रिय भ्रंश रेखाओं (Active Fault Lines) के पास घने नेटवर्क के रूप में स्थापित किए गए हैं। देश के सबसे संवेदनशील सीस्मिक जोन-5 के बेहद करीब होने के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि गढ़वाल या कुमाऊँ क्षेत्र में 8 या 9 तीव्रता का कोई बड़ा भूकंप आता है, सीस्मिक जोन-4 में आने वाले दिल्ली-एनसीआर को इस अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए संभलने के लिए लगभग 40 से 60 सेकंड का बहुमूल्य समय मिल सकता है, जो राजधानी में मची भारी तबाही और लाखों मौतों को रोकने में गेम-चेंजर साबित होगा।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो भूकंप की पूर्व चेतावनी देने के मामले में जापान, ताइवान और अमेरिका दुनिया के सबसे उन्नत देश माने जाते हैं, जहाँ इस तकनीक ने हजारों जिंदगियाँ बचाई हैं। वेनेजुएला की ताजा और भयानक त्रासदी भारत को सचेत करती है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन ‘भूदेव’ जैसे आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम के विस्तार, भूकंप-रोधी निर्माण तकनीकों और जन-जागरूकता के बेहतरीन तालमेल से देश को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।


