Wednesday, July 6, 2022
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अयोध्या पर फैसला मान लें मुस्लिम, ऐसी कोई भी कोशिश न करें जिससे देश का माहौल खराब हो: पर्सनल लॉ बोर्ड

"ऐसी कोई भी कोशिश नहीं की जानी चाहिए जिससे देश के माहौल में खराबी हो और सोशल मीडिया पर भी संयम से काम लिए जाने की ज़रूरत है। मुस्लिमों को परिणामों को लेकर डरने या किसी भी प्रकार से चिंतित होने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने लोगों से अपील की है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि के मालिकाना हक के विवाद में जो भी फैसला आए, उसे वे शांतिपूर्वक स्वीकार कर लें। इस मुकदमे का फैसला 17 नवंबर, 2019 को चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) रंजन गोगोई के रिटायर होने के ठीक पहले आने की उम्मीद जताई जा रही है।

एआईएमपीएलबी के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्णय देता है, उसका सभी को सम्मान करना चाहिए और उसे स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। उन्होंने मुस्लिमों से फैसले के अपनी उम्मीदों पर खरा न उतरने की सूरत में किसी भी प्रकार की नारे बाजी या किसी विरोध प्रदर्शन का हिस्सा न बनने की भी अपील की है। “ऐसी कोई भी कोशिश नहीं की जानी चाहिए जिससे देश के माहौल में खराबी हो और सोशल मीडिया पर भी संयम से काम लिए जाने की ज़रूरत है। मुस्लिमों को परिणामों को लेकर डरने या किसी भी प्रकार से चिंतित होने की कोई ज़रूरत नहीं है।”

शिया मौलवी और लखनऊ व उत्तर प्रदेश की मुस्लिम सियासत में बड़ा दखल रखने वाले मौलाना कल्बे जव्वाद ने भी कहा कि अदालत का निर्णय सभी को मान्य होगा और किसी भी पार्टी को देश की शांति भंग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उन्होंने साथ ही में यह भी जोड़ा, “हम संविधान और कानून की इज़्ज़त करते हैं और अदालत के फैसले की तामील करेंगे। जो शांति को भंग करने की कोशिश करेंगे, उन्हें इस्लाम के सच्चे नुमाइंदे नहीं कहा जा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की घड़ी जैसे जैसे पास आती जा रही है, शांति की अपील करने वाले मुस्लिम मौलवियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के विवादित 2.77 एकड़ जमीन के स्वामित्व के लिए हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों द्वारा दायर की गई अपील पर 40 दिन सुनवाई चली थी। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों वाली पीठ ने इस मामले पर 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस मामले में दोनों पक्षों ने इतिहासकारों, ऐतिहासिक यात्रियों, गैजेटियर, अंग्रेज के जमाने से चले आ रहे जमीन संबंधी कागजातों के साथ अपनी-अपनी आस्था का पक्ष भी रखा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों को भी सुनवाई के दौरान जजों के समक्ष रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 के अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बाँटा था – राम लला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिलहाल दिवाली की छुट्टियों के तहत बंद सुप्रीम कोर्ट जब 4 नवंबर को खुलेगा, तो कैसा फैसला आएगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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