Tuesday, September 29, 2020
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JNU हिंसा के दो चेहरे: जानिए कौन हैं नकाबपोशों का नेतृत्व करने वाली आइशी घोष और गीता कुमारी

ये वीडियो सूर्यास्त के पहले का है, जिससे पता चल जाता है कि हमले किसने किए। आइशी नकाबपोशों को दिशा दिखा रही हैं कि उन्हें किधर जाना है। जेएनयूएसयू ने भी पुष्टि की है कि वो आइशी ही है लेकिन उसका कहना है कि वो एबीवीपी के लोगों को हॉस्टल से भगाने के लिए अंदर गई थी।

जेएनयू में हुई हिंसा में ऐसे तो कई वामपंथी छात्र नेताओं के नाम सामने आए हैं लेकिन दो ऐसी महिला नेताएँ हैं, जिन्होंने मास्क पहने हिंसक भीड़ के नेतृत्व किया। दो अलग-अलग वायरल वीडियो में इन दोनों को देखा जा सकता है। एक महिला होकर महिला छात्रों पर ही अत्याचार करना, ये कहाँ तक जायज है? अव्वल तो ये कि बाद में यही वामपंथी महिलाधिकार के नाम पर धरना देते हैं, प्रदर्शन करते हैं और कैंडल लेकर निकलते हैं। जेएनयू की हिंसा की पहली किरदार हैं जेएनयूएसयू की वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष। वहीं इसकी दूसरी किरदार हैं- गीता कुमारी, जेएनयूएसयू की पूर्व अध्यक्ष।

आइशी और गीता, ये दोनों ही वामपंथी छात्रों का नेतृत्व करती रही हैं। सबसे पहले बात आइशी घोष की। अभी वो मीडिया के सामने बड़े-बड़े बयान देने में लगी हुई हैं। वो न हारने और न डरने की बातें करते हुए दावा कर रही हैं कि एबीवीपी ने उन पर हमला किया। लेकिन, वायरल वीडियो कुछ और स्थिति बताते हैं। एक वायरल वीडियो में आइशी घोष कुछ नकाबपोश लोगों के साथ जाती दिख रही हैं। वैसे तो उन्होंने पूरी सतर्कता बरती लेकिन वीडियो फुटेज ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। एक व्यक्ति ने ऊपर से अपने फोन से वीडियो लिया, जिससे आइशी की पोल खुल गई।

ये वीडियो सूर्यास्त के पहले का है, जिससे पता चल जाता है कि हमले किसने किए। आइशी नकाबपोशों को दिशा दिखा रही हैं कि उन्हें किधर जाना है। जेएनयूएसयू ने भी पुष्टि की है कि वो आइशी ही है लेकिन उसका कहना है कि वो एबीवीपी के लोगों को हॉस्टल से भगाने के लिए अंदर गई थी। जेएनयू छात्र संगठन अपने ही बयान में फँस गया। आइशी घोष सितंबर 2019 में सीपीएम के समर्थन से जेएनयूएसयू की अध्यक्ष बनी थीं। आइशी ने जीतने के बाद कहा था कि वो वामपंथ से प्रेरित हैं क्योंकि वामपंथ ही एक ऐसी विचारधारा है जो चुनाव पर चुनाव हारने के बावजूद लोगों से जुड़े मुद्दे उठाती है।

आइशी घोष के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें भी चोटें आई हैं। हालाँकि, जब वो हॉस्टल में घुसती दिख रही हैं, तब उन्हें चोट नहीं आई थी। इससे सवाल उठता है कि जब वो हिंसा करने वाले नकाबपोशों के साथ थीं तो फिर उन्हें चोट कैसे आ गई? मीडिया को भी सम्बोधित करने वो सिर में मरहम-पट्टी लगा कर आईं। हालाँकि, वामपंथी इससे पहले भी हिजाब और जैकेट के ऊपर से पट्टी बाँधने का नाटक कर चुके हैं। अगर आइशी को सच में किसी एबीवीपी वाले ने पीटा है तो फिर उसका कोई वीडियो और फोटो क्यों नहीं है? आइशी ने ही दावा किया था कि जब उनपर हमला हुआ, तब वहाँ उनके कई साथी मौजूद थे।

ये वही आइशी घोष हैं, जिन्होंने जेएनयू हॉस्टल फी बढ़ाने के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस दौरान छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। आइशी ने दिल्ली पुलिस पर छात्राओं के साथ अभद्रता करने का गंभीर आरोप लगाया था। अभी भी आइशी हिंसा के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा रही हैं जबकि जेएनयू के चुनावों में आरएसएस हिस्सा लेता ही नहीं है और न ही वो एक राजनीतिक पार्टी है। इस प्रोपेगंडा में आइशी घोष के परिवार का भी बयान लाया जा रहा है, जिसमें उनके पिता कहते दिख रहे हैं कि आज उनकी बेटी पर हमला हुआ है, कल को उनपर भी हो सकता है।

ये वामपंथी मीडिया का सबसे बड़ा प्रोपेगंडा रहा है। जब भी उनके गुट के किसी व्यक्ति पर कुछ आरोप लगते हैं या उसकी पोल खुलती नज़र आती है तो मीडिया उसके घर जाकर माता-पिता का इंटरव्यू लेता है और सहानुभूति की लहर तैयार करता है। न सिर्फ़ बुरहान वानी जैसे आतंकियों, बल्कि हैदराबाद के बलात्कारियों के साथ भी ऐसा ही किया गया। वामपंथी अक्सर महिलाओं, छात्रों और दिव्यांगों को आगे कर के अपनी लड़ाई लड़ते हैं। वो बार-बार दलितों और मुस्लिमों का नाम आगे करते हैं ताकि ऐसा लगे कि वो उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय पब्लिसिटी मिलती है।

हिंसक भीड़ का नेतृत्व कर रही दूसरी महिला का नाम है गीता कुमारी। गीता को सितम्बर 2017 में जेएनयूएसयू का अध्यक्ष चुना गया था। गीता ने जब चुनाव जीता था, तब उन्होंने कहा था कि उनके माता-पिता पहले चाहते थे कि वो पढ़ाई पर अपना ध्यान केंद्रित करें। हालाँकि, उनका कहना था कि बाद में उनके घरवालों ने उनका समर्थन किया। जैसी कि वामपंथ की प्रकृति है, वो घरवालों के ख़िलाफ़ बगावत करने और माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को क्रांति के रूप में देखते हैं। जामिया हिंसा मामले में जब चंदा यादव नामक युवती की ब्रांडिंग का प्रयास किया गया था, तब उसके बारे में भी यही प्रचारित किया गया था। कहा गया था कि चंदा के माता-पिता को लगता था कि जामिया में वो मुस्लिमों के बीच कैसे रहेगी, लेकिन उसने परिवार के विरुद्ध जाकर वहाँ दाखिला लिया।

गीता कुमारी को एक वीडियो में हॉस्टल में बैठ कर नकाबपोशों से बातचीत करते देखा जा सकता है। उन्हें एक व्यक्ति आग्रह कर रहा होता है कि वो लोग जो भी करें वो 100 मीटर से दूर रह कर। इस वीडियो में वो उस व्यक्ति की बातों को अनसुनी कर हिंसा की योजना बनाते दिख रही हैं। उनके साथ नकाबपोश दिख रहे हैं, जिन्होंने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पिटाई की। गीता के चुनाव के दौरान न सिर्फ़ जम्मू कश्मीर और फिलिस्तीन की ‘आज़ादी’ का मुद्दा उछाला गया था, बल्कि नजीब को लेकर पीएम मोदी से सवाल पूछे गए थे।

गीता इससे पहले भी उपद्रव कर चुकी हैं। उन्होंने दर्जनों छात्रों के साथ जेएनयू में डीन के दफ्तर में हंगामा किया था। प्रोफेसर उमेश कदम ने बताया था कि गीता और उनके साथियों ने उनके दफ्तर में घुस कर उन पर हमला कर दिया। प्रोफेसर कदम को गीता और उनके साथियों ने मिल कर बँधक बना लिया था। बाद में सिक्योरिटी गार्ड्स की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया। गीता और उनके साथियों पर वीसी को गाली देने का भी आरोप लगाया था। उन्होंने वीसी के मंच के पास जाकर उपद्रव किया था। गीता भी एक ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ की तरह हैं। इन दोनों महिला नेताओं ने जेएनयू की हिंसा में अहम किरदार निभाया, ऐसा कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है और कई वीडियो से भी खुलासा हुआ है।

जब ऑपइंडिया ने जेएनयू के कुछ छात्रों से गीता और आइशी के बारे में जानना चाहा तो पता चला कि ये दोनों ही भाजपा के ख़िलाफ़ घृणा लेकर घूमती हैं और अक्सर ब्राह्मणों के बारे में भली-बुरी बातें बोलती हुई पाई जाती हैं। इससे पता चलता है कि ये दोनों और इनका छात्र संगठन जातिवादी ज़हर बोने के भी प्रयास करता रहता है। गीता के बारे में कहा जाता है कि वो अक्सर अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के सेना में होने की बात बोलती है। बता दें कि ट्रोल गुरमेहर कौर भी विरोधियों को चुप कराने के लिए अपने पिता के बलिदानी होने की बात उठाती आई हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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