Homeदेश-समाजसोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों बन जाता है?

सोनम वांगचुक का अनशन हेडलाइन, ग्रामीणों का सत्याग्रह फुटनोट क्यों बन जाता है?

क्या आमरण अनशन करना कानूनी है? सरकार और पुलिस कब हस्तक्षेप कर सकती है? कब गिरफ्तारी या अस्पताल भेजा जा सकता है? सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर चर्चाओं के बीच जानिए सब कुछ।

सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी में उन बेरोजगार युवकों को ‘कॉकरोच’ बताया जो सोशल मीडिया को किसी पर भी अटैक करने का हथियार बनाते हैं। खलिहरों की एक जमात ने इसमें वायरल होने का मौका देखा। बीजेपी और नरेंद्र मोदी विरोधी एजेंडा को पुश करने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम की दुकान खोल ली। सोशल मीडिया में फॉलोअर, लाइक, शेयर, ट्रेंड का धंधा चकाचक चलने के बाद, जब इस दुकान की लॉन्चिंग जमीन पर हुई तो उसे जन समर्थन ही नहीं मिला।

फिर भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर उन्होंने एक टेंट गाड़ रखा है। सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) नाम के एक ‘आंदोलनजीवी’ को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बिठा रखा है। 17 दिन के अनशन के बाद भी जनसमर्थन नहीं मिलने के बाद, यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास हो रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार ही असंवेदनशील है, क्योंकि वांगचुक के समर्थन में सोशल मीडिया पर भारत के विपक्षी नेताओं की छाती में दूध उतर आया है। मीडिया भी इस तमाशे को हाइप देने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही।

अब दिल्ली के जंतर मंतर से सीधे मध्य प्रदेश चलते हैं। यहाँ केन-बेतवा लिंक परियोजना के कथित प्रभावितों का छतरपुर में प्रदर्शन चल रहा है। बारिश से नदी उफान पर है। फिर भी ग्रामीण अपनी माँगों के समर्थन में जल सत्याग्रह कर रहे हैं। कभी चिता पर लेटकर तो कभी सांकेतिक फाँसी के जरिए।

क्या इनके समर्थन में आपने किसी नेता, किसी अभिनेता को देखा-सुना है? क्या सोशल मीडिया पर इनके समर्थन में आपने ट्रेंड या रील की बाढ़ देखी है? क्या मेनस्ट्रीम मीडिया को इनके प्रदर्शन पर चर्चा करते आपने देखा है?

इन सभी सवालों का जवाब है- नहीं। क्या इस उपेक्षा की वजह यह है कि जंतर-मंतर देश की संसद से सटा हुआ है और मध्य प्रदेश का छतरपुर इसी संसद से सैकड़ों किलोमीटर दूर है? या फिर ये सोच कि जंतर-मंतर के तमाशे में नामचीन ​खलिहर शामिल हैं जो टीआरपी और वायरल कंटेंट देते हैं, जबकि छतरपुर के प्रदर्शन में इस देश के वे सामान्य लोग हैं जिन्हें शायद ही पता हो कि टीआरपी और वायरल कंटेंट आखिर किस चिड़िया का नाम है?

मैं यहाँ इस चर्चा में नहीं जाना चाहता कि ये दोनों प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। इन चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए हैं। इसमें भी नहीं जाना चाहता कि इनकी माँगें कितनी जायज है और जो ये माँग रहे हैं क्या वही पूरी समस्या का समाधान है। इस पर गूगल करेंगे तो आपको सारी जानकारी मिल जाएगी।

पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर आंदोलन/प्रदर्शन/सत्याग्रह/अनशन का एक ही लक्ष्य होता है- सत्ता को झुकाकर समझौते के लिए बाध्य करना। अतीत के आंदोलनों के अनुभव बताते हैं कि सरकार उन प्रदर्शनों के सामने कभी नहीं झुकती, जिसके साथ व्यापक समाज का समर्थन नहीं हो। वह उनके साथ भी समझौता नहीं करती, जिस प्रदर्शन का उद्देश्य किसी परिणाम तक पहुँचने की जगह एक समझौते के बाद दूसरे समझौते के लिए दबाव बनाना हो। साथ ही सीजेपी की शुरुआत से ही यह स्पष्ट है कि आज जिस समझौते के लिए वांगचुक को अनशन पर बिठाया गया है, उसके पीछे कुछ ‘आंदोलनजीवी’ हैं। आज के समय में ऐसा हर गिरोह बेनकाब हो चुका है। किसी के पास भी नैतिक मूल्य नहीं बचा है।

साफ है कि सोनम वांगचुक के अनशन से केवल शशि थरूर, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी जैसे ​​ही ‘भावुक’ हो पा रहे हैं और सत्ता नहीं झुक रही तो इसका मतलब उसका असंवेदनशील होना नहीं है। तानाशाह होना नहीं है। मक्कार होना नहीं है।

यदि सरकार असंवेदनशील होती तो मध्य प्रदेश की इसी बीजेपी सरकार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावितों के लिए 202.5 करोड़ रुपए के अतिरिक्त पुनर्वास पैकेज को मँजूरी नहीं दी होती। स्थानीय विधायक ने कहा है कि इस पैकेज के तहत प्रभावित परिवारों को 12.5 लाख रुपए का पुनर्वास अनुदान एक ही बार में दिया जाएगा।

ऐसे में सवाल सरकार से नहीं, CJP से है। यदि वांगचुक की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि वे मृत्यु के कगार तक पहुँच चुके हैं, फिर भी उनके समर्थन में समाज का वह व्यापक समर्थन क्यों नहीं आ रहा है? जाहिर है वांगचुक और उनके साथियों के लिए संदेश है कि ‘हठ छोड़ो, आत्ममंथन करो’। लेकिन जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट और मंच को ‘डांस इंडिया डांस’ का स्टेज समझने वाले कॉकरोचों से इसकी उम्मीद बेमानी है।

क्या अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल अपराध है?

सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह सोनम वांगचुक या किसी को भी अपनी माँगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से रोके। अनशन कोई अपराध नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी ऐसी स्थिति में तभी बनती है, जब उसे लगे कि किसी व्यक्ति का आमरण अनशन सार्वजनिक व्यवस्था, उसके खुद के जीवन की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था पर प्रभाव डाल सकता है।

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत व्यवस्था, सुरक्षा, नैतिकता आदि के आधार पर सरकार उचित प्रतिबंध अवश्य लगा सकती है।

भूख हड़ताल से कब रोक सकती है पुलिस?

इस मामले में पुलिस की जिम्मेदारी तभी बनती है, जब उसे लगे कि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। हिंसा होने की आशंका है। ट्रैफिक बाधित हो रहा है। सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है। या फिर अनशनकारी की स्वयं की जान को खतरा है।

ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनुसार मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकते हैं। धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। राज्यों के पुलिस अधिनियम भी प्रदर्शन की जगह बदलने या अनुमति रद्द करने जैसे अधिकार देते हैं।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबरन अस्पताल ले जा सकते हैं?

यदि डॉक्टर को लगे कि अनशन करने वाले की जान खतरे में है तो उसे जबरन भी अस्पताल ले जाया जा सकता है। अस्पताल में भर्ती कर निगरानी की जा सकती है। कई मामलों में अदालतें कह चुकी हैं कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।

क्या आमरण अनशन करने वाले को जबर्दस्ती भोजन दे सकते हैं?

अनशन करने वाले व्यक्ति को जबरन खाना खिलाने के प्रावधान को स्पष्ट तौर पर परिभाषित करता कोई कानून नहीं है। पर व्यवहार में ऐसा देखा गया है कि मेडिकल राय, मजिस्ट्रेट के आदेश या अदालती निर्देशों पर यह भी किया जा सकता है।

क्या भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं?

ऐसे मामलों पर गिरफ्तारी पूरी तरह परिस्थिति पर निर्भर करती है। जैसे- अवैध जमावड़ा, प्रशासनिक ड्यूटी में बाधा, सार्वजनिक रास्ता रोकना, आदेशों की अवहेलना वगैरह।

आमरण अनशन की स्थिति में सरकार आमतौर पर क्या करती है?

ऐसी स्थिति में प्रशासन बातचीत से रास्ता निकालने का प्रयास करता है। मेडिकल टीम अनशन करने वाले की नियमित जाँच करती है। गंभीर स्थिति होने पर अस्पताल ले जाती है।

मणिपुर में इरोम शर्मिला को लंबे समय तक हिरासत में रखकर नाक के माध्यम से पोषण दिया जाता था। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए शासनकाल में इसी दिल्ली में अन्ना हजारे को अनशन शुरू करने के बाद हिरासत में ले लिया गया था। लेकिन बाद में रिहा कर निर्धारित स्थान पर अनशन की अनुमति दे दी गई थी। ठीक उसी काल खंड में स्वामी रामदेव के आंदोलन पर पुलिस ने कानून-व्यवस्था को आधार बनाकर बल प्रयोग किया था।

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अजीत झा
अजीत झा
संपादक, ऑपइंडिया (हिंदी)

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