Monday, November 30, 2020
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‘हमें ज़िंदा रहना है, ‘उन पर’ FIR कराने के बाद यह परिवार ज़िंदा बचेगा?’ – हिंदुओं के डर के 5 खौफनाक सबूत

"इनका (मुस्लिमों का) कोई इलाज नहीं, हम पीड़ित हैं और पीड़ित ही रहेंगे।" - डर का आलम यह है कि इलाके के लोग पीड़ित हिंदू के घर का पता तो बताते हैं, लेकिन साथ चलने से मना करते हैं क्योंकि बीच-बीच में मुस्लिमों का इलाका पड़ता है।

दिल्ली में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा भले ही शांत हो गई हो, लेकिन हिंसा क्षेत्र में कूड़े-कचरे की तरह बिखरी एक-दो नहीं बल्कि हज़ारों तस्वीर हिंदुओं पर बरपे कहर को चीख-चीखकर बयाँ कर रही है। यही कारण है कि डर और भय के साथ बंद कमरे में अपनी पीड़ा से कराह रहा हिंदू न तो खुलकर बोलने को तैयार है और न ही आरोपित के ख़िलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने को। वहीं शेष हिंदुओं के डर का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अब तक हजारों पीड़ित हिंदू परिवार अपने घरों को खाली करके हिंसा प्रभावित क्षेत्र से पलायन कर चुके हैं।

अब जरा आप भी समझिए कि हिंसा प्रभावित इलाकों में पीड़ित हिंदू के डर का आलम क्या है! पुलिस फोर्स के सख्त पहरे का असर खजूरी चौहारे से ही दिखाई देना शुरू हो जाता है। दिल्ली हिंसा की पहली तस्वीर चाँद बाग चौराहे पर दिखाई पड़ती है। इसके बाद तो आपके क़दम जैसे-जैसे खजूरी ख़ास, करावल नगर, जाफराबाद और फिर शिव विहार की ओर बढ़ते जाएँगे, वैसे-वैसे वह खौफनाक मंजर आपकी आँखों के सामने आ जाएगा, जिसे आपकी आँखों के पीछे बुना और रचा गया था। मेन रोड के सभी बाजार पूरी तरह से बंद हैं। बस दिखाई देती है तो जली हुई गाड़ियाँ और जले हुए मकान या फिर दुकान।

हिंदुओं के मन में व्याप्त हुए डर का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि हम जिस भी हिंदू पीड़ित से मिलने के लिए गए, उसने हमसे बात करना तक उचित नहीं समझा। किसी ने बात भी की तो उसने अपना नाम बताना जरूरी नहीं समझा और जिसने नाम भी बता दिया तो उसने साफ मना कर दिया कि न तो हम किसी के खिलाफ़ थाने में शिकायत करना चाहते हैं और न ही हम अपनी बात मीडिया के माध्यम से किसी से कहना चाहते हैं। इस बीच एक बात सभी ने एक स्वर में कही कि हम तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक कि हमारे पास पुलिस फोर्स का पहरा लगा हुआ है। वरना नहीं पता ये जालिम कब और किस रूप में हमारे ऊपर हमला कर दें।

हिंदुओं के डर का पहला सबूत- हिंदू विरोधी हिंसा में मारे गए राहुल ठाकुर के परिजनों से हम बात कर ही रहे थे कि वहाँ मौजूद बृजपुरी क्षेत्र के लोगों का डर जुबाँ पर आ गया। एक चश्मदीद ने चारों ओर देखते हुए कहा, “सर आज हमें सात दिन हो गए हैं, न तो हम अपने घरों से निकले हैं और न ही हम किसी काम से अभी तक बाहर गए हैं और रही हिंसा के शुरुआती दिनों की बात तो, चार दिनों तक हम पूरी रात सोए नहीं। सभी ने अपनी-अपनी गलियों में पूरी रात पहरा भी दिया।” इतना ही नहीं, चश्मदीद ने आगे दावा करते हुए बताया कि अग़र बृजपुरी क्षेत्र की बात करें तो जिस दिन से इलाके में हिंसा हुई, उस दिन से अब तक सैकड़ों परिवार अपने घरों में ताला लगाकर जा चुके हैं।

हिंदुओं के डर का दूसरा सबूत- हम हिंदू विरोधी दंगे में ग़ायब हुए धर्मेन्द्र के घर की तलाश कर रहे थे। इसके लिए हमने एक राह चलते युवक से धर्मेन्द्र के घर का पता पूछ लिया। उन्होंने हमें पूरा पता तरीके से बताया। इस बीच दबी जुबान से वह यह भी बोल गए कि हम आपके साथ जा तो सकते थे, लेकिन बीच में मुस्लिमों का इलाका पड़ता है। दरअसल वो हमें जिस जगह से रास्ता बता रहे थे, वहाँ से धर्मेन्द्र के घर की दूरी मात्र 300 से 400 मीटर थी। फिर जब हम हिंसा में ग़ायब हुए धर्मेन्द्र के यहाँ पहुँचे तो गली में ऐसे कई घर मौजूद थे, जिनमें ताले लगे हुए थे। वहीं धर्मेन्द्र का परिवार इतना डरा हुआ था कि वह हमसे बात करने के लिए न तो ऊपर घर में बुलाना चाहता था और न ही छत से नीचे आना चाहता था।


दिल्ली के हिंसा प्रभावित इलाके में पीड़ित हिंदुओं के घर पर लटके ताले

हिंदुओं के डर का तीसरा सबूत- हम जब हिंसा में मारे गए आलोक तिवारी के यहाँ शिव विहार पहुँचे तो वहाँ हमारी मुलाक़ात उनकी पत्नी कविता से हुई। जब हमने पूछा कि क्या आपने अभी तक घटना के संबंध में कोई FIR थाने में दर्ज कराई है, तो उनकी पत्नी ने हमारी ओर देखा तो सही, लेकिन कुछ बोला नहीं। इसके बाद पास में खड़े एक पड़ोसी ने कहा कि जिस व्यक्ति का शव ही उन्हें बड़ी मश्क्कत के बाद तीन दिन में मिला हो, तो ऐसे में भला कोई FIR क्या ही करा सकता है! इसके बाद उन्होंने उल्टा हमसे एक सवाल कर दिया और कहा कि आपको क्या लगता है कि FIR कराने के बाद यह परिवार ज़िंदा रह पाएगा? इसलिए हमें ज़िंदा रहना है। वैसे उन्होंने बताया कि इस संबंध में पास के एक नेता जी ने थाने में अज्ञात लोगों पर मुकदमा दर्ज करा दिया है।

हिंदुओं के डर का चौथा सबूत– पीड़ितों से मुलाक़ात करते हुए हम जोहरीपुर इलाके में उस विवेक के यहाँ पहुँचे, जिसके सर में दंगाइयों ने ड्रिल घुसा दिया था। जब हम विवेक के घर के सामने खड़े थे, तो अंदर से विवेक की माता जी ने हमें देखा और हमसे हमारा परिचय पूछा। इसके बाद तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि हमें किसी से कोई बात नहीं करनी। हमें बस हमारा बेटा ठीक चाहिए। भगवान से प्रार्थना है कि वह जल्दी से घर लौट आए। जब हमने उनसे पूछा कि आपने अभी तक पुलिस में कोई शिकायत की है तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। “हमें किसी से कोई शिकायत नहीं करनी” – इतना कहकर वह अपने घर के अंदर चली गईं।

हिंदुओं के डर का पाँचवा सबूत- जब हम जाफराबाद की ओर जा रहे थे तो हमने एक दुकान से खाने-पीने का कुछ सामान लिया। दुकान पर बैठे दादा जी से ही हमने पूछ लिया कि क्या माहौल है अभी। इसके बाद उन्होंने पहले तो हमारा नाम पूछा, जब उनको यकीन हो गया कि उन्हें मुझसे कोई खतरा नहीं, तो वह खुलकर बोले और कहा, “इनका (मुस्लिमों का) कोई इलाज नहीं, हम पीड़ित हैं और पीड़ित ही रहेंगे।” उन्होंने दावा किया कि सौ- दो सौ नहीं हज़ारों लोग क्षेत्र से अपना सामान लेकर जा चुके हैं। हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से ज्यादातर लोग वह हैं, जो किसी भी तरह से हिंसा की चपेट में आए या फिर किराए के मकान में रहते थे।

आख़िर में, एक बाईक पर जा रहे तीन युवाओं ने तो चलते-चलते एक नारा भी दे दिया। “अबकी बार हो गई भूल, फिर से खिलेगा कमल का फूल।” खैर, दिल्ली में हुई हिंदू विरोधी हिंसा से एक बात तो साफ है कि मुस्लिम दंगाइयों द्वारा हिंदुओं को दिए दर्द को न तो कोई हिंदू पीड़ित भूलने को तैयार है और न ही उसे कभी भुलाया जा सकता है।

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