Tuesday, May 17, 2022
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‘जर्जर दीवार या मंच को मस्जिद का दर्जा नहीं दिया जा सकता’: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान वक्फ बोर्ड की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था कि खनन साइट पर एक मस्जिद थी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि डेडिकेशन या उपयोग के किसी भी सबूत के अभाव में, एक जर्जर दीवार या मंच को नमाज़ या नमाज़ अदा करने के उद्देश्य से मजहबी स्थान (मस्जिद) का दर्जा नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने वक्फ बोर्ड राजस्थान बनाम जिंदल सॉ लिमिटेड मामले में सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

बार एंड बेंच रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की खंडपीठ ने राजस्थान राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के सितंबर 2021 के फैसले को चुनौती देने वाली एक अपील को खारिज कर दिया, जिसके द्वारा उसने जिंदल सॉ लिमिटेड को खनन के लिए आवंटित भूखंड से एक संरचना को हटाने की अनुमति दी गई थी। जिस पर वक्फ बोर्ड, राजस्थान ने दावा किया था कि यह एक धार्मिक स्थल है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था कि खनन साइट पर एक मस्जिद थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “किसी भी समय इस बात का कोई सबूत नहीं है कि संरचना का इस्तेमाल मस्जिद के रूप में किया जा रहा था। डेडिकेशन, उपयोग या अनुदान का कोई आरोप या सबूत नहीं है जिसके आधार पर इसे वक्फ अधिनियम 1995 के तहत वक्फ बोर्ड की संपत्ति कहा जा सकता है। किसी भी सबूत के अभाव में, एक जर्जर दीवार या एक मंच को प्रार्थना / नमाज़ अदा करने के उद्देश्य से मजहबी स्थान (मस्जिद) का दर्जा नहीं दिया जा सकता है।”

मीडिया रिपोर्ट अनुसार, राजस्थान राज्य के वक्फ के सर्वेक्षण आयुक्त ने 1963 में एक सर्वेक्षण किया था और एक संरचना को ‘तिरंगा की कलंदरी मस्जिद’ के रूप में वक्फ की प्रॉपर्टी के रूप में अधिसूचित किया था।

2012 में, अंजुमन समिति ने अपीलकर्ता-बोर्ड के अध्यक्ष को इस सम्बन्ध में एक पत्र लिखते हुए बताया था कि तिरंगा पहाड़ी पर, तथाकथित कलंदरी मस्जिद पर एक दीवार और चबूतरा (मंच) है लेकिन हाल के दिनों में वहाँ कोई आता-जाता नहीं और न ही किसी को वहाँ नमाज अदा करते देखा गया है।

बोर्ड ने बाद में स्थानीय अधिकारियों और पुलिस अधीक्षक को भी सूचित किया कि अंजुमन समिति ने व्यक्तिगत लाभ के लिए काम किया है। उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई और समिति से पैसा भी बरामद किया गया।

इसके बाद, जिंदल सॉ लिमिटेड ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसने यह निर्धारित करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया कि खनन के लिए आवंटित भूखंड पर मस्जिद था या नहीं।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च न्यायालय ने बाद में जिंदल सॉ लिमिटेड को दिसंबर 2010 में ढेडवास गाँव, भीलवाड़ा, राजस्थान के पास पट्टा दिया गया था। अदालत ने उसी पट्टे के अनुसार खनन की अनुमति दी, जिससे के लिए तत्काल अपील की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दिखाने के लिए कोई राजस्व रिकॉर्ड नहीं था कि संरचना एक मस्जिद है। इसके अलावा, यह नोट किया गया कि संरचना बिना छत के जीर्ण-शीर्ण आकार में है और पेड़ पौधों से ढकी हुई है, और इस बात का कोई सबूत नहीं था कि उस स्थान का उपयोग नमाज़ अदा करने के लिए किया जा रहा था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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