गुजरात हाईकोर्ट ने 2021 में सामने आए धर्मांतरण मामले में दो मौलवियों की याचिका खारिज कर दी है। यह मामला भरूच जिले के आमोद तालुका से जुड़ा है। जस्टिस गीता गोपी की एकल पीठ ने 30 मार्च 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयान और रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से पहली नजर में धर्मांतरण की गतिविधियों के संकेत मिलते हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत नहीं है।
यह मामला नवंबर 2021 का है, जब आमोद पुलिस स्टेशन में एक FIR दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंकड़िया गाँव और आसपास के आदिवासी इलाकों में करीब 37 हिंदू परिवारों के लगभग 100 लोगों का लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। इस मामले में पुलिस अब तक कई आरोपियों के खिलाफ तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।
आरोपित मौलवी सरफराज उर्फ जावेद और रमिज राजा उर्फ औवेश अब्दुल गनी ने पहले सेशन कोर्ट में खुद को केस से हटाने की माँग की थी लेकिन वहाँ से उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दोनों के खिलाफ गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट और आईपीसी के तहत मामले दर्ज हैं।
कोर्ट में क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील उमर फारूक एम. खराड़ी ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलत फैसला दिया है और आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों मौलवियों को झूठा फँसाया गया है और उन्हें काफी लंबे समय बाद तीसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों लोग पेशे से मौलवी हैं और मजहब का प्रचार करना उनका काम है। वकील ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत धर्म का प्रचार करना एक मौलिक अधिकार है और इसलिए केवल धार्मिक गतिविधियाँ करने पर उनके खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता।
सरकार ने किया साजिश का पर्दाफाश
सरकारी वकील भार्गव पंड्या ने बचाव पक्ष की दलीलों का विरोध करते हुए कोर्ट में कहा कि यह मामला सिर्फ धर्म प्रचार का नहीं बल्कि गरीब लोगों को लालच देकर धर्मांतरण कराने की एक सोची-समझी साजिश है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि आरोपित जावेद मुफ्ती पहले भी कई भोले-भाले ग्रामीणों के धर्मांतरण में सक्रिय रहा है।
जाँच में सामने आया है कि आरोपित लोगों को नकद पैसे, नए कपड़े और दवाइयाँ देते थे। इसके अलावा, आदिवासी परिवारों को एयर कूलर, वाटर कूलर, ठेले (हैंडकार्ट) और नमाज के लिए चटाई या चादर जैसी सुविधाओं का लालच देकर इस्लाम अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता था।
मुख्य शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसावा ने आरोप लगाया कि साल 2018 में उन्हें और अन्य परिवारों को लालच देकर धर्मांतरण कराया गया था और उनके आधार कार्ड तक बदल दिए गए थे। वहीं, अन्य गवाहों ने भी पुलिस को बयान देकर बताया कि आरोपित रमिज राजा लोगों को सुविधाएँ देने का वादा करके धर्मांतरण करवाता था।
पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने 2019 की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी अक्सर लग्जरी कारों में कंकड़िया गाँव आते थे। गाँव का एक व्यक्ति वहाँ नियमित बैठकें आयोजित करता था, जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी और इस्लाम की जानकारी देने के नाम पर भाषण होते थे। पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि इन बैठकों के वीडियो सबूत के तौर पर उनके पास मौजूद हैं।
सरकारी वकील ने कहा कि गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 की धारा 5 और 2008 के नियम 3, 4 और 5 के तहत धर्मांतरण के लिए जो कानूनी अनुमति जरूरी है, उसका इस मामले में कहीं पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का पालन न होना ही इस गतिविधि को अवैध और आपराधिक साबित करने के लिए पर्याप्त है और इसलिए आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
आखिरकार, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को मान लिया और ट्रायल कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में सबूतों और गवाहों के बयानों की जाँच करने के बाद ऐसा लगता है कि मामला बनता है। इसके अलावा, इस बात के भी सबूत हैं कि ये मौलवी सिर्फ धर्मांतरण करवाने के इरादे से ही बैठकें कर रहे थे। कोर्ट ने साफ किया कि ट्रायल कोर्ट ने सही फैसला लिया था और हाईकोर्ट इसमें कोई दखल नहीं देगा। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
इसी मामले में गुजरात HC पहले भी अन्य आरोपितों की याचिकाएँ खारिज कर चुका है जिनमें FIR रद्द करने की माँग की गई थी। अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने ऐसी कुल सात याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी भी की थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति खुद धर्म परिवर्तन करने के बाद दूसरों को भी धर्म बदलने के लिए उकसाता या लालच देता है, तो उसे सिर्फ ‘पीड़ित’ नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति को आरोपित भी माना जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्या था पूरा मामला?
भरूच जिले के आमोद तालुका में जनजातीय हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया यह सामूहिक धर्मांतरण कोई एक-दो साल की घटना नहीं थी बल्कि 2006 से 2021 तक चलने वाली एक सुनियोजित साजिश थी।
पुलिस जाँच के मुताबिक, कंकड़िया गाँव के करीब 37 जनजातीय हिंदू परिवारों के 100 से ज्यादा लोगों को लालच देकर इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था जिसमें विदेश से फंडिंग और स्थानीय स्तर पर सक्रिय गिरोह शामिल था। इनका मुख्य मकसद गरीब जनजातीय लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तन कराना था।
इस मामले की शुरुआत शिकायतकर्ता प्रवीणभाई वसंतभाई वसावा से हुई। उन्होंने बताया कि 2018 में उन पर दबाव डालकर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया और उनका नाम बदलकर ‘सलमान पटेल’ कर दिया गया। बाद में उन्होंने पुलिस को बताया कि इलाके के लोग बेहद गरीब थे और आरोपितों ने इसी का फायदा उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि शुरुआत में उन्हें शरिया कानून के मुताबिक जीवन जीने के लिए कहा गया लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि यह सब लालच और धोखे का खेल था।
जाँच में सामने आया कि आरोपितों ने धर्मांतरण के लिए ‘इनाम, लालच और दबाव’ की नीति अपनाई थी। गरीब आदिवासियों को पैसे, अनाज, नौकरी, पक्के मकान और शादी जैसी झूठी उम्मीदें दी जाती थीं। उन्हें लगातार यह बताया जाता था कि हिंदू धर्म में कुछ नहीं है और इस्लाम ही बेहतर है। इस पूरे खेल में कानूनी धोखाधड़ी भी की गई। गाँव वालों को बहलाकर सूरत ले जाया जाता था और वहाँ उनसे गाड़ी में बैठाकर दस्तावेजों पर साइन करवाए जाते थे ताकि उनके आधार कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्रों में नाम और धर्म बदल दिया जाए।
नवंबर 2021 में आमोद पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में कई स्थानीय और विदेशी लोगों को आरोपी बनाया गया। इसमें शब्बीर और समद बेकरीवाला जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, लंदन में रहने वाले हाजी अब्दुल्ला फेफड़ावाला का नाम मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर सामने आया जो विदेश में धर्मांतरण की संख्या दिखाकर फंडिंग जुटाता था।
जाँच एजेंसियों के अनुसार, आरोपित इस पूरी गतिविधि को एक ‘व्यवसाय की तरह चलाते थे जिसमें हर धर्मांतरण पर विदेश से पैसा मिलता था और उसी पैसे से आगे और लोगों को लालच दिया जाता था। धर्मांतरण के बाद जनजातीय बच्चों को जंबूसर और हजीरा के मदरसों में भेजा जाता था, जहाँ उनका ब्रेनवॉश किया जाता था।
इसके अलावा, उन्हें तबलीगी जमात के जरिए मालेगाँव और मुंबई जैसे शहरों में धार्मिक कार्यक्रमों में ले जाया जाता था ताकि उन्हें उनकी मूल संस्कृति से पूरी तरह अलग किया जा सके। गुजरात पुलिस ने इस मामले को सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की रची गई एक साजिश के रूप में पेश किया है।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)


