भारत में विकास और कानून की राह में अक्सर एक ही तरह का गतिरोध देखने को मिलता है। जब भी प्रशासन किसी शहर को आधुनिक बनाने, सड़कें चौड़ी करने या सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त करने के लिए बुलडोजर निकालता है, तो एक विशेष समुदाय द्वारा इसे ‘मजहब पर हमला’ बताकर शोर मचाया जाने लगता है। जयपुर से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से लेकर वाराणसी तक की घटनाएँ गवाह हैं कि जब मंदिर, गुरुद्वारे या सरकारी भवन टूटते हैं, तो वह ‘प्रगति’ का हिस्सा मान लिए जाते हैं और लोग खुशी-खुशी बलिदान दे देते हैं।
लेकिन, जैसे ही किसी अवैध मस्जिद, मजार या मदरसे की बारी आती है, अचानक इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ जुट जाती है, सुरक्षा बलों पर पथराव होता है और ‘बेचारा’ बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोना रोया जाने लगता है। जबकि सबसे ज्यादा अवैध निर्माण भी उन्हीं की ओर से किए जाते हैं।
जयपुर में नूरानी मस्जिद पर प्रशासन का एक्शन
जयपुर के नंदीपुरी इलाके में सोमवार (8 जून) को जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने अवैध ‘नुरानी मस्जिद’ को जमींदोज किया। यह कार्रवाई जगतपुरा-मालवीय नगर रोड को 30 फीट से बढ़ाकर 80 फीट करने के लिए अनिवार्य थी। प्रशासन ने साफ किया कि इस रास्ते में केवल मस्जिद नहीं, बल्कि दो मंदिर, एक मजार और एक सत्संग भवन भी आ रहे थे। विडंबना देखिए, मंदिरों के हटने पर कोई तनाव नहीं हुआ, लेकिन मस्जिद पर कार्रवाई के लिए प्रशासन को 3000 पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े।
शहर में हाई अलर्ट घोषित कर इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। यह इंटरनेट बैन इसलिए करना पड़ा क्योंकि कट्टरपंथी तत्व सोशल मीडिया का सहारा लेकर भीड़ इकट्ठा करते हैं। वे शहर की शांति भंग करने के लिए भड़काऊ पोस्ट साझा करते हैं। पुलिस ने फ्लैग मार्च किया और चप्पे-चप्पे पर जवान तैनात किए। यह डराने वाली स्थिति केवल इसलिए पैदा हुई क्योंकि एक पक्ष विकास को मजहबी रंग देने पर तुला था।
वाराणसी का मल्टी-मॉडल स्टेशन: रात के अंधेरे में एक्शन
वाराणसी में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के लिए आधी रात को बुलडोजर चला। वहाँ रेलवे की जमीन पर बने एक हनुमान मंदिर और अजगैब शहीद मस्जिद को हटाया गया। प्रशासन ने भारी PAC और RPF तैनात की थी। रेलवे ने साफ किया कि स्टेशन को एयरपोर्ट की तर्ज पर विकसित किया जाना है।
करीब एक घंटे के भीतर सारे अवैध ढांचे जमींदोज कर दिए गए। यह प्रोजेक्ट 336 करोड़ रुपए का है जो लाखों यात्रियों को सुविधा देगा। यहाँ भी मंदिर पक्ष ने कोई बवाल नहीं किया। विकास की इस बड़ी तस्वीर में मजहब को बाधा नहीं बनने दिया गया, जो एक परिपक्व समाज की निशानी है।
दिल्ली का तुर्कमान गेट: अवैध ढांचे पर बवाल और पुलिस पर हमला
एक उदाहरण दिल्ली के तुर्कमान गेट का ही ले लीजिए। इस इलाके में भी जब अवैध ढांचे हटाए गए, तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव किया। दिल्ली हाई कोर्ट ने मस्जिद से सटे दवाघर और बारात घर को अवैध घोषित किया था। जैसे ही अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू हुई, वहां उपद्रवी जमा हो गए। उन्होंने पुलिस को अपना काम करने से रोका और हिंसक हमले किए।
उपद्रवियों ने पत्थर बरसाए जिससे चाँदनी महल थाने के SHO गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। मजे की बात यह है कि कार्रवाई से पहले लोगों को सामान हटाने का समय दिया गया था। फिर भी, अराजकता फैलाना ही एकमात्र उद्देश्य दिखाई दिया। कानून का पालन करने के बजाय, यहाँ वर्दी पर पत्थर मारना अधिक जरूरी समझा गया।
सिखों का बड़प्पन: कश्मीर में 72 साल पुराने गुरुद्वारे का बलिदान
जब बात देश की प्रगति की आती है, तो सिख समुदाय ने हमेशा एक मिसाल पेश की है। कश्मीर में श्रीनगर-बारामूला हाईवे के निर्माण के लिए 72 साल पुराने ‘दमदमा साहिब गुरुद्वारे‘ को हटाने की जरूरत थी। यह गुरुद्वारा 1947 से वहाँ मौजूद था और लंगर के माध्यम से हजारों की सेवा कर रहा था। लेकिन सिखों ने प्रशासन के साथ पूरा सहयोग किया।
सिख समुदाय ने खुद आगे बढ़कर गुरुद्वारे को तोड़ने पर सहमति दी। उन्होंने विकास को प्राथमिकता दी और राजमार्ग का रास्ता साफ किया। इसके बदले में प्रशासन ने उन्हें वैकल्पिक जमीन और सहयोग का प्रस्ताव दिया। वहाँ न तो इंटरनेट बंद हुआ और न ही कोई पथराव। यह दर्शाता है कि एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति देश के विकास को सर्वोपरि मानता है।
झंडेवालान और वारंगल: मंदिर टूटे पर कानून नहीं टूटा
दिल्ली के झंडेवालान में 800 साल पुराने मंदिर परिसर और 100 से ज्यादा घरों को तोड़ा गया। स्थानीय लोगों में गुस्सा और दुख था, लेकिन किसी ने अराजकता नहीं फैलाई। यह परिसर RSS मुख्यालय के पास था, फिर भी लोगों ने कानून को अपने हाथ में नहीं लिया। उन्होंने शांतिपूर्वक विरोध दर्ज कराया और न्याय की गुहार लगाई।
इसी तरह तेलंगाना के वारंगल में काकतीय काल का 800 साल पुराना शिव मंदिर स्कूल बनाने के लिए गिरा दिया गया। लोग नाराज थे, लेकिन उन्होंने सड़कों पर आगजनी नहीं की। अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई और कानूनी रास्ता अपनाया गया। यह हिंदू समाज का धैर्य है कि मंदिर टूटने पर भी वे दंगों की राह नहीं चुनते।
फरीदाबाद का छावनी रूप: जब मंदिर-मस्जिद साथ गिरे
फरीदाबाद के NIT-3 इलाके में कोर्ट और NGT के आदेश पर बड़ी कार्रवाई हुई। वहाँ 2 धार्मिक स्थलों (मस्जिद और मंदिर) समेत 20 अवैध निर्माणों को ध्वस्त किया गया। इस दौरान 1000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात रहे और मोबाइल इंटरनेट बंद किया गया। प्रशासन जानता था कि मस्जिद पर हाथ लगाते ही कुछ तत्व माहौल बिगाड़ सकते हैं।
यह कार्रवाई रेलवे कॉरिडोर और एलिवेटेड रोड के लिए जरूरी थी। मंदिर शांति से हट गया, लेकिन मस्जिद के नाम पर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। प्रशासन को रात 2 बजे से दोपहर 2 बजे तक ऑपरेशन चलाना पड़ा। यह भेदभाव नहीं, बल्कि कानून की एकसमान कार्रवाई थी जिसे केवल एक समुदाय ने पचाने से इनकार किया।
गुजरात मॉडल: जब मोदी सरकार ने गिराए मंदिर
जब हम धार्मिक ढांचे और विकास की बात करते हैं, तो गुजरात का उदाहरण सबसे सटीक है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गाँधीनगर में सड़क चौड़ीकरण के लिए एक महीने में कई मंदिरों को गिराया गया था। प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बने हर अवैध ढांचे को हटाने का संकल्प लिया था।
हैरानी की बात यह है कि दिवाली के समय हुई इस कार्रवाई में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई। मंदिर रातों-रात हटा दिए गए और जनता ने सहयोग किया। मोदी जी ने खुद कहा था कि ‘राष्ट्र धर्म’ मजहब से बड़ा है। हिंदू संगठनों के कुछ विरोध के बावजूद, सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और गाँधीनगर की सड़कें चौड़ी हो गईं।
प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया था कि अफसर अक्सर नेताओं को डराने के लिए सबसे पहले हनुमान मंदिर तोड़ते हैं। उन्हें लगता है कि इससे तूफान खड़ा होगा और कार्रवाई रुक जाएगी। लेकिन गुजरात में उन्होंने हिम्मत दिखाई। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा शहर खुश हो गया क्योंकि जाम की समस्या खत्म हो गई थी।
‘लैंड जिहाद’ और मीडिया का चश्मा
यह एक कड़वा सच है कि सार्वजनिक जमीनों पर सबसे ज्यादा अवैध कब्जे मजारों के रूप में होते हैं। इसे अक्सर ‘लैंड जिहाद’ का नाम दिया जाता है क्योंकि ये ढांचे रातों-रात खड़े कर दिए जाते हैं। बाद में इन्हें ‘ऐतिहासिक’ बताकर बचाने की कोशिश होती है। जयपुर की नूरानी मस्जिद को भी 45 साल पुराना बताया गया, लेकिन क्या पुराना होना अवैध कब्जे को वैध बना देता है?

मीडिया का एक धड़ा या कहें वामपंथी गैंग भी केवल मस्जिदों पर कार्रवाई को प्रमुखता से दिखाता है। अपनी खबरों की बड़ी-बड़ी हेडलाइन में अवैध मस्जिदों को ढहाने की बात छापता है।

लेकिन जब मंदिर टूटते हैं, अतिक्रमण हटाया जाता है, तो उसे कहे भी प्रमुखता से दिखाया नहीं जाता है। उसे ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ कहा जाता है। मस्जिदों के टूटने पर उसे ‘मुस्लिमों पर जुल्म’ बता दिया जाता है। यह विमर्श ही कट्टरपंथियों को और अधिक उकसाने का काम करता है।
कानून की नजर में सब बराबर हों
विकास के पहिये किसी का मजहब देखकर नहीं रुकते। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हर अवैध कब्जे को हटाना होगा। एक समुदाय का यह व्यवहार कि ‘मेरा अवैध निर्माण मजहब का हिस्सा है’, देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। सिखों और हिंदुओं से उन्हें सीखने की जरूरत है कि राष्ट्र निर्माण के लिए त्याग आवश्यक है।
प्रशासन को इंटरनेट बंद करने और हजारों जवानों को तैनात करने पर मजबूर करना यह साबित करता है कि कट्टरपंथ देश की संप्रभुता को चुनौती देता है। जब तक हर नागरिक यह नहीं समझेगा कि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा इबादत नहीं, बल्कि अपराध है, तब तक बुलडोजर की गरज अनिवार्य रहेगी। कानून का शासन ही लोकतंत्र की असली पहचान है।


