Friday, July 1, 2022
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60 साल में भारत में 5 गुना हुए मुस्लिम, आज भी बच्चे पैदा करने की रफ्तार सबसे तेज: अमेरिकी थिंक टैंक ने भी किया कन्फर्म

देश की कुल आबादी में ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन 6 फीसदी हैं। 1951 के बाद से ही इनकी जनसंख्या ​में स्थिरता है। बावजूद इसके धार्मिक संरचना में बदलाव की बड़ी वजह मुस्लिमों की प्रजनन दर है।

2015 में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने भारत में हिंदुओं की आबादी को लेकर बहस छेड़ दी थी। इसमें बताया गया था कि 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो कुल जनसंख्या का 85 फीसदी हिंदू थे जो 2011 की जनगणना में घटकर 78.35 फीसदी हो गई। देश में एक ऐसा जमात है जो इस तरह के तमाम तथ्य, मुस्लिमों की लगातार आबादी बढ़ने से खास इलाकों में परिस्थितियों में आए बदलाव और जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत पर होने वाली हर बहस को मुस्लिम विरोधी बताते हैं। यह वर्ग मुस्लिमों की आबादी में विस्फोट को नकारते हुए उन्हें प्रताड़ित दिखाने की कोशिश भी करता है।

अब अमेरिकी थिंक टैंक प्यू (Pew) रिसर्च सेंटर का एक अध्ययन सामने आया है। इसके आँकड़ों से पता चलता है कि आज भी भारत में सबसे ज्यादा बच्चे मुस्लिम ही पैदा कर रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट है कि 1951 से 2011 के बीच भारत की आबादी तिगुनी हुई। लेकिन इसी दौरान मुस्लिमों की आबादी 5 गुना (3 करोड़ 50 लाख से 17 करोड़ 20 लाख) हो गई। जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ने की वजह बच्चे पैदा करने की उनकी लालसा बताई गई है। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता के बाद भारत में पहली जनगणना 1951 में हुई थी।

भारत की धार्मिक संरचना पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार इसके भारत की जनसंख्या का 79.8 फीसदी हिंदू है जो 2001 की जनगणना के मुकाबले 0.7 प्रतिशत कम है। इसके उलट 2001 से 2011 के बीच मुस्लिमों की आबादी 13.4 प्रतिशत बढ़ी है। जैन मतावलंबियों में प्रजनन दर सबसे कम है। देश की कुल आबादी में ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन 6 फीसदी हैं। 1951 के बाद से ही इनकी जनसंख्या ​में स्थिरता है। बावजूद इसके धार्मिक संरचना में बदलाव की बड़ी वजह मुस्लिमों की प्रजनन दर है।

हालाँकि मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर भी 1992 से लेकर 2015 के बीच 4.4 बच्चे से कम होकर 2.6 बच्चे पर आ गई है। बावजूद इसके यह सबसे अधिक है। इस अध्ययन के अनुसार हिंदुओं की प्रजनन दर 2.1 तो जैनियों की सबसे कम 1.2 बच्चे प्रति महिला है।

मुस्लिमों में प्रजनन दर सबसे अधिक (साभार: प्यू रिसर्च सेंटर)

इससे पहले इसी साल जून में प्यू ने भारत के विभिन्न धर्मों पर अपने अध्ययन को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया था कि भारत की जनसंख्या विविधता भरी है और धर्म में खासी आस्था रखती है। दुनिया के अधिकतर हिन्दू, जैन और सिख भारत में ही रहते हैं, लेकिन साथ ही ये दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले देशों में से भी एक है। यहाँ बौद्ध और ईसाईयों की जनसंख्या भी दसियों लाख में है। इस अध्ययन के मुताबिक 74% मुस्लिमों ने कहा था कि मुस्लिमों को अपने मजहब की शरिया अदालत में ही जाना चाहिए। 1937 से ही भारत में मुस्लिमों के लिए मजहबी मामलों को निपटाने के लिए एक अलग न्यायिक व्यवस्था है, जिसे ‘दारुल-उल-क़ज़ा’ कहते हैं। काजी के अंतर्गत काम करने वाले इन अदालतों का फैसला मानने के लिए कानूनी रूप से किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि प्यू रिसर्च सेंटर दुनिया का एक जाना माना थिंक टैंक है जो अक्सर दुनिया के अलग-अलग मसलों को लेकर अध्ययन करता रहता है। अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आने से पहले प्यू ने 30 अप्रैल 2013 को एक सर्वे प्रकाशित किया था। इसमें 99% अफगानियों ने देश के आधिकारिक कानून के रूप में इस्लामी शरिया कानून का समर्थन किया था।

‘The World’s Muslims: Religion, politics and society’ नामक इस सर्वे में 23 देशों में इस्लामिक शरिया कानूनों को लेकर प्रश्न पूछे गए थे। इस सर्वे में 84% पाकिस्तानियों ने भी शरिया के पक्ष में अपनी स्वीकार्यता दिखाई थी। इसमें बताया गया था कि अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों में ऐसे लोगों की संख्या अच्छी-खासी है जो शरिया का समर्थन करते हैं। सर्वे में एक रोचक तथ्य यह भी सामने आया था कि जो मुस्लिम दिन में कई बार नमाज पढ़ते हैं या इबादत करते हैं वे उनके मुकाबले जो अपेक्षाकृत कम इबादत करते हैं, शरिया को लेकर कहीं अधिक मुखर हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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