Wednesday, October 21, 2020
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लाल सलाम की फट गई डफली, जिस अंबानी-अडानी को देते थे गाली… वही उद्योगपति आज कर रहे देश की मदद

वामपंथी चुन-चुन कर उन्हें ही गालियाँ देते रहे हैं, जिन्होंने मौका पड़ने पर देश की मदद की है। और ये खुद क्या करते हैं? ये AC कमरे में बैठ कर नकारात्मकता फैलाते हैं, प्रोपेगेंडा पोर्टलों के लिए लेख लिखते हैं।

वामपंथी अक्सर कॉर्पोरेट हस्तियों को गालियाँ देते हैं। यहाँ तक कि पीएम मोदी पर भी निशाना साधने के लिए अम्बानी-अडानी से उनके कथित नजदीकी संबंधों का हवाला दिया जाता है। ये सच है कि पीएम मोदी के अधिकतर कॉर्पोरेट हस्तियों के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं क्योंकि जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तभी से वो राज्य में निवेश के लिए देश-विदेश के उद्योगपतियों के साथ बैठकें करते रहे हैं। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ से लेकर तमाम तरह के कार्यक्रमों के जरिए उद्योगपतियों को गुजरात में निवेश के लिए बुलाया जाता था। उस दौरान नरेंद्र मोदी चीन वगैरह की भी यात्रा करते थे और वहाँ से भी बिजनेस डील हुआ करते थे।

भारत में टाटा-बिरला और अम्बानी जैसे कई ऐसे बड़े उद्योगपति हैं, जिनका परिवार दशकों से देश के विकास में योगदान देता रहा है। सरकारें बदलीं और देश पर अलग-अलग समय में कई आपदाएँ आईं, जहाँ इन लोगों ने जो भी सरकार रही, देश की मदद की है। वामपंथी कॉर्पोरेट हस्तियों का ऐसे विरोध करते हैं, जैसे उन्होंने पैसे लूट लिए हों। किसी ने अगर कोई कम्पनी खड़ी की है तो उसके पीछे उसकी मेहनत और दिमाग होता है। अगर वामपंथियों को लगता है कि अम्बानी-अडानी ने उनके पैसे लूट लिए हैं तो वो केस करें। यही लोग तो संविधान-संविधान की रट लगाते रहते हैं। वो अलग बात है कि संविधान के नियमों का पालन करते हुए बने क़ानून को नहीं मानते।

देश कोरोना वायरस के महासंकट से जूझ रहा है। रतन टाटा ने इसे अब तक का सबसे बड़ा संकट करार दिया है। देश में मरीजों की संख्या 1200 के पार हो गई है, जिनमें से 29 को अपनी जान गँवानी पड़ी है। महाराष्ट्र (215) और केरल (202) इस संक्रमण से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं। ऐसे समय में घर में खाली बैठे वामपंथियों के पास एक ही काम बचा है- जहाँ-तहाँ से जो भी मिले, उसकी आलोचना करते रहो और नकारात्मकता फैलाते रहो। कोई अम्बानी को गाली दे रहा है, कोई मोदी को तो कोई बीसीसीआई को।

टाटा परिवार ने इस संकट की घड़ी में 1500 करोड़ रुपए की मदद कर के देशहित में अपना योगदान किया है। ऐसा नहीं है कि उसने सिर्फ़ वित्तीय मदद देकर इतिश्री कर ली है बल्कि टाटा फाउंडेशन के लोग भी लोगों की मदद करने में लगे हुए हैं। मेडिकल कर्मचारियों के लिए उपकरणों की व्यवस्था की जा रही है क्योंकि कोरोना से लड़ने वालों का सबसे ज्यादा सुरक्षित रहना ज़रूरी है। टाटा ने 5 सूत्रीय कार्यक्रम बना कर काम शुरू कर दिया है। क्या किसी ने टाटा को इसके लिए मजबूर किया? नहीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने धन का देशहित में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया है। वो सिर्फ़ बकैती नहीं कर रहे।

इसी तरह रिलायंस ने कुछ ही दिनों में देश का पहला ‘कोरोना वायरस डेडिकेटेड अस्पताल’ तैयार कर दिया। अपने अन्य अस्पतालों में कोरोना के इलाज और लोगों को क्वारंटाइन करने की व्यवस्था की। ऐसे समय में वित्त से भी ज्यादा ज़रूरी संसाधन है क्योंकि देश-विदेश का व्यापार ठप्प पड़ा हुआ है। ऐसे में रिलायंस ने प्रतिदिन एक लाख मास्कों का उत्पादन करने का फ़ैसला लिया। देश भर में ग़रीबों को अलग-अलग स्थानों पर खाना खिलाने का उपक्रम भी रिलायंस द्वारा चलाया जा रहा है। हाँ, अम्बानी को गाली देने वाले ज़रूर अपने घर का एसी ऑन कर के उनके ख़िलाफ़ लेख लिख रहे होंगे।

इसी तरह आनंद महिंद्रा ने भी अपनी 100% सैलरी कोरोना से लड़ने के लिए देने का निर्णय लिया है। साथ ही उन्होंने महिंद्रा हॉलिडे रिसॉर्ट्स को क्वारंटाइन सेंटर्स के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। साथ ही वो उन छोटे व्यापारियों की भी मदद करेंगे, जिन पर इस आपदा का सबसे ज्यादा असर हुआ है। इसी तरह वेदांता लिमिटेड के अनिल अग्रवाल ने 100 करोड़ रुपए की मदद का ऐलान किया है। साथ ही उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों की व्यथा का जिक्र करते हुए उनकी भी मदद करने की घोषणा की। इसके अलावा अल्कोहल ब्रांड ‘Diageo India’ ने 3 लाख लीटर सैनिटाइजर उपलब्ध कराने की घोषणा की। जब बाजार में सैनिटाइजरों की कमी है, ऐसे में ये मदद कारगर सिद्ध होगी। इसके सीईओ आनंद कृपालु ने बताया कि ऐसे समय में उनकी कम्पनी सैनिटाइजर की उपलब्धता के लिए दिन-रात एक कर देगी।

‘हीरो साइकल्स’ ने भी 100 करोड़ रुपए के कंटिंजेंसी फण्ड की घोषणा की है। ऐसे समय में कॉर्पोरेट जगत की हस्तियों को गाली देने वाले वामपंथी क्या कर रहे हैं? वो विदेशी पोर्टलों में लेख लिख कर उन लोगों को बदनाम कर रहे हैं, जो असल में लोगों की मदद कर रहे हैं। डफली बजाने से अगर कोरोना से लड़ाई लड़ ली जाती तो शायद आज जेएनयू के वामपंथी ब्रिगेड से ही सबसे ज्यादा डॉक्टर और वैज्ञानिक निकलते। अगर प्रोपेगेंडा पोर्टलों में लेख लिखने से कोरोना भाग जाता तो राणा अयूब, सदानंद धुमे और बरखा दत्त जैसे लोगों ने अब तक वैक्सीन का अविष्कार कर लिया होता। प्रमुख बात ये है कि अगर आप सच में देशहित में काम करने वालों का सम्मान नहीं कर सकते तो कम से कम उनका विरोध करने का अधिकार तो आपको नहीं है।

गौतम अडानी ने भी 100 करोड़ रुपए पीएम केयर्स फंड में देने की घोषणा की है। आज जब देश संकट से जूझ रहा है, तब जिसके पास जो है उससे ही मदद की जानी चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप नहीं होना चाहिए। आपके पास संसाधन हो सकता है, वित्त हो सकता है या फिर श्रमबल हो सकता है- आप तीनों से मदद कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई संगठनों के लोग राहत कार्य में लगे हैं लेकिन वामपंथी चुन-चुन कर उन्हें ही गालियाँ देते रहे हैं, जिन्होंने मौका पड़ने पर देश की मदद की है, आगे बढ़ कर जनता के दुःख को मिटाने का काम किया है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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