Monday, March 1, 2021
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शबनम-सलीम की वो प्रेम कहानी जिसने एक ही परिवार के 7 लोगों की जान ले ली

क्षेत्र के लोग उस लड़की से सहानुभूति जता रहे थे क्योंकि उसके पिता, माँ, बड़ा भाई, छोटा भाई, भाभी, कजिन और बड़े भाई का 10 महीने का बेटा आर्ष- इन सबकी हत्या कर दी गई थी।

शिक्षा एक ऐसा साधन है जो किसी इंसान की ज़िन्दगी बदलने की ताक़त रखता है, उसकी शक्लोसूरत बदल देता है, उसे एक नई पहचान देता है और उसका भविष्य उज्ज्वल बनाता है। जो जितने ज़्यादा शिक्षित होते हैं, जिनके पास जितनी ज़्यादा डिग्रियाँ होती है – उनसे उतनी ही ज़्यादा शालीनता की उम्मीद की जाती है, उनसे राष्ट्र-निर्माण में भागीदारी की कामना की जाती है। अशिक्षित होना पाप नहीं है क्योंकि कोई व्यक्ति जब अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता तब हो सकता है उसे उचित साधन न मिले हों। लेकिन शिक्षित होकर भी अपराधी बन जाना, आतंकवादी बन जाना, अपने देश-समाज को बदनाम करना – महापाप है, गुनाह है और अस्वीकार्य है।

ऐसी ही एक कहानी है शबनम की। शबनम एक ऐसा नाम है जिसकी कहानी सुन कर लोग अपनी बच्ची का नाम शबनम न रखें। शबनम एक ऐसी स्त्री है- जिसके कुकृत्यों की दास्तान सुन कर किसी की भी रूह काँप जाए। कहते हैं, एक स्त्री की समाज के निर्माण में और परिवार की संरचना में वो भूमिका होती है जो किसी और के बस की बात नहीं। एक शिक्षित स्त्री दो या उस से अधिक परिवारों का भविष्य बदलने की ताक़त रखती है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी भी कहते हैं– “बालिकाओं की शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक लड़की की शिक्षा से दो परिवार शिक्षित होते हैं।”

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक जिला है- अमरोहा। अमरोहा के हसनपुर तहसील में एक गाँव है- बावनखेड़ी। 14-15 अप्रैल की रात को ये गाँव एक ऐसी घटना की निशानी बना जिसे याद कर उस इलाक़े के लोग आज भी सिहर उठते हैं। उस रात एक लड़की के परिवार के सभी सात लोगों की हत्या कर दी गई। बिलखते-बिलखते उसने आसपास के लोगों को जानकारी दी। क्षेत्र के लोग उस लड़की से सहानुभूति जता रहे थे क्योंकि उसके पिता, माँ, बड़ा भाई, छोटा भाई, भाभी, कजिन और बड़े भाई का 10 महीने का बेटा आर्ष- इन सबकी हत्या कर दी गई थी। लोग उस लड़की के भाग्य को कोस करे थे और कामना कर रहे थे कि भगवान ऐसी नियति किसी को भी न दे।

पुलिस ने करवाई शुरू की। इस पूरी घटना की एक ही गवाह थी- वही लड़की जो अब अपने भरे-पूरे परिवार की इकलौती जीवित व्यक्ति थी। पुलिस को औपचारिकता पूरी करनी थी और मामले की तह तक भी जाना था- ये सब कैसे हुआ, किसने किया और क्यों किया। पुलिस से पूछताछ में उस लड़की ने बताया कि कैसे लुटेरे छत के रास्ते से घर में घुसे और उसके परिवार के लोगों की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी। एक बुज़ुर्ग पड़ोसी ने बताया कि जब उसने उस लड़की के चिल्लाने की आवाज सुनी, तब उन्हें लगा कि उसके घर में डकैती हो गई है।

बुज़ुर्ग पड़ोसी और उनके बेटों ने कुछ अन्य पड़ोसियों के साथ दीवार फाँदकर देखा कि वो लड़की पहली मज़िल के बालकॉनी में खड़ी हो कर चिल्ला रही थी। उन्होंने उसे नीचे आने को कहा लेकिन वो रोती रही। रोते-रोते उसने पड़ोसियों को बताया कि ‘वो’ उसे भी मार देंगे। पड़ोसियों द्वारा बार-बार दिलासे देने के बाद उसने नीचे उतर कर मेन गेट का दरवाज़ा खोला। जब वो घर के अंदर घुसे तो उन्हें जो दृश्य दिखा वो भयावह ही नहीं बल्कि वीभत्स भी था। मास्टर साहब (लड़की के पिता) और उनके पूरे परिवार की लाशें खून से लथपथ पड़ी हुई थी।

उस लड़की के चाचा सत्तार अली वहाँ जाने वाले लोगों को अभी भी खून के निशान दिखाते हुए बताते हैं कि यही वो जगह है जहाँ उन्होंने अपने भाई की लाश पड़ी देखी थी। बुज़ुर्ग पडोसी ने उस रोती-बिलखती लड़की को सांत्वना दी और अपने घर ले कर गए। पुलिस ने तहक़ीक़ात शुरू की। पुलिस को उस लड़की ने बताया कि वो रोज़ अपनी माँ के साथ ही सोती थी लेकिन उस रात उसने गर्मी ज्यादा होने की वज़ह से छत पर सोना ज्यादा उचित समझा। फिर रात को अचानक से बारिश शुरू हो गई और मज़बूरन उसे नीचे आना पड़ा। नीचे घर में आने पर उसे पूरे परिवार की लाशें दिखी।

15 अप्रैल को इस केस की जाँच की जिम्मेदारी SHO आरपी गुप्ता के हाथों में गई। उन्होंने जब तहक़ीक़ात शुरू की तो उन्हें घर में Biopose के 10 टेबलेट्स मिले। घर के अंदर से नशीली गोलियों का मिलना संदेह खड़ा कर रहा था। जब लाशों को पोस्टमॉर्टेम के लिए भेजा गया तब गुप्ता ने डॉक्टर को इस बारे में बताया। उनका अंदेशा सही निकला और सभी लाशों के पेट लाल थी। इसका सीधा मतलब यह था कि उन सभी को सोने से पहले कोई नशीला ड्रग खिलाया गया है जिस कारण सब अचेत हो गए। पुलिस ने सोचा कि अगर खाने के साथ इन्हे ड्रग दिया गया तो फिर उस लड़की पर इसका असर क्यों नहीं हुआ, जबकि बाकी सब अचेत हो गए।

पहले पुलिस ने डकैती के एंगल से जाँच शुरू की थी लेकिन उसे लुटेरों के घर में घुसने के कोई निशान नहीं मिले। जमीन और घर की ऊँचाई 14 फुट की थी। पुलिस को सीढ़ी लगाने के भी कोई निशाँ नहीं मिले। हर एक कदम पर पुलिस का ये शक और पुख़्ता होता जा रहा था कि ये काम किसी बाहर वाले ने नहीं, बल्कि घर के अंदर रहने वाले किसी व्यक्ति ने किया है। जब पुलिस ने परिवार में एकमात्र ज़िन्दा बची उस लड़की का मोबाइल फोन खँगाला तो उसे पता चला कि इस काण्ड के पहले उस फोन से किसी व्यक्ति को एक ही दिन में 50 से भी अधिक कॉल किए गए थे।

यहीं से इस कहानी में ऐसा मोड़ आया जिसने सभी को हिला कर रख दिया। परिवार में एकमात्र ज़िंदा बची उस लड़की का नाम शबनम था। वही शबनम, जो आज मुरादाबाद जेल में बैठ कर अपने बेटे को पत्र लिखती रहती है। जिस व्यक्ति को वो उस दिन बार-बार कॉल कर रही थी, उसका नाम था सलीम- शबनम का प्रेमी। सलीम भी पहले उसी जेल में था लेकिन बाद में उसे कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया। सलीम पाँचवी पास था और रोज़ाना आमदनी के जुगाड़ में मजदूरी करता था जबकि शबनम डबल MA थी। उसने अंग्रेजी के साथ-साथ भूगोल में भी मास्टर्स की डिग्री पा ली थी। लेकिन इतनी शिक्षित होने के बाद भी उसने जो किया, उसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

कोर्ट में पुलिस ने बताया कि परिवार के लोग शबनम और सलीम के रिश्ते से खुश नहीं थे क्योंकि दोनों अलग-अलग बिरादरी से आते थे। शबनम ने रात को सोने से पहले खाने या चाय के साथ अपने परिवार के सभी लोगों को नशीली दवाइयाँ खिला दी। सोने के बाद वो सभी अचेत हो गए जिसके बाद सलीम वहाँ आया और उसने शबनम की मदद से सबकी हत्या कर दी। शबनम ने सभी के बाल पकड़े और सलीम ने सबका गला काट दिया। 10 महीने के बच्चे तक को उन्होंने नहीं छोड़ा और उसका भी गला घोंट दिया गया। इस प्रेम कहानी का खून से सना यह एक ऐसा अध्याय था, जो वीभत्सता की सारी हदें पार कर जाता है।

अदालत ने उन दोनों को मौत की सज़ा सुनाई। उन्होंने राष्ट्रपति को दया याचिका भी दी लेकिन उसे अस्वीकृत कर दिया गया। अदालत ने पुलिस को इस मामले की तह तक पहुँचने के लिए बधाई भी दी। अगर पुलिस ने समय रहते इसका पर्दाफ़ाश नहीं किया होता तो शायद आज शबनम मायावती के घोषणानुसार पाँच लाख का मुआवज़ा लेकर सज़ा से बच जाती और हो सकता था किसी निर्दोष को सज़ा हो जाती। लेकिन पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए बिना ज़्यादा समय लिए जाँच निपटाया।

शबनम जब जेल गई तब वो सात महीने की गर्भवती थी। उसे एक बेटा हुआ जिसका पालन-पोषण एक पत्रकार और उनकी पत्नी कर रहे हैं। इस्लाम में गोद लेने का कोई आधिकारिक कांसेप्ट नहीं है, इसीलिए अगर शबनम कभी जेल से निकलती है तो उसे उसका बेटा वापस मिल जाएगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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