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गाँव की 1100 एकड़ जमीन को वक्फ प्रॉपर्टी बता हड़पना चाहती थी मस्जिद, 313 साल पुराने ताम्र पत्र मंसूबे हुए नाकाम: जानिए मद्रास हाई कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने माना कि 1712 में राजा ने मस्जिद के लिए जमीन जरूर दी थी और उसकी तस्दीक पुराने रिकॉर्ड्स और 1925 में ट्रांसक्राइब हुई ताँबे की पट्टी से होती है। लेकिन ताँबे की प्लेट में सिर्फ 75 कोठा जमीन का जिक्र है, जो हिसाब से सिर्फ 2.34 एकड़ बनती है।

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के तिरुनेलवेली की 1100 एकड़ जमीन पर मस्जिद के वक्फ संपत्ति का दावा खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि मस्जिद को सिर्फ 2.34 एकड़ जमीन का हक है, जो 1712 में मदुरै के राजा ने दी थी और इसका जिक्र ताँबे की प्लेट (कॉपर प्लेट) के लेख में है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मस्जिद ने 2011 में वक्फ ट्रिब्यूनल में केस दायर कर कहा था कि उसे करीब 1100 एकड़ जमीन वक्फ संपत्ति के रूप में मिली है, ट्रिब्यूनल ने 2016 में मस्जिद के हक में फैसला दे दिया।

इसके बाद सरकार ने 2018 में वक्फ ट्रिब्यूनल के 2016 के फैसले को चुनौती दी और कहा कि मस्जिद को किसी भी जमीन का हक नहीं है क्योंकि वह जमीन पहले ही रैयतवारी जमीन के रूप में घोषित हो चुकी है और कई गरीब लोगों को खेती के लिए बाँटी जा चुकी है।

सरकार ने यह भी बताया कि 362 लोग उन जमीनों पर खेती कर रहे हैं और उनके पास वैध पट्टे हैं। सरकार ने कहा कि ये सारी जमीन पहले ही इनाम एक्ट के तहत 1966 में सरकार के नाम हो चुकी है और अब इसमें 362 किसान खेती कर रहे हैं, जिन्हें सरकारी पट्टा दिया गया है।

कोर्ट ने माना कि 1712 में राजा ने मस्जिद के लिए जमीन जरूर दी थी और उसकी तस्दीक पुराने रिकॉर्ड्स और 1925 में ट्रांसक्राइब हुई ताँबे की पट्टी से होती है। लेकिन ताँबे की प्लेट में सिर्फ 75 कोठा जमीन का जिक्र है, जो हिसाब से सिर्फ 2.34 एकड़ बनती है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि मस्जिद को सिर्फ उतनी ही जमीन दी जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि 2011 के दीवानी मुकदमे में मस्जिद का 1100 एकड़ से अधिक भूमि पर दावा आधुनिक सर्वेक्षण संख्याओं पर आधारित था। इनमें से किसी भी सर्वेक्षण का उल्लेख 1712 के अनुदान या 1952 के फैसले में नहीं किया गया था। कोर्ट को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि इन जमीनों का सर्वेक्षण कब किया गया था और मदुरै समस्तनम के मूल अनुदान से इनका आधिकारिक संबंध कब था।

कोर्ट ने 1712 के तांबा पत्रक का हवाला देते हुए बताया कि मस्जिद को केवल 2.34 एकड़ जमीन का ही अधिकार है। बाकी जमीन या तो किसी और पक्ष की है या फिर सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी गई थी।

मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में गहराई से सुनवाई करने के बाद ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब इतिहास खुद प्रामाणिक दस्तावेजों जैसे तांबा पत्रकों के जरिए सामने आता है, तो झूठे दावे टिक नहीं पाते।

अब वक्फ बोर्ड को 2.34 एकड़ की सही लोकेशन पहचाननी होगी, जैसा उस पट्टी में लिखा है। कोर्ट ने ये भी कहा कि जब 1923 से पहले सर्वे नंबर की व्यवस्था ही नहीं थी, तो मस्जिद ने बिना पक्के सबूतों के इतनी बड़ी जमीन पर कैसे दावा कर दिया?

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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