Homeदेश-समाज2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे: जानिए यह भारत के लिए...

2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे: जानिए यह भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती, क्यों हाईकोर्ट ने की इसके लिए ‘सिस्टम’ की बात

भारत में बुजुर्गों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाएँ बहुत जरूरी हैं लेकिन केवल सरकार के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी आगे बढ़कर बुजुर्गों के साथ जुड़ने की जरूरत है। बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि 2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे लेकिन उनके लिए हमारा सिस्टम अभी तैयार नहीं है। इसी चिंता के बीच हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य के वृद्धाश्रमों की स्थिति की पड़ताल का आदेश दिया है ताकि यह पता चल सके कि वहाँ रहने वाले बुजुर्गों को वास्तव में कैसी सुविधाएँ मिल रही हैं और सिस्टम जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी है। अदालत की यह टिप्पणी अहम है, जो भारत अभी सबसे युवा देश है, रफ्तार से दौड़ रहा है उसे अपने बुजुर्गों की भी चिंता करने की आवश्यकता है।

बुजुर्गों को भगवान का दर्जा लेकिन अब उपेक्षित: जानें HC ने क्या-क्या कहा?

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य में चल रहे सभी 31 वृद्धाश्रमों (ओल्ड एज होम) की जाँच का निर्देश दिया है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण इसे लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वृद्धाश्रमों में चिकित्सा की सुविधा, फूड क्वालिटी, भवनों की स्थिति, सफाई और सुरक्षा के इंतजामों के विषय में विस्तार से बताया जाएगा। राजस्थान सरकार ने बताया कि प्रदेश में 31 वृद्धाश्रम चल रहे हैं जिस पर कोर्ट ने कहा कि सिर्फ नंबर बताना काफी नहीं है बल्कि वहाँ बुजुर्गों के लिए कैसी व्यवस्था है यह देखना भी जरूरी है।

HC ने बुजुर्गों की सामाजिक स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान और आदर का स्थान दिया गया है लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती जा रही है। कोर्ट के मुताबिक, संयुक्त परिवारों के टूटने, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने बुजुर्गों को समाज में धीरे-धीरे असहाय और उपेक्षित स्थिति में पहुँचा दिया है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि समाज और व्यवस्था दोनों को बुजुर्गों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार होना होगा।

2046 तक देश में कितने होंगे बुजुर्ग

सितंबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। यह रिपोर्ट देश और दुनिया के प्रमुख जनसंख्या और वृद्धावस्था संबंधी आँकड़ों के आधार पर किया गया है। इसमें IIPS द्वारा किए गए ‘लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग सर्वे इन इंडिया (2017-18)’, भारत की जनगणना, भारत सरकार के जनसंख्या अनुमान (2011-2036) और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संभावनाएँ 2022 से प्राप्त आँकड़ों पर आधारित थी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में साल 2022 में करीब 110 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 13.9 प्रतिशत था। अगले 30 सालों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने वाली है। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर करीब 210 करोड़ हो जाएगी और तब दुनिया की कुल आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा करीब 22 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। यह बदलाव दुनिया के हर हिस्से में दिखाई देगा।

भारत में भी ऐसा ही होगा। साल 2022 में भारत में करीब 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह देश की कुल आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत था। लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की संख्या बढ़कर करीब 34.7 करोड़ हो जाएगी और तब देश की आबादी में उनका हिस्सा करीब 21 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा।

फोटो साभार: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 से 2022 के बीच भारत की कुल आबादी में करीब 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई लेकिन इसी दौरान 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 103 प्रतिशत तक बढ़ गई। यानी बुजुर्गों की संख्या देश की कुल आबादी से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी। इससे भी ज्यादा तेज बढ़ोतरी 80 साल से ऊपर उम्र के लोगों में हुई। इस उम्र वर्ग की आबादी में इस दौरान करीब 128 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

आगे के अनुमान और भी चौंकाने वाले हैं। साल 2022 से 2050 के बीच भारत की कुल आबादी में सिर्फ 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है जबकि बुजुर्गों की संख्या करीब 134 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसी अवधि में 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या लगभग 279 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है।

खास बात यह है कि बहुत ज्यादा उम्र के बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा होगी। इनमें बड़ी संख्या विधवा और दूसरों पर निर्भर रहने वाली महिलाओं की होगी। जैसे-जैसे उम्र 60 से 80 साल के बीच बढ़ेगी, बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगातार बढ़ती जाएगी।

कैसा रहा है वृद्ध आबादी में बढ़ोतरी का इतिहास (फोटो: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023)

अनुमान है कि साल 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बच्चों (0 से 14 वर्ष) से ज्यादा हो जाएगी। वहीं, 2050 तक देश की कामकाजी उम्र की आबादी (15 से 59 वर्ष) में गिरावट आने लगेगी।

बूढ़े होते लोग, भारत के सामने कैसी चुनौती?

आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत तेजी से ‘एजिंग सोसाइटी’ की और बढ़ रहा है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जन्मदर में गिरावट ने मिलकर भारत के ‘एज स्ट्रक्चर’ को बदल दिया है। यह आँकड़ों का यह बदलाव लोगों और देश दोनों के लिए ही चुनौती लाने वाले है वो भी ऐसे वक्त में जब भारत को अपनी बूढ़ी होती आबादी की चिंता के लिए बहुत काम करना बाकी है। सामाजिक-आर्थिक तौर पर उम्र का यह बदलाव कई तरह के असर दिखाएगा जिससे निपटने भारत के लिए चुनौती होने वाला है।

‘फेमिनाइजेशन-रुरललाइजेशन ऑफ एजिंग’

भारत में वृद्धावस्था का एक प्रमुख पहलू ‘फेमिनाइजेशन ऑफ एजिंग’ है। भारत में 60 साल की उम्र के बाद औसतन लोग करीब 18.3 साल और जीवित रहते हैं। इसमें महिलाओं की उम्र पुरुषों से ज्यादा होती है। 60 साल की उम्र के बाद महिलाएँ औसतन लगभग 19 साल और पुरुष लगभग 17.5 साल तक जीवित रहते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जिसके कारण वृद्ध महिलाओं की संख्या अधिक होती है। इनमें से बड़ी संख्या विधवाओं की होती है, जो अकेले रहती हैं और परिवार पर निर्भर होती हैं। सामाजिक सुरक्षा की सीमित व्यवस्था और सामाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे के कारण वृद्ध महिलाएँ अधिक असुरक्षित स्थिति में होती हैं।

इसका एक अन्य पहलू रुरललाइजेशन यानी ग्रामीणीकरण है। भारत की 71 प्रतिशत वृद्ध आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सीमित परिवहन सुविधाएँ, कम आय और सामाजिक अलगाव वृद्ध लोगों की समस्याओं को और बढ़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा आबादी का शहरों की ओर पलायन भी वृद्ध लोगों को अकेला छोड़ देता है, जिससे वे खुद भी भावनात्मक और सामाजिक रूप से अधिक कमजोर हो जाते हैं।

वृद्धों की कामकाजी आबादी

वृद्धों में भी बढ़ते वृद्ध

भारत में ‘एजिंग ऑफ द एज्ड’ की ट्रेंड भी दिख रहा है। इसका अर्थ है कि वृद्ध आबादी के भीतर 75 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। यह वर्ग स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और सामाजिक सहायता पर अधिक निर्भर होता है। जैसे-जैसे इस आयु वर्ग की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे हेल्थ सिस्टम, परिवार संरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर दबाव भी बढ़ेगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, सुपर-एज्ड आबादी का बढ़ना विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक है।

सिल्वर इकोनॉमी की कमजोर स्थिति

वृद्ध आबादी के लिए आर्थिक अवसरों और सेवाओं के बाजार को ‘सिल्वर इकोनॉमी’ कहा जाता है। इसमें स्वास्थ्य सेवाएँ, बीमा, आवास, वित्तीय उत्पाद, तकनीकी समाधान और मनोरंजन सेवाएँ शामिल होती हैं। भारत की सिल्वर इकोनॉमी का मूल्य 2024 में लगभग 73,000 करोड़ रुपए आँका गया है और अनुमानों के अनुसार आने वाले वर्षों में इसमें कई गुना वृद्धि होगी। विकसित देशों में सिल्वर इकोनॉमी एक मजबूत आर्थिक क्षेत्र बन चुकी है लेकिन भारत में यह अभी भी अविकसित अवस्था में है। जिसके चलते वृद्ध लोगों की जरूरतों और उपलब्ध सेवाओं के बीच अंतर बना हुआ है।

आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा

भारत में वृद्धों की आर्थिक स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, केवल 11 प्रतिशत वृद्ध पुरुषों को वर्क पेंशन मिलती है और 16.3 प्रतिशत को सामाजिक पेंशन प्राप्त होती है। वहीं, वृद्ध महिलाओं में 27.4 प्रतिशत केवल सामाजिक पेंशन पर निर्भर हैं और मात्र 1.7 प्रतिशत को कार्य पेंशन मिलती है। लगभग पाँचवां हिस्सा ऐसा है जिसके पास कोई स्थायी आय स्रोत नहीं है। यह स्थिति वृद्धावस्था को आर्थिक असुरक्षा और गरीबी से जोड़ देती है।

देश के सामने कम नहीं चुनौती

जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और युवाओं की संख्या घटेगी तो काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी। इससे देश की उत्पादन क्षमता घटेगी। भारत की अर्थव्यवस्था अभी तक युवा लेबर पर निर्भर रही है। अगर कामकाजी आबादी घटेगी, तो उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र पर असर पड़ेगा। भारत में पेंशन और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली सीमित है। सरकारी कर्मचारियों को पेंशन मिलती है लेकिन असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के पास कोई पेंशन व्यवस्था नहीं है। जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी, तो सरकार पर पेंशन देने का दबाव बढ़ेगा। इससे सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए चुनौती

भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग गरीब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की स्थिति और खराब है। अगर सरकार ने पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं दी तो बुजुर्ग गरीबी और निर्भरता में फँस सकते हैं। इसके साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ेगा। बुजुर्गों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है। उन्हें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, गठिया और मानसिक रोग जैसी समस्याएँ होती हैं। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत कम हैं। अगर बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी, तो अस्पतालों और डॉक्टरों पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, शहरों में पहले से ही भीड़, प्रदूषण और आवास की समस्या है। बुजुर्गों के लिए शहरों को अनुकूल बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।

बुजुर्ग आबादी को सरकार का साथ

भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई योजनाएँ/कानून लागू किए गए हैं ताकि उन्हें आर्थिक सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान मिल सके।। 1999 में राष्ट्रीय वृद्धजन नीति शुरु की गई जिसका मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक सम्मान देना है। इसके तहत सरकार ने यह मान्यता दी कि बुजुर्गों को केवल सहायता नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार मिलना चाहिए।

इसके बाद वर्ष 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण अधिनियम लागू किया गया। इस कानून के तहत बच्चों और उत्तराधिकारियों को अपने माता-पिता और बुजुर्ग परिजनों की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते तो बुजुर्ग कानूनी रूप से भरण-पोषण की माँग कर सकते हैं। सरकार ने राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए विशेष चिकित्सा सुविधाएँ विकसित की गई हैं। इसमें जेरियाट्रिक यानी वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों का इलाज, पुनर्वास सेवाएँ और कुछ क्षेत्रों में घरेलू देखभाल जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।

इसके साथ ही, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (1995) के तहत गरीब बुजुर्गों को मासिक पेंशन दी जाती है जबकि अन्नपूर्णा योजना (2000) से पेंशन से वंचित पात्र बुजुर्गों को हर महीने 10 किलो खाद्यान्न मिलता है। राष्ट्रीय पेंशन योजना (2004) सरकारी कर्मचारियों के लिए योगदान आधारित पेंशन व्यवस्था है, जिसने पुरानी पेंशन योजना का स्थान लिया। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम (2007) के तहत 60 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता को बच्चों से भरण-पोषण का अधिकार मिला और राज्यों को वृद्धाश्रम स्थापित करने का निर्देश दिया गया।

इसके अलावा, अटल पेंशन योजना (2015) के तहत असंगठित क्षेत्र के लोग 18-40 वर्ष की उम्र में योगदान कर पेंशन प्राप्त करते हैं, जिसमें सरकार भी योगदान करती है। राष्ट्रीय वयोश्री योजना (2017) के तहत गरीब और दिव्यांग बुजुर्गों को व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, चश्मा जैसे सहायक उपकरण दिए जाते हैं। प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (2019) में असंगठित श्रमिकों को 60 वर्ष के बाद 3000 रुपए मासिक पेंशन मिलती है। SACRED योजना (2021) बुजुर्गों को रोजगार के अवसर देने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है जबकि यूनिफाइड पेंशन योजना (2024) सरकारी कर्मचारियों को NPS का विकल्प देकर निश्चित पेंशन की व्यवस्था करती है।

क्या है आगे की राह

भारत में सरकारी और सामाजिक स्तर पर वृद्धों की जरूरतों के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं। हालाँकि, आबादी जिस तरह बढ़ रही है उसमें ये कदम नाकाफी साबित हो सकते हैं और साथ ही कई अन्य ऐसी चीजें हैं जिनमें सुधार की गुजाइंश नजर आती है। बढ़ती आबाद से साफ है कि अगर आज बुजुर्गों के लिए मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में करोड़ों लोग आर्थिक, स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याओं से जूझेंगे।

आर्थिक-स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए उठाए जाएँ कदम

भारत में बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी समस्या आर्थिक सुरक्षा की है। बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास नियमित आय का कोई साधन नहीं है और वे अपने बच्चों या परिवार पर निर्भर हैं। सरकार की वृद्धावस्था पेंशन योजनाएँ मौजूद हैं लेकिन उनकी राशि लोगों के लिए कम पड़ रही है।

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बुजुर्गों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी दी जाए और पेंशन की राशि बढ़ाई जाए।स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी बुजुर्गों के जीवन को कठिन बना देती है। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए अलग से मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है। जरूरी है कि हर जिले में बुजुर्गों के लिए विशेष अस्पताल और डॉक्टर हों, सस्ती दवाइयाँ उपलब्ध कराई जाएँ।

अकेलेपन से निपटने के लिए बने सामाजिक ढाँचा

आज के समय में बुजुर्गों की एक बड़ी समस्या अकेलापन और उपेक्षा भी है। संयुक्त परिवारों के टूटने, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग खुद को सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करते हैं। इसलिए जरूरी है कि समाज और सरकार मिलकर बुजुर्गों के लिए सामुदायिक केंद्र, सामाजिक गतिविधियाँ और सुरक्षित वृद्धाश्रम विकसित करें ताकि वे खुद को अकेला न महसूस करें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

बुजुर्गों के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) बनाने की जरूरत है ताकि वे सामाजिक रूप से सक्रिय रह सकें और एक-दूसरे से जुड़ सकें। अलग-अलग पीढ़ियों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाने की भी जरूरत है ताकि बुजुर्गों का अनुभव और ज्ञान युवा पीढ़ी तक पहुँचे और समाज को उसका लाभ मिले। डिजिटल युग में बुजुर्गों को पीछे न छोड़ने के लिए उन्हें डिजिटल साक्षरता और तकनीकी कौशल सिखाने की जरूरत है, ताकि वे ऑनलाइन सेवाओं, ई-कॉमर्स और डिजिटल स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग कर सकें।

भारत में बुजुर्गों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाएँ बहुत जरूरी हैं लेकिन केवल सरकार के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी आगे बढ़कर बुजुर्गों के साथ जुड़ने की जरूरत है। बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं। बदलती जीवनशैली और व्यस्तता के कारण कई बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।

ऐसे में परिवार, पड़ोस और समाज का दायित्व बनता है कि वे बुजुर्गों को सम्मान, प्यार और सहयोग दें। उनके साथ समय बिताना, उनकी समस्याओं को सुनना और जरूरत पड़ने पर मदद करना समाज की जिम्मेदारी है। जब सरकार और समाज मिलकर काम करेंगे तभी बुजुर्गों का जीवन सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल बन सकेगा।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कॉकरोचों के प्रदर्शन में घुसी नेहा बोरा कौन है? जानिए AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष का चिट्ठा- उमर खालिद को बताती है बेचारा, ब्राह्मणों से...

आइए जानते हैं CJP के प्रदर्शन में घुसकर वामपंथी एजेंडे को हवा देने वाली नेहा बोरा कौन हैं और कैसे वो ब्राह्मणों के खिलाफ जहर उगलती आईं हैं।

गाजियाबाद के सीवर प्लांट में पोलियो वायरस मिलने से स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, किसी बच्चे में संक्रमण नहीं: जानिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने कैसे बढ़ाई...

गाजियाबाद के सीवर में पोलियो वायरस मिला। यह वायरस पोलियो वैक्सीन के कमजोर अंश से विकसित होता है जो कमजोर टीकाकरण वाले इलाकों में फैलता है।
- विज्ञापन -