अगर ‘JNU कांडियों’ और नम्बी नारायणन में से आप सिर्फ़ पहले वालों को जानते हैं, तो समस्या आपके साथ है

अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी और उनकी टीम ने ही देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाने का भरोसा दिया था। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।

जीएसएलवी एमके-II की एक बेहद निराश कर देने वाली तस्वीर नीचे है। यह अप्रैल 15, 2010 को बंगाल की खाड़ी में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। अन्य की तुलना में यह अधिक पेलोड (भार) ले जाने की क्षमता रखता था, जिससे देश को बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं।

इस घटना में प्रमुख निराशा का कारण स्वदेशी तुषारजनिक (क्रायोजेनिक) रॉकेट इंजन की विफलता थी। क्रायोजेनिक इंजन सबसे शक्तिशाली रॉकेट इंजन होता है, जो भारी उपग्रहों को कक्षा तक ले जाने का एकमात्र तरीका है।

इसी तकनीक ने ही अमेरिका को चंद्रमा तक पहुँचने में मदद की है। क्रायोजेनिक इंजन में महारत हासिल करना ही भारत के लिए वैश्विक अंतरिक्ष क्लब जैसी बड़ी संस्था में प्रवेश करने का एकमात्र रास्ता था। बेशक, दुनिया में कोई भी हमें इस तकनीक को देने के लिए तैयार नहीं होता, ऐसे में हमें स्वयं ही इस तकनीक का पता लगाना था।

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आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी यदि मैं आपको बताऊँ कि दशकों पहले, हमारे पास एक ऐसा असाधारण वैज्ञानिक था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहा था? साथ ही यह कि उन्हें नौकरी से ‘देशद्रोही’ जैसे आरोप लगाकर निकाल दिया गया और हमारी तत्कालीन ‘सेक्युलर’ सरकार द्वारा उनका जीवन बर्बाद कर दिया गया? क्या आप उन लोगों को कभी माफ़ कर पाएंगे?

मिलिए इसरो वैज्ञानिक नम्बी नारायण से, जिन्हें कल (जनवरी 25, 2019) पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।

विद्वान और देशभक्त वैज्ञानिक नम्बी नारायणन

पीएसएलवी (PSLV) को याद करिए, जिसने वर्ष 2014 में मंगलयान को संचालित किया था और मंगल ग्रह पर भारतीय ध्वज लहराया था। पीएसएलवी, जिसने वर्ष 2008 में चंद्रयान को संचालित किया और इस बात की पुष्टि की कि चंद्रमा पर निश्चित रूप से पानी की बर्फ है।

जनवरी 5, 2014 को भारत ने अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाकर नया इतिहास रचा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के बूते रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने का परीक्षण 100% ख़रा उतरा था। इस लम्बी छलांग के पीछे असल में कौन था? लेकिन उस दौरान पूरी खबरों में कहीं भी उस वैज्ञानिक का उल्लेख तक नहीं था। उस वैज्ञानिक का नाम है प्रोफैसर नम्बी नारायणन।

सबसे पहले 1970 में ‘तरल ईंधन रॉकेट’ तकनीक लाने वाले वैज्ञानिक रहे नम्बी नारायणन 1994 में इसरो में क्रायोजेनिक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी थे। अफ़सोस की बात है कि उन्हें सत्ता और सियासत के षड्यंत्र का शिकार बनाया गया। जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय अलंकरण देकर सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसे ही जेल की सलाखों के पीछे बन्द कर दिया गया। उन्हें देश का गद्दार करार दिया गया। हमारे देश की विडम्बना है कि जो लोग देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला रखते हैं, उनको किसी न ​किसी तरह से हतोत्साहित कर रोक दिया जाता है।

नम्बी नारायणन और उनके साथी डी. शशिकुमार को वर्ष 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट प्रौद्योगिकी शत्रु देशों को बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब मीडिया ने इन ख़बरों को बहुत उछाला था। मीडिया ने बिना जाँचे-परखे पुलिस की इस ‘थ्योरी’ पर विश्वास करके उन्हें राष्ट्रद्रोही के रूप में प्रस्तुत किया था। पुलिस ने इसे सैक्स जासूसी स्कैंडल की तरह पेश किया था। सीआईए ने मालदीव की 2 ऐसी महिलाओं को तैयार किया जिनके पास ऐसे रहस्य थे, जिनकी जानकारी न पुलिस को थी, न मीडिया को।

PSLV ने हमें हमेशा गौरवान्वित किया है। पीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी “विकास इंजन” पर चलता है और नम्बी नारायणन ने इसे बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1990 के दशक में, नम्बी नारायणन भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक थे, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन पर काम कर रहे थे। इससे पहले, भारत ने रूस से इस तकनीक को खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिकियों ने पूरी लड़ाई लड़ी और इसे रोक दिया। स्वाभाविक है कि जिन लोगों के पास यह तकनीक होगी, वे अन्य देशों से ईर्ष्या के कारण इस तकनीक की रक्षा करेंगे।

अमेरिकी दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से इन्कार कर दिया था। तब नम्बी नारायणन ने ही सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएँगे। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने के लिए अमेरिका ने साजिश रची और केरल की वामपंथी सरकार उसका हथियार बन गई।

हैरानी की बात तो यह है कि केन्द्र में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका भी संदिग्ध रही थी, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के ख़िलाफ़ साजिश पर ख़ामोशी अख्तियार कर ली थी। मीडिया में ऐसी रिपोर्ट वर्णित थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भारत में ऊपर से नीचे तक के नेताओं और अफ़सरों को मोटी रकम पहुँचाती थी।

फिर, यह सब हुआ।

वर्ष 1994 में, नम्बी नारायणन पर अचानक जासूसी और विदेशी एजेंटों को रॉकेट सम्बंधित संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप लगाया गया था। उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, इसके साथ ही उनका करियर ख़त्म हो गया।

वर्ष 1994 में ही नम्बी नारायणन की गिरफ़्तारी के साथ, भारत के स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण का सपना दशकों पीछे चला गया। वर्ष 2010 के अंत तक, भारत उस क्रायोजेनिक इंजन को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था।

क्रायोजेनिक इंजन के निर्माण में सफलता आखिरकार जनवरी 2014 में मिली।

वर्ष 1994 और 2014 के बीच उन 20 वर्षों के लिए भारत को हुए इस नुकसान का भुगतान कौन करेगा? यक़ीनन कह सकते हैं कि ‘भारतीय धर्मनिरपेक्षता’ तो कभी भी नहीं कर सकती है।

जैसे-जैसे नम्बी नारायणन का मामला अदालत में लाया गया, मामले ने करवट लेनी शुरू की। सीबीआई ने स्वीकार किया कि आईबी ने इस केस को तैयार किया था।

वहीं वर्ष 1998 का ‘आउटलुक’ का यह लेख भी हमें बताता है कि सीबीआई ने जून 03, 1996 को अपनी रिपोर्ट में क्या कहा था।

“6 निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा हुई।” यह कितना बड़ा अन्याय है!

लेकिन अभी वाक़या और भी है।

इस नाम पर ध्यान दें: ‘आउटलुक’ के लेख के अनुसार, आर बी श्रीकुमार स्पष्ट रूप से जाँच में अपने कर्तव्य के निर्वहन मामले में निष्पक्ष रहने में असफल पाए गए थे।

लेकिन, हमने आर बी श्रीकुमार के बारे में और कहाँ सुना है?

यहाँ आप देख सकते हैं कि आर बी श्रीकुमार काफ़ी ‘प्रसिद्ध’ व्यक्ति हैं। जो अपनी ‘न्याय की ललक’ के लिए जाने जाते हैं।

कहानी यहीं पर ख़त्म नहीं होती, किस्सा अभी और भी है।

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अपने ‘शानदार’ करियर के दौरान, आर बी श्रीकुमार ने कई दिल जीते हैं। कई पुरस्कार और कई उपाधियाँ जीती हैं। अप्रैल 24, 2008 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित इस तस्वीर से एक लाज़वाब चीज देखने को मिली है। तस्वीर में बाईं ओर “सर्वोत्तम मलयालम पुलिस अधिकारी” का पुरस्कार प्राप्त करते हुए बी आर आर श्रीकुमार हैं। उन्हें पुरस्कार प्रदान करने वाला व्यक्ति है, CPI(M) राज्य सचिव पिनाराई विजयन, जो अब केरल राज्य के मुख्यमंत्री हैं। तस्वीर के बीच में मुस्कुरा रही हैं “मानवाधिकार कार्यकर्ता” तीस्ता सीतलवाड़।

इस पूरे तंत्र पर एक नज़र डालते हैं –

सिर्फ CPIM और पिनारई विजयन पर ही गुस्सा मत करिए। वर्ष 2011 में, कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ओमन चांडी, जिन्होंने उस दौरान मात्र 43 दिनों के लिए कार्यालय सम्भाला, ने उन पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ सभी आरोप हटा दिए थे, जिन पर नम्बी नारायणन मामले में गलत कार्य, यानि कदाचार का आरोप लगाया गया था।

पुलिस अधिकारी सिबी मैथ्यू, जिनकी टीम उपरोक्त ‘जासूसी की कहानी’ लेकर आई थी, केरल के मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लिए उठे और वो बने भी।

यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सबसे महत्वपूर्ण प्रकरण है।

इस बीच, नम्बी नारायणन अभी भी अपनी खोई हुई गरिमा और न्याय के लिए निरंतर लड़ रहे थे।

आखिरकार सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ₹50 लाख का मुआवजा देने की घोषणा की और साथ ही केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच करने के लिए न्यायमूर्ति डी के जैन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई।

जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा था कि 76 वर्षीय नम्बी नारायणन का मामला मानसिक प्रताड़ना से जुड़ा है। इसलिए केरल सरकार 8 हफ्तों के भीतर उन्हें ₹50 लाख मुआवजा दे। अदालत ने कहा था कि केवल मुआवजा दिया जाना ही पूर्ण न्याय नहीं है। इसीलिए बेंच ने इस मामले में केरल पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जाँच के लिए 3 सदस्यीय कमिटी का भी गठन किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह दूसरा हिस्सा, जो केरल पुलिस अधिकारियों के करतबों के बारे में था, मीडिया की सुर्खियों में ज्यादा जगह नहीं बना सका। निश्चित रूप से भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ के कारणों से ही यह नहीं हो पाया।

वर्ष 2016 की शुरुआत में, मोदी सरकार ने जेएनयू में कुछ छात्र संगठनों के दुर्व्यवहारों पर नकेल कसी। उन ‘असंतुष्टों’ ने हर शहर में ‘उदारवादियों’ यानि तथाकथित ‘लिबरल’ लोगों की भीड़ को संबोधित किया और कम समय में ही एक जाना-पहचाना नाम बन गए। ये असंतुष्ट सेलिब्रिटी ‘Free Speech’ कार्यकर्ता बन गए। वास्तव में यह नालायक बेरोजगार ‘छात्रों’ का एक समूह मात्र है, जो कर अदा करने वाले लोगों के पैसे से लंबे समय तक जेएनयू में किसी ना किसी डिग्री लेने के बहाने बैठा रहता है।

देखिए कि इन नालायकों की तुलना में नम्बी नारायणन, जिस व्यक्ति के करियर और जीवन को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मुखौटे के तहत कुचल दिया गया, की इस कहानी को कितने लोग जानते हैं? उनका दोष यह है कि वह भारत के लिए रॉकेट इंजन बना रहे थे और ‘भारत के टुकड़े होंगे’ के नारे नहीं लगा रहे थे। जिस वजह से भारतीय ‘सेक्युलरिज़्म’ ने उन्हें समाप्त कर दिया।

लेकिन हम यह बताना तो भूल ही गए कि नम्बी नारायणन को प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अपनी डिग्री पूरी करने में मात्र 10 महीने ही लगे थे। मात्र 10 महीने? जेएनयू के ‘सेलेब्रिटी छात्रों’ ने अकेले टीवी स्टूडियो में ही 10 महीने से अधिक समय बिता दिया होगा।

लेकिन भारतीय ‘धर्मनिरपेक्षता’ ने नम्बी नारायणन को समाप्त कर दिया। जिस ‘क्रायोजेनिक इंजन’ पर वह काम कर रहे थे, उसके निर्माण में भारत को 20 साल लग गए, यह चौंका देने वाला तथ्य है। अपनी दिल दहला देने वाली दास्तान को वैज्ञानिक नम्बी नारायणन ने अपनी पुस्तक ‘रेडी टू फायर’ में लिखा है। देश के इस महान वैज्ञानिक के साथ साजिश के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी को छोड़ किसी ने भी आवाज नहीं उठाई थी। भाजपा सांसद और अधिवक्ता मीनाक्षी लेखी ने कुछ वर्ष पहले मीडिया के सामने पूरी साजिश का ख़ुलासा किया था।

यह गणतंत्र दिवस है। अर्थात भारत देश के ‘सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ को मनाने का एक क्षण, जैसा कि यह संविधान प्रस्तावना में ही वर्णित है। आपातकाल के समय ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा डाला गए थे। एक प्रचलित कहावत के अनुसार, सत्य आपको मुक्त कर देगा, लेकिन पहले, यह आपको परेशान करेगा।

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