Saturday, November 28, 2020
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‘लिपि सिंह के सामने ला-ला कर पीटे गए हमारे लड़के, रात में वीरान सड़क पर अकेली पड़ी थी माँ की प्रतिमा’: मुंगेर दुर्गा पूजा समिति

"हमारे कहारों पर लाठीचार्ज किया गया। श्रद्धालुओं को तितर-बितर कर दिया गया। किसी तरह हमने कहारों को वापस बुलाया। हमने उनसे गुजारिश की। बाटा चौक पर हमारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ कि पूरा मुंगेर देख कर रो पड़ा। फायरिंग प्रशासन ने ही की है। पुलिसकर्मी इंसास राइफल और पिस्टल लहराते नज़र आए।"

मुंगेर में दुर्गा पूजा के बाद माता के प्रतिमा के विसर्जन के दौरान पुलिस बर्बरता की ख़बरें सामने आईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि 2 लोग मरे हैं और कई गायब हैं। इस दौरान किसी भी मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थान ने जिले के ‘बड़ी दुर्गा पूजा समिति’ के पक्ष को सामने नहीं रखा, जिसके पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने इस वारदात का दंश झेला। उनके आरोप गंभीर हैं और पुलिस के रवैये पर कई सवाल भी उठाता है, जिसके जवाब अब तक नहीं मिले हैं।

यहाँ हम आपको कुछ ऐसी तस्वीरों और वीडियोज से भी रूबरू कराएँगे, जिन्हें देख कर आपको भी लगेगा कि वो मुंगेर के दुर्गा पूजा समिति के कार्यकर्ताओं और भक्तों द्वारा झेले गए अत्याचार की गवाही दे रहे हैं। माँ दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ किस तरह श्रद्धालुओं से विहीन, निर्जन सड़क पर अकेली पड़ी थीं – ये दृश्य किसी भी हिन्दू के कलेजे पर वार करेगा। लेकिन, ये एक ऐसी सच्चाई से जिससे आप सबको रूबरू होना चाहिए।

मुंगेर में पुलिसकर्मी के हाथ में पिस्टल: समिति का दावा

सबसे पहले हमने बात की उस शख्स से, जो मुंगेर की ‘बड़ी दुर्गा पूजा समिति’ के सोशल मीडिया एकाउंट्स को देखते हैं। यहाँ कुछ कारणों से हम उनका नाम गुप्त रख रहे हैं, क्योंकि उन्हें अब भी अपनी सुरक्षा का भय है और अपने साथियों के साथ हुए व्यवहार को वो भूले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि समिति ने प्रशासन से गुहार लगाई थी कि उन्हें गुरुवार (अक्टूबर 29, 2020) को माता की प्रतिमा के विसर्जन की अनुमति दी जाए।

उनका कहना है कि उन्होंने जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय और PMO तक को भी सोशल मीडिया पर टैग कर के गुहार लगाई कि वो अक्टूबर 26 को विसर्जन नहीं करना चाहते हैं और नियमानुसार ही उन्हें विसर्जन की तारीख तय करने का अधिकार दिया जाए। इसके पीछे का तर्क देते हुए वो कहते हैं कि समिति को अंदेशा था कि दुर्गा पूजा का विसर्जन 26 को होगा तो सारी प्रक्रिया पूरी करते-करते इसके अगले दिन के 12-1 बज जाएँगे।

वीरान पड़ी सड़क, अकेली पड़ी माँ की प्रतिमा

इसके अगले ही दिन बुधवार को चुनाव था। बिहार विधानसभा चुनाव में प्रथम चरण का मतदान इसी दिन होना था। ऐसे में समिति का आरोप है कि प्रशासन सारे नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए हड़बड़ी में विसर्जन कराना चाहता था। समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जिला प्रशासन से बात कर के कहा कि या तो वो चुनाव बाद में करा लें, या फिर उन्हें तय तिथि व समय पर माता की प्रतिमा का विसर्जन करने दिया जाए।

विसर्जन से पहले हुए बैठक में भी समिति के सदस्यों ने विचार-विमर्श करते हुए कहा था कि प्रशासन लोगों के आस्था के खिलाफ कार्य नहीं करें, क्योंकि नियम तथा आस्था को तोड़ कर समिति किसी भी प्रकार का कार्य नहीं करेगी। उन्होंने निर्णय लिया था कि सरकार के दिशा-निर्देशों को देखते हुए मंदिर परिसर की सजावट की जाएगी तथा बिजली के बल्ब झालर बाजार क्षेत्र में लगाए जाएँगे। समिति नियमानुसार प्रशासन के साथ सहयोग के लिए भी तैयार थी।

बता दें कि बिहार में माँ की प्रतिमा को विदाई के समय ‘खोइछा’ दिया जाता है। इसे ‘खोइछा पूजन’ कहा जाता है। प्रतिमा को सिन्दूर लगा कर महिलाएँ कुछ वस्तुएँ ‘खोइछा’ के रूप में देती हैं और अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान मानती हैं। आरोप है कि प्रशासन ने ये भी नहीं होने दिया। आखिर मुंगेर की दुर्गा पूजा समिति 29 को ही विसर्जन कराने के लिए क्यों गुहार लगा रही थी? इसके जवाब में समिति के सोशल मीडिया हैंडलर कहते हैं,

“हमारी प्रतिमा इस तरह से हड़बड़ी में नहीं जाती है। अगर अक्टूबर 29 को विसर्जन की अनुमति दी जाती तो हमारा दुर्गा पूजा भी हो जाता और मतदान भी संपन्न हो गया होता। नीतीश कुमार, PMO और चुनाव आयोग के पास हमने सोशल मीडिया के जरिए गुहार लगाई। जिला प्रशासन के पास हमने ज्ञापन दिया। हम पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। प्रतिवर्ष विजयादशमी के दिन हमारी प्रतिमा उठती है और उसके अगले दिन विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की जाती है। हम लोग परंपरागत रूप से जैसे कराते आ रहे थे, हमने वैसे ही प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति माँगी। इस बार हमें विजयादशमी से 1 दिन पहले ही मूर्ति उठाने के लिए दबाव बनाया गया।”

माँ दुर्गा के साथ ही अन्य प्रतिमाएँ भी पड़ी हुई थीं

मुंगेर की ‘बड़ी दुर्गा पूजा समिति’ के पदाधिकारियों का कहना है कि कोतवाली थाना सहित अन्य थानों के पुलिस अधिकारी और प्रशासनिक बाबू लोग ‘अपना रूतबा दिखाने लगे’ और दबाव बनाने लगे। समिति के सोशल मीडिया हैंडलर ने आरोप लगाया कि तब मुंगेर की एसपी रहीं लिपि सिंह कहने लगीं कि उनकी बताई तारीख को 12 बजे के भीतर ही विसर्जन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। उन्होंने कहा कि समिति के सदस्यों की लिपि सिंह से व्यक्तिगत रूप से बात हुई थी और उनका रवैया काफी सख्त था।

समिति का कहना है कि उनकी तरफ से हर प्रशासनिक दफ्तर में चिट्ठी पहुँचाई गई कि उनके साथ गलत हो रहा है, उन्हें समय दिया जाए – लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। आखिर तनाव का माहौल कैसे बना और संघर्ष कैसे शुरू हुआ? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि मुंगेर के अम्बे चौक पर माता की प्रतिमा को रोका जाता है क्योंकि वहाँ माँ का मायका माना जाता है और वहाँ थोड़ी देर पूजा-अर्चना होती है।

समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि उन्होंने कई बड़े मीडिया संस्थानों को फोटोज और वीडियोज भेजे, जो उनके हिसाब से पुलिस की क्रूरता को बयान करते हैं – लेकिन, कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। हमने जिनसे बात की, उनमें दुर्गा पूजा कार्यक्रम का कैमरा भी हैंडल किया था, अतएव वो पूरी घटना के साक्षी भी हैं। वो बताते हैं कि इसके बाद मुंगेर गोला पर प्रतिमा आती है, जहाँ पर ‘मिलन’ होता है। दुर्भाग्य से वहाँ पर 4 बाँस टूट गए। दुर्गा पूजा समिति ने हमें बताया,

“अगर आप प्रतिमा के साथ जोर-जबरदस्ती कीजिएगा, अगर उन्हें समय से पहले विसर्जित करने के लिए दबाव बनाइएगा – तो हमारी प्रतिमा ऐसे नहीं जाती है। हमारे कहार ही उस प्रतिमा को उठाते हैं, जिनकी संख्या 32 होती है। हमारे कहारों पर लाठीचार्ज किया गया। श्रद्धालुओं को तितर-बितर कर दिया गया। किसी तरह हमने कहारों को वापस बुलाया। हमने उनसे गुजारिश की। माता का चेहरा एकदम उदास सा हो गया था, ऐसा भान हो रहा था। इसके बाद बाटा चौक पर हमारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ कि पूरा मुंगेर देख कर रो पड़ा। फायरिंग प्रशासन ने ही की है। पुलिसकर्मी इंसास राइफल और पिस्टल लहराते नज़र आए।”

प्रशासन ने आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में क्यों लिया? इसके जवाब में समिति के पदाधिकारी कहते हैं कि उनके कम से कम 150 लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था और उनके साथ क्रूरता की गई। उनका कहना है कि इनमें से कई अभी भी अलग-अलग थानों में पुलिस कस्टडी में हैं। एक और आरोप ये लगा है कि उनमें से जिन्हें छोड़ा भी गया है, उनके मोबाइल फोन्स पुलिस ने अपने पास रख लिए।

समिति के लोगों का कहना है कि दोषी पुलिसकर्मियों ने खुद को बचाने के लिए ही ऐसा किया है। ताकि फायरिंग या लाठीचार्ज के दौरान की उनकी तस्वीरें वीडियोज बाहर न आ जाएँ। उनका एक और बड़ा आरोप ये है कि उनमें से कई लड़कों को एसपी लिपि सिंह के सामने लाकर और उन्हें जम कर पीटा गया। उनका कहना है कि उनलोगों के हाथ और सर पर लिपि सिंह के सामने ही बेरहमी से वार किया गया।

बता दें कि जदयू के राज्यसभा सांसद और पूर्व आईएएस अधिकारी लिपि सिंह के पति सुहर्ष भगत भी आईएएस अधिकारी हैं और वो फ़िलहाल बाँका के डीएम हैं। ये चर्चा आम है कि चुनाव के दौरान ट्रांसफर के क्रम में लिपि सिंह का स्थानांतरण क्यों नहीं किया गया? उनके जदयू कनेक्शंस के बावजूद उन्हें चुनावी ड्यूटी पर लगाने को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अनंत सिंह पर कार्रवाई के कुछ महीने बाद वो एएसपी से एसपी बनी थीं। फ़िलहाल चुनाव आयोग ने उन्हें मुंगेर से हटा दिया है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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