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पालघर में जहाँ हुई साधुओं की हत्या, वहाँ शिक्षा-स्वास्थ्य-आत्मनिर्भरता की रोशनी फैला रहा RSS: पढ़ें- 170+ जनजातीय गाँवों में लोगों का जीवन बदल रहे ‘केशव सृष्टि’ की कहानी

केशव सृष्टि पालघर के जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सोलर सिंचाई, महिला उद्योग और बाँस आधारित रोजगार के जरिए व्यापक सामाजिक परिवर्तन ला रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अक्सर चर्चा होती है कि संघ करता क्या है? संघ के कामों ना बड़े विज्ञापन दिखते हैं, ना शोर-शराबा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि संघ ने शोर की कार्यशैली को नहीं अपनाया है। संघ अपने स्वयंसेवकों और विभिन्न संगठनों के माध्यम से जमीन पर काम करता है।

उसका प्रयास रहता है कि समाज में सकारात्मक और स्थायी बदलाव आए, भले ही उसका शोर बाहर कम सुनाई दे। इसी सोच से प्रेरित होकर कई सेवा और विकास से जुड़े प्रकल्प चलाए जाते हैं। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण प्रकल्प है- केशव सृष्टि। जो महाराष्ट्र के पालघर जिले में काम कर रहा है और सैकड़ों गाँवों में लोगों के जीवन में बदलाव लाने की दिशा में सक्रिय है।

केशव सृष्टि: ग्राम विकास के मॉडल के साथ जीवन में ला रही बदलाव

केशव सृष्टि की स्थापना वर्ष 1997 में हुई और यह संस्था महाराष्ट्र के उत्तन (भायंदर) स्थित लगभग 200 एकड़ के हरित परिसर से संचालित होती है। शुरुआत में इसका उद्देश्य एक एकीकृत ग्रामीण विकास मॉडल तैयार करना था, जिसमें कृषि महाविद्यालय, गौशाला, आवासीय विद्यालय, अंतरराष्ट्रीय स्कूल, वनौषधि अनुसंधान केंद्र और प्रशिक्षण अकादमी शामिल हों।

समय के साथ संस्था ने समाज की आवश्यकताओं को समझते हुए अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया और आज यह शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। ग्राम विकास आज भी इस संस्था का केंद्र बिंदू है।

ग्राम विकास योजना: समाज परिवर्तन की एक पहल

संस्था की ‘ग्राम विकास योजना’ गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने पर केंद्रित है। यह संस्था पालघर के 172 गाँवों को ग्राम विकास योजना के तहत विकसित कर रही है। इसके अंतर्गत कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्यम इन 4 प्रमुख स्तंभों पर कार्य किया जाता है। संस्था का लक्ष्य ऐसे ‘आदर्श गाँव’ विकसित करना है जहाँ ग्राम समिति सक्रिय हो, स्वयं सहायता समूह मजबूत हों और गाँव कुपोषण मुक्त बने।

कृषि क्षेत्र में संस्था ने सोलर सिंचाई परियोजना के माध्यम से किसानों के खेतों में सौर पंप स्थापित किए हैं, जिससे वर्षभर सिंचाई संभव हो पाती है। इससे किसान एक वर्ष में कई फसलें उगा पा रहे हैं, उनकी आय में वृद्धि हो रही है और शहरों की ओर होने वाला पलायन कम हो रहा है। जहाँ सोलर पंप संभव नहीं हैं, वहाँ कृत्रिम तालाब (फार्म पॉन्ड) बनाए गए हैं। साथ ही फलदार वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत उपलब्ध कराया गया है।

जिस गाँव को हम भूल गए, उसे संघ नहीं भूला

जिन गाँवों में पालघर में संस्था ने विकसित किया है उनमें अधिकतर जनजातीय गाँव हैं। जहाँ सरकारी योजनाओं को पहुँचने में शायद वक्त लगे लेकर राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे स्वयंसेवकों के लिए यहाँ विकास के रास्ते खोलना उनका कर्तव्य सरीखा है। इन्हीं गाँवों में एक गाँव गडचिंचले (Gadchinchale) है। आपकी स्मृतियों में इसकी याद शायद घूमिल हो गई होगी, ये वहीं गाँव है जहाँ दो साधुओं की लिन्चिंग कर दी गई थी। अप्रैल 2020 में कोविड-19 के लॉकडाउन के बीच भीड़ ने साधुओं को चोर समझकर मार डाला था।

यह मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय बना, समय बीता तो चर्चा खत्म हो गई। हालाँकि, संघ और उसके स्वयंसेवक इस गाँव को नहीं भूले, वो जुट गए इसमें बदलाव लाने में। यहाँ के लोगों को विकास की उस दौड़ में शामिल करने में जिस रफ्तार से देश दौड़ रहा है।

ग्राम विकास के तहत की जा रहीं कई पहल

ग्राम विकास के तहत कई पहल की जा रही हैं, जिनमें कुछ निम्न हैं:-

MSK- माधव शिक्षण केंद्र
माधव शिक्षण केंद्र (MSK) पहली से पाँचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए चलाया जा रहा एक विशेष प्रकल्प है, जो स्कूल की पढ़ाई को और मजबूत बनाने का काम करता है। इसमें बच्चों को भारतीय परंपराओं, संस्कारों और जीवन कौशल की शिक्षा दी जाती है। यह प्रकल्प वर्तमान में 136 गाँवों में संचालित हो रहा है और अब तक 4,875 से अधिक छात्र-छात्राएँ इससे लाभान्वित हो चुके हैं। इस वर्ष इसे 145 गाँवों तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं जिससे स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है, गतिविधि-आधारित कार्यक्रमों से पढ़ाई रोचक बनी है और गणित व अंग्रेजी जैसे विषयों पर बच्चों की पकड़ पहले से बेहतर हुई है।

कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र
कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र का उद्देश्य युवाओं में कंप्यूटर साक्षरता बढ़ाना और उन्हें उच्च शिक्षा तथा रोजगार के लिए तैयार करना है। इस समय कुल 6 मुख्य केंद्र और 2 सैटेलाइट केंद्र संचालित हैं, जहाँ प्रत्येक केंद्र में 15 कंप्यूटर उपलब्ध हैं। अब तक 1200 से अधिक विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र दिया जा चुका है। यहाँ MS ऑफिस, टैली, एडवांस एक्सेल, डीटीपी, पायथन प्रोग्रामिंग और वेब डेवलपमेंट जैसे उपयोगी कोर्स कराए जाते हैं। इस पहल से युवाओं में डिजिटल जागरूकता बढ़ी है, रोजगार के अवसर बेहतर हुए हैं और छात्रों के आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई है।

स्वास्थ्य आँकड़ों की मैपिंग
गाँवों के स्वास्थ्य आँकड़ों की व्यवस्थित मैपिंग की जा रही है ताकि हर परिवार की सेहत की सही जानकारी उपलब्ध हो सके। डॉक्टरों और क्लीनिकों की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्य रक्षक दंपती (SRD) के माध्यम से गाँव-गाँव तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाई जा रही हैं। प्रत्येक परिवार का हेल्थ कार्ड तैयार किया जाता है, जिससे बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सके और शुरुआती अवस्था में ही उपचार शुरू हो सके। साथ ही विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा साप्ताहिक वर्चुअल क्लीनिक के माध्यम से टेली-कंसल्टेशन की सुविधा भी दी जाती है। यह कार्यक्रम वर्तमान में 50 गाँवों में चल रहा है और इस वर्ष इसे 63 गाँवों तक पहुँचाने का लक्ष्य है।

इस पहल से अब तक 2525 परिवारों के 14,529 लोगों को लाभ मिला है। 1006 परिवारों को डिजिटल हेल्थ लॉकेट उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य जानकारी सुरक्षित और सुलभ रहती है। स्वास्थ्य रक्षक दंपतियों ने 925 एनीमिया, 308 उच्च रक्तचाप और 285 डायबिटीज के मरीजों की पहचान कर उनका उपचार सुनिश्चित किया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता और भरोसा दोनों बढ़ा है।

स्वास्थ्य आँकड़े जुटाते स्वयंसेवक

वृक्षारोपण अभियान
वर्ष 2017 में शुरू किया गया वृक्षारोपण अभियान आज एक जनआंदोलन का रूप ले चुका है। अब तक 1,58,000 फलदार पेड़ लगाए जा चुके हैं, जिससे 8,500 किसानों को सीधा लाभ मिला है। इन पेड़ों पर अब फल भी आने लगे हैं, जिससे किसानों और उनके परिवारों को वास्तविक आर्थिक लाभ मिल रहा है। इस पहल ने पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया है, हरियाली बढ़ाई है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार किया है।

फार्म पोंड (कृषि तालाब) पहल
जहाँ पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं है, वहाँ कृत्रिम तालाब बनाकर किसानों को बड़ी राहत दी जा रही है। अब तक 19 स्थानों पर फार्म पोंड का निर्माण किया गया है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिला है। इन तालाबों से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है और साथ ही मछली पालन को भी बढ़ावा मिल रहा है। यह पहल उन क्षेत्रों में आजीविका को मजबूत कर रही है, जहाँ पानी की कमी के कारण खेती और रोजगार के अवसर सीमित थे।

केशव सृष्टि द्वारा विकसित तालाब

माता शबरी महिला उद्योग केंद्र
माता शबरी महिला उद्योग केंद्र के माध्यम से जनजातीय महिलाओं को कपड़े के थैलों की सिलाई का प्रशिक्षण और रोजगार दिया जा रहा है। अब तक 32 गाँवों की 339 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। मौजूदा समय में 14 गाँवों की 90 जनजातीय महिलाएँ रोज इस कार्य से जुड़ी हुई हैं। यह पहल पुराने कपड़ों का पुनः उपयोग (अपसाइक्लिंग) कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देती है और सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग को कम करने में मदद करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे आदिवासी महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका मिली है।

प्रोजेक्ट ग्रीन गोल्ड
प्रोजेक्ट ग्रीन गोल्ड के तहत ‘बाँस’ के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा दिया जा रहा है और आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। इस परियोजना में कंदील, राखी और अन्य सजावटी बाँस उत्पाद तैयार किए जाते हैं। विक्रमगढ़ और जव्हार तालुका के 28 गाँवों में 800 से अधिक आदिवासी महिला-पुरुषों को बाँस उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इसी पहल के तहत भारत की पहली पूर्णतः जनजातीय स्वामित्व वाली बाँस कंपनी विक्रमगढ़ बाँस उद्योग प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (Bamboo First) की स्थापना की गई, जिसमें सभी निदेशक जनजातीय महिलाएँ हैं। अब तक जनजातीय महिलाओं ने 1.8 लाख बाँस राखियाँ, 19,000 दिवाली कंदील और अन्य उत्पाद बनाकर लगभग 1.3 करोड़ रुपए का कारोबार किया है।

इस परियोजना के प्रभाव बेहद सकारात्मक रहे हैं। सैकड़ों आदिवासी परिवारों को रोज़गार मिलने से पलायन रुका है। महिलाएँ मजदूर से उद्यमी बनने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। 10 आदिवासी महिलाओं ने SSC परीक्षा पास की है और 5 महिलाएँ सरपंच व उपसरपंच जैसे नेतृत्व पदों पर पहुँची हैं।

केशव सृष्टि इस बात का उदाहरण है कि बिना बड़े-बड़े विज्ञापनों और शोर-शराबे के भी समाज में गहरा परिवर्तन लाया जा सकता है। यह एक ऐसा मॉडल है जो दिखाता है कि अगर नीयत साफ हो और दिशा स्पष्ट हो, तो गाँवों की तस्वीर बदली जा सकती है। 1997 में शुरू हुई यह यात्रा आज भी जारी है चुपचाप लेकिन मजबूत कदमों के साथ।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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