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‘फासीवादियों का हौसला बढ़ाने वाला फैसला’: ज्ञानवापी मामले में अब PFI की एंट्री, बोला संगठन – ‘सदियों पुरानी मस्जिद’ की करेंगे रक्षा

"ज्ञानवापी के अंदर रोजाना पूजा के लिए दी गई हिंदू श्रद्धालुओं की याचिका को बरकरार रखने के वाराणसी जिला न्यायालय के फैसले से अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारों पर फासीवादी हमलों को और मजबूती मिलेगी।"

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को लेकर सोमवार (12 सितंबर, 2022) को वाराणसी की जिला अदालत ने हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद से तमाम वामपंथी रुदन कर रहे हैं। AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने कोर्ट के इस फैसले पर नाराजगी जताई है और इस्लामी चरमपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने कहा है कि इससे फासीवादियों का हौसला मिलेगा।

‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ के मुखिया ओएमए सलाम ने कहा, “ज्ञानवापी के अंदर रोजाना पूजा के लिए दी गई हिंदू श्रद्धालुओं की याचिका को बरकरार रखने के वाराणसी जिला न्यायालय के फैसले से अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारों पर फासीवादी हमलों को और मजबूती मिलेगी। इस फैसले में पूजा स्थल एक्ट-1991 को नजरअंदाज किया है। इसे धार्मिक संपत्तियों पर सांप्रदायिक राजनीति को रोकने के लिए पारित किया गया था, जैसा कि बाबरी मस्जिद के साथ हुआ।”

ओएमए सलाम ने यह भी कहा, “देश को अब जरूरत है कि लोगों के एक वर्ग के द्वारा अन्य लोगों के धार्मिक स्थलों और संपत्तियों पर दावे करने का यह खतरनाक रुझान हमेशा के लिए खत्म हो। दुर्भाग्य से अदालत ने एक तंग नजरी भरा फैसला दिया है। ऐसा लगता है कि याचिका पर सुनवाई करते समय इस बात को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया कि किस तरह से सांप्रदायिक फासीवादियों ने भारतीय समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए दशकों तक बाबरी मस्जिद को इस्तेमाल किया, जिसके नतीजे में देश भर में कई निर्दोषों की जानें गईं और काफी तबाही भी मची।”

इस्लामी नेता ने कहा कि पॉपुलर फ्रंट इस ‘हमले’ के खिलाफ और सदियों पुरानी मस्जिद की रक्षा में मस्जिद कमेटी के संघर्ष का समर्थन करता है और हाईकोर्ट में इस आदेश को चैलेंज करने के कमेटी के फैसले के साथ खड़ा है।

वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है, “इस तरह के फैसले से 1991 के वर्शिप एक्ट का मतलब ही खत्म हो जाता है। ज्ञानवापी का केस बाबरी मस्जिद के रास्ते पर जाता दिख रहा है। ऐसे में 80-90 के दशक में वापस चला जाएगा।”

गौरतलब है कि ज्ञानवापी में श्रृंगार गौरी की पूजा करने के विरोध में मुस्लिम पक्ष ने तर्क दिया था कि 1991 का पूजा अधिनियम ज्ञानवापी पर लागू होता है। इसलिए, ज्ञानवापी की प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। हालाँकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। वहीं, कोर्ट के फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि अब हिंदू पक्ष की पूजा का अधिकार माँगने वाले मामले की सुनवाई होगी। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख तय की गई है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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