देश में चुनावी माहौल के बीच राहुल गाँधी के अंडमान-निकोबार दौरे और ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर उनके रुख ने एक बार फिर विकास, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ऐसे समय पर द्वीपसमूह पहुँचे हैं जब इस बहुचर्चित परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से मंजूरी मिल चुकी है और केंद्र सरकार इसे भारत के लिए एक बड़े आर्थिक और सामरिक गेमचेंजर के रूप में पेश कर रही है।
कॉन्ग्रेस नेता इस परियोजना को लेकर स्थानीय जनजातीय समुदायों खासतौर पर शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों, विस्थापन की आशंका और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित असर को मुद्दा बना रहे हैं।
वहीं सरकार का दावा है कि यह परियोजना न सिर्फ भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में नई पहचान दिलाएगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का रणनीतिक जवाब भी साबित होगी।
ऐसे में राहुल गाँधी का यह दौरा सिर्फ एक क्षेत्रीय दौरा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक, पर्यावरणीय और रणनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। जहाँ एक तरफ विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर जोर है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं।
राहुल गाँधी के दौरे का क्या है मकसद?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी दो दिवसीय दौरे पर अंडमान-निकोबार पहुँचे हैं। उनका कहना है कि वे ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के जमीनी हालात समझना चाहते हैं। इससे पहले उन्होंने जनजातीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर उनके अधिकारों की रक्षा का भरोसा भी दिया था।
दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने साफ कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और किसी भी परियोजना का लाभ सबसे पहले द्वीपवासियों को मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बड़े कॉर्पोरेट समूह इस क्षेत्र में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे स्थानीय हितों पर असर पड़ सकता है।
सोनिया गाँधी का भी विरोध
इससे पहले सोनिया गाँधी भी इस परियोजना का खुलकर विरोध कर चुकी हैं। उन्होंने अपने लेख में इसे पर्यावरणीय आपदा बताते हुए कहा था कि इससे निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
उन्होंने द हिंदू में 8 सितंबर 2025 को प्रकाशित अपने लेख ‘द मेकिंग ऑफ एन इकोलॉजिकल डिजास्टर इन द निकोबार’ में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को 72000 करोड़ रुपए की योजन को ‘पूरी तरह बेकार और खर्चीली’ योजना करार दिया।
उन्होंने कहा कि यह परियोजना निकोबार आइलैंड के जनजातीय समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा है और क्षेत्र की अनोखी जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है। सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनजातियों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर रही है।
उनके अनुसार यह परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकती है। जानकारी के मुताबिक, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है। कोलकाता स्थित ईस्टर्न जोनल बेंच ने इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए हरी झंडी दी, लेकिन साथ ही पर्यावरण संरक्षण के कड़े उपाय अपनाने की शर्त भी लगाई है। NGT का मानना है कि परियोजना जरूरी है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये स्ट्रेट ऑफ मलक्का स्ट्रेट से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का स्ट्रेट वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।
यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर के ‘चोक प्वाइंट पॉलिटिक्स’ का केंद्र भी माना जाता है।
इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट।
पावर प्लांट जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण की योजना तैयार की गई है, जिसे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए अहम माना जा रहा है।
ग्रेट निकोबार आइलैंड पर बनने वाला यह एयरपोर्ट सैन्य और असैन्य दोनों तरह के उपयोग के लिए विकसित किया जाएगा। इसके एयरसाइड और हवाई यातायात नियंत्रण (एटीसी) की जिम्मेदारी इंडियन नेवी के पास रहेगी, जबकि यात्रियों से जुड़ी सुविधाएँ, पार्किंग और टर्मिनल संचालन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) संभालेगा।
यह हवाई अड्डा पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और त्वरित सैन्य तैनाती के लिहाज से। योजना के अनुसार 2050 तक द्वीप की आबादी लगभग 6.5 लाख तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वर्तमान में यहाँ करीब 6500 लोग ही रहते हैं।
क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?
मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से 30-40% वैश्विक व्यापार गुजरता है। इस मार्ग के करीब मौजूदगी भारत को वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर देती है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को भारत की अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और रणनीतिक ताकत के लिहाज से एक गेमचेंजर परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि इसके जरिए भारत एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन सकता है, जिससे लाखों नौकरियाँ पैदा होंगी।
अभी हाई लॉजिस्टिक्स लागत भारत के निर्यात और व्यापार को प्रभावित करती है, लेकिन ग्रेट निकोबार आइलैंड में आधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने से कंटेनर सीधे यहाँ पहुँच सकेंगे, जिससे समय और लागत दोनों में कमी आएगी। साथ ही विदेशी जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी और भारत की समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मजबूत होगी।
इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 90000 से 92000 करोड़ रुपए है और इसे नरेंद्र मोदी सरकार के तहत विकसित किया जा रहा है। साल 2024 में गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया गया, जिसे चार चरणों में विकसित किया जाएगा।
पहला चरण 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य है, जिसमें 40 लाख TEU कंटेनर हैंडलिंग क्षमता होगी, जबकि 2058 तक यह बढ़कर 1.6 करोड़ TEU तक पहुँच सकती है।
रणनीतिक दृष्टि से भी यह प्रोजेक्ट बेहद अहम है। चीन ने हंबनटोटा पोर्ट, क्याउकप्यू पोर्ट और ग्वादर पोर्ट जैसे बंदरगाहों में निवेश कर हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, जिसे भारत के लिए चुनौती माना जाता है। ऐसे में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से भारत की निगरानी क्षमता, सैन्य तैनाती और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी।
यह परियोजना भारत की समुद्री कमजोरियों को दूर करने का प्रयास भी जारी है। वर्तमान में भारत के पूर्वी तट के कई बंदरगाहों की गहराई 8 से 12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि वैश्विक स्तर पर बड़े बंदरगाह 12 से 20 मीटर गहरे होते हैं।
इसी वजह से भारत का लगभग 25% कार्गो कोलंबो पोर्ट, सिंगापुर पोर्ट और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिप होता है। इससे हर साल करीब 1500 करोड़ रुपए का सीधा नुकसान और कुल मिलाकर 3000 से 4500 करोड़ रुपए तक का आर्थिक प्रभाव पड़ता है।
चीन को टक्कर देने की रणनीति
चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में कई बंदरगाह विकसित किए हैं। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करे।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के जरिए भारत समुद्री निगरानी बढ़ा सकता है, सैन्य तैनाती को आसान बना सकता है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है।
पर्यावरण बनाम विकास की बहस
इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी बहस पर्यावरण को लेकर है। विरोध करने वालों का कहना है कि इससे जैव विविधता को नुकसान होगा, जंगलों की कटाई बढ़ेगी और आदिवासी समुदायों का विस्थापन हो सकता है।
वहीं सरकार ने बताया है कि परियोजना सभी पर्यावरणीय नियमों के तहत बनाई जा रही है और नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त उपाय किए जाएँगे। इस मुद्दे पर देश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।
राहुल गाँधी का विरोध ऐसे समय में सामने आया है जब सरकार इस परियोजना को भारत के भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में पेश कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विरोध पूरी तरह पर्यावरणीय चिंताओं पर आधारित है या इसमें राजनीतिक पहलू भी शामिल है।


