Wednesday, August 10, 2022
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सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों और पत्रकारों के खिलाफ त्रिपुरा पुलिस द्वारा लगाए गए UAPA पर स्टे लगाने से किया इनकार

भले ही तीनों याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की गई हो, लेकिन अदालत ने मामले में पुलिस जाँच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने त्रिपुरा पुलिस द्वारा फर्जी खबरें फैलाकर राज्य में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश करने वाले 3 व्यक्तियों पर लगाए गए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है। हालाँकि, शीर्ष अदालत ने मामले में कोई स्टे ऑर्डर जारी नहीं किया और याचिकाकर्ताओं द्वारा माँगे गए यूएपीए के कुछ अन्य प्रावधानों के अधिकार को चुनौती देने वाली अन्य पिछली याचिकाओं के साथ मामले को टैग करने से इनकार कर दिया

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के सदस्य एडवोकेट मुकेश, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन के सचिव एडवोकेट अंसार इंदौरी और न्यूजक्लिक के पत्रकार श्याम मीरा सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ FIR को रद्द करने और यूएपीए के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने की माँग की गई। कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया है। साथ ही भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, डीवाई चंद्रचूड़ और सूर्यकांत की खंडपीठ ने इस दौरान पुलिस को आरोपितों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक दिया।

हालाँकि अदालत ने त्रिपुरा सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इसका जवाब कब तक देना है। इसके अलावा, भले ही तीनों याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की गई हो, लेकिन अदालत ने मामले में पुलिस जाँच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के दो वकील मुकेश और अंसार इंदौरी उन चार वकीलों के एक समूह का हिस्सा थे, जिन्हें त्रिपुरा पुलिस ने यूएपीए के तहत बुक किया था। इस ग्रुप ने तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग’ रिपोर्ट जारी किया था, जिसका टाइटल “Humanity under Attack in Tripura #MuslimsLivesMatter” था। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दुर्गा पूजा के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले के खिलाफ त्रिपुरा में हिंदुओं द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान मुसलमानों पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया था। इसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया था। 

तथाकथित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 12 मस्जिदों, 9 दुकानों और 3 मुस्लिमों के घरों पर हिंदू समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान हमला किया गया था। इस दावे का पुलिस ने पूरी तरह से खंडन किया था। त्रिपुरा सरकार का कहना है कि विरोध के दौरान कुछ मामूली हाथापाई हुई, लेकिन त्रिपुरा में किसी मस्जिद पर कोई हमला नहीं हुआ, जैसा कि वकीलों और अन्य लोगों ने आरोप लगाया था।

मामले में बुक किए गए अन्य दो वकीलों में एहतेशाम हाशमी और अमित श्रीवास्तव थे, जो लॉयर्स फॉर डेमोक्रेसी के कन्वेनर हैं। चारों वकीलों ने स्व-घोषित फैक्ट-फाइंडिंग टीम के रूप में दौरा किया था और उसके बाद रिपोर्ट प्रकाशित की थी। 

दूसरी ओर, पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने दावा किया था कि उन्हें पुलिस ने ट्विटर पर आरोप लगाने के लिए बुक किया था कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के विरोध के परिणामस्वरूप त्रिपुरा जल रहा है। पत्रकार और दो वकीलों ने त्रिपुरा पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दायर मामले को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी और यूएपीए के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी थी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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