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हिंदू महिला, मुस्लिम मर्द, दूसरी शादी: हाईकोर्ट ने कहा- विशेष विवाह अधिनियम के तहत यह स्वीकार नहीं

"ऐसा प्रतीत होता है कि इस्लामी कानून के अनुसार मूर्ति पूजा करने वाले के साथ मुस्लिम व्यक्ति का विवाह न तो वैध है और न ही शून्य विवाह है, बल्कि केवल एक अनियमित विवाह है।"

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक फैसले में हिंदू महिला से मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी को वैध नहीं माना है। अदालत ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम की धारा चार इस तरह की शादी को सुरक्षा प्रदान नहीं करती। लिहाजा यह विवाह मान्य नहीं है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस कल्याण राय सुराणा ने एक विधवा की याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। दरअसल, मुस्लिम व्यक्ति की हिंदू विधवा ने पति की मौत के बाद भी उसे पेंशन या अन्य दूसरे लाभ नहीं मिलने की शिकायत को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। जस्टिस सुराणा ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा के साथ-साथ मर चुके मोहम्मद सलीम बनाम शमशुदीन का जिक्र करते हुए सुप्रीम के फैसले का भी जिक्र किया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक, विशेष विवाह अधिनियम की धारा-4 के तहत मुस्लिम पुरुष द्वारा की गई दूसरी कॉन्ट्रैक्ट मैरिज अमान्य है।

जस्टिस सुराणा ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि इस्लामी कानून के अनुसार मूर्ति पूजा करने वाले के साथ मुस्लिम व्यक्ति का विवाह न तो वैध है और न ही शून्य विवाह है, बल्कि केवल एक अनियमित विवाह है।” अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता मुस्लिम नहीं हैं। लिहाजा इस्लामी कानून के तहत मुस्लिम व्यक्ति से वह विवाहित नहीं मानी जा सकती। साथ ही कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता की शादी इस्लामी कानून के अनुसार न होकर शेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत हुई थी। इस अधिनियम की धारा 4 (ए) के प्रावधान इस विवाह को शून्य बताते हैं।

अदालत ने इस बात का भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता आज भी अपने हिंदू नाम का इस्तेमाल कर रही हैं। उनके पास इस बात को साबित करने का भी कोई रिकॉर्ड नहीं है ​शादी के बाद उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के नाबालिग बेटे के पेंशन और दूसरे लाभों का हकदार होने के दावे को भी खारिज कर दिया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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