Sunday, August 1, 2021
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विधानसभा में MLA रिवॉल्वर निकाल ले तो क्या केस दर्ज नहीं होगा: सदन में हंगामे पर केरल सरकार से सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने पूछा, “क्या लोकतंत्र के मंदिर में चीजों को फेंकना और उन्हें बर्बाद करना न्याय के हित में है?"

सुप्रीम कोर्ट (SC) ने साल 2015 में केरल विधानसभा में हंगामे के लिए जिम्मेदार माकपा (CPI) नेताओं पर से केस वापस लेने की अनुमति माँगने वाली केरल सरकार की याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिका में सत्तारूढ़ एलडीएफ सरकार के शिक्षा मंत्री वी. शिवकुट्टी समेत 6 सदस्यों के खिलाफ अभियोजन रद्द करने की माँग की गई थी। साल 2015 में विपक्ष में रहते हुए इन सदस्यों ने विधानसभा में तोड़फोड़ की थी।

गुरुवार (जुलाई 15, 2021) को सुनवाई के दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने केरल सरकार से पूछा, “क्या लोकतंत्र के मंदिर में चीजों को फेंकना और उन्हें बर्बाद करना न्याय के हित में है?” उन्होंने कहा, “तथ्य यह है कि ये सार्वजनिक संपत्ति हैं और सरकार सार्वजनिक संपत्ति की संरक्षक है।”

राज्य की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार से उन्होंने कहा कि सदन के भीतर बोलने की आजादी है, इसमें कोई संदेह नहीं। सुप्रीम कोर्ट में भी अक्सर वकीलों में गर्मागर्म बहस होती है, लेकिन क्या इससे अदालत की संपत्ति को नुकसान पहुँचाना जायज हो जाएगा?

उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि विधानसभा में हो या सुप्रीम कोर्ट में, सभी संपत्तियाँ सरकार की हैं और सरकार ही सभी सार्वजनिक संपत्तियों की संरक्षक है। बचाव में दलीलें देकर सरकार केस क्यों वापस लेना चाहती है, यह तो आरोपितों को करना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने एक और उदाहरण देते हुए केरल सरकार से सवाल किया कि अगर एक विधायक विधानसभा में रिवॉल्वर निकाल ले और उसे चला दे तो क्या उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होगा। क्या कोई कह सकता है कि सदन के भीतर का कृत्य होने के कारण उनके खिलाफ केस दर्ज नहीं किया जा सकता और क्या कोई सदन की सर्वोच्चता का दावा करेगा। 

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए केरल सरकार से पूछा कि क्या सदन के ऐसे सदस्यों के खिलाफ मामलों को वापस लेने की माँग करना न्यायोचित होगा, जिन्होंने लोकतंत्र के मंदिर में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। 

रंजीत कुमार ने इसे राजनीतिक अभिव्यक्ति का मामला बताते हुए कहा कि यह विरोध था और बोलने की तरह विरोध के अधिकार को भी सदन में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने विशेषाधिकार और छूट हासिल होने का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा, “शायद फर्नीचर टूटे थे, लेकिन यह भी अभिव्यक्ति और विरोध का एक रूप है।” इस पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह संपत्ति निजी संपत्ति नहीं थी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जुलाई 2021) को कहा था कि चुने हुए प्रतिनिधियों के सदन में अनियंत्रित व्यवहार को माफ नहीं किया जा सकता है और उन्हें सदन के अंदर सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने के लिए मुकदमे का सामना करना होगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत देने से इनकार करते हुए आगे की सुनवाई के लिए 15 जुलाई की तारीख तय की थी। कोर्ट ने विधायकों द्वारा विधानसभा में माइक तोड़ने और हंगामा करने पर सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था, “ये संगीन मामला है। विधायकों पर मुकदमा चलना चाहिए। आपने पब्लिक प्रॉपर्टी को बर्बाद किया है। आप जनता को क्या संदेश देना चाह रहे हैं।” 

बता दें कि 13 मार्च, 2015 को तत्कालीन विपक्ष के एलडीएफ सदस्यों ने तत्कालीन वित्त मंत्री केएम मणि को बजट पेश करने से रोकने के लिए सदन में तोड़फोड़ की थी। उन्होंने स्पीकर की कुर्सी को पोडियम से उठाकर फेंक दिया था और पीठासीन अधिकारी की डेस्क पर लगे कंप्यूटर, की-बोर्ड और माइक जैसे इलेक्ट्रानिक उपकरणों को क्षतिग्रस्त कर दिया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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