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‘वो बेचारे हैं, प्रताड़ित किया जा रहा’: नासिक TCS कांड के बाद जिहादियों के बचाव में उतरा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम, राजदीप से आरफा तक बने कट्टरपंथियों के ‘मसीहा’

नासिक TCS मामले ने यौन शोषण और धर्मांतरण की कोशिश के मामले में वामपंथी इस्लामी लिबरल को कहीं मुस्लिम बेचारा नजर आ रहा है तो कहीं भेदभाव का शिकार। उन्हें महिलाओं के साथ अपराध नजर नहीं आता। बल्कि भोले भाले बेचारों को फँसाने की साजिश नजर आती है और वह रेप नहीं बल्कि 'रिलेशनशिप में कटुता' आने पर आरोप नजर आता है।

महाराष्ट्र में TCS नासिक के BPO में 2021 से चल रहे धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न का खुलासा होने पर पूरा देश सन्न रह गया है। इसने देश में साजिश कर हिन्दू महिलाओं को कैसे लव ट्रैप में फँसा कर धर्मांतरण के लिए विवश किया जा रहा है इसका भी जीता जागता उदाहरण है।

पहले चुप्पी साध रखी थी वामपंथी लिबरल ग्रुप ने

इस मामले में पहले तो वामपंथी लिबरल मीडिया को साँप सुंघ गया और उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अब उनके बचाव के लिए मुस्लिम टीम लीडर्स द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न को ‘रिलेशनशिप’ का नाम दिया जा रहा है। साथ ही ‘मुस्लिम टारगेट’ कह कर घटना की गंभीरता को कमतर करने की कोशिश की जा रही है।

इस मामले में 9 FIR दर्ज होने के बाद दानिश शेख, तौसीफ अत्तार, रज़ा मेमन, शाहरुख कुरैशी, आसिफ अंसारी, शफी शेख, अश्विनी चाननी के साथ-साथ एचआर अधिकारी निदा खान को गिरफ्तार कर लिया गया है। निदा खान ने हिंदू लड़की कर्मचारियों को भर्ती करने में मदद की। उन्हें बुर्का, हिजाब और इस्लामी रीति-रिवाज अपनाने के लिए मजबूर किया और फिर जानबूझकर उनके यौन शोषण की शिकायतों को दबा दिया।

इससे पता चलता है कि इस्लामी कट्टरपंथी कंपनी में हिन्दू लड़कियों को फँसाने के लिए किस हद तक सक्रिय थे। इसके बावजूद, चूँकि आरोपी मुस्लिम हैं, इसलिए इस्लामी-वामपंथी लिबरल ग्रुप अब इसके बचाव में सामने आ गए हैं।

राजदीप सरदेसाई का कहना है कि न्याय तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। एजेंडे के आधार पर नहीं। भाई एजेंडा तो आप चला रहे हैं मुस्लिम कट्टरपंथियों को ‘निर्दोष’ दिखाने का। जाँच पारदर्शी और निष्पक्ष हो, यह सभी चाहते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में एक आरोपित की पत्नी का हवाले देते हुए कहा जा रहा है कि शिकायत करने वालों और आरोपित दानिश शेख के रिश्ते में कड़वाहट आ गई थी। इसलिए ये मामला उजागर हुआ। ये ‘रिलेशनशिप’ का मामला था। ये भी कहा गया है कि ‘सभी मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया।’

जाँच में सामने आया है कि ये मामला एक नहीं अनेक है, जो 2021 से चल रहा है। मजबूर हिन्दू लड़कियों को जॉब देकर उनका फायदा उठाना। यौन उत्पीड़न करना और इस्लाम कबूलने का दबाव बनाना- एक जैसा पैटर्न है। इसमें शामिल सभी मुस्लिम टॉप लीडर्स हैं, जो आसानी से अपनी टीम की लड़कियों का फायदा उठा रहे थे। इतना ही नहीं जिन लड़कियों ने हिम्मत करके एचआर तक अपनी शिकायत दर्ज करवाई। उस पर निया खान ने एक्शन होने ही नहीं दिया। मामले को दबा दिया।

ऐसी चीजों का बचाव करना बहुत ही शर्मनाक है। एसआईटी जाँच कर रही है और उसमें सारी बातों का खुलासा भी हो जाएगा। दरअसल जहाँ मुस्लिम शामिल होते हैं, वामपंथी इस्लामी कट्टरपंथी उनके बचाव में आ जाते हैं। इतिहास गवाह है कि इनलोगों ने आतंकवादियों को भी सही ठहराने की कोशिश की। मुसलमानों पर लगे हर आरोप की लीपा पोती कर, उन्हें कमतर आँकने की कोशिश करते रहे हैं।

इस्लामी-वामपंथी गुट एकजुट होकर हिंदू पीड़ितों की पीड़ा को कम करके आँकने और जिहादियों को बचाने की कोशिश करता है। हिन्दुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने वाला मीडिया संस्थान ‘द वायर’ ने पहले टीसीएस नासिक कांड पर चुप्पी साध ली। ‘द क्विंट और ‘स्क्रॉल’ ने भी यही किया।

इस्लामी पहचान बता ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश

लेकिन, इस्लामी कट्टरपंथी प्रोपेगेंडा बाज अरफा खानम शेरवानी ने फौरन ही आरोपितों की इस्लामी पहचान का सहारा लेकर उन्हें ‘पीड़ित’ बताने में देर नहीं लगाई। उसने कहा कि कुछ चुनिंदा लोगों (मुस्लिमों) को मुश्किल से नौकरी मिलती है, उन्हें भी अब टारगेट किया जा रहा है।

दरअसल ये प्रवृत्ति इस्लामी-वामपंथी इकोसिस्टम की पहचान बन चुकी है। ये लोग अपराध का विश्लेषण धर्म के आधार पर करते हैं। वे यह तय करते हैं कि ‘अपराध’ की निंदा की जानी चाहिए या उसे कम करके आँका जाना चाहिए।

अरफा खानम ने पीड़ित हिन्दू महिलाओं के बारे में बोलना भी जरूरी नहीं समझा, बल्कि कह दिया कि मुस्लिमों के खिलाफ साजिश की जा रही है। उसका कहना है, ‘इस बहुसंख्यकवादी व्यवस्था में जिन गिने-चुने लोगों को नौकरियाँ मिली हैं, उन्हें भी बेरोजगार बना देना है।’

लिबरल वामपंथियों के पसंदीदा फे डिसूजा ने काफी दिनों तक इस पर मौनधारण कर लिया। लेकिन जब लिखा तो उसमें ‘गंभीरता’ नहीं थी। उनका पूरा ध्यान आरोपितों का नाम छिपाने में लगा रहा। पीड़ित हिंदू महिलाओं की गरिमा और उनकी सुरक्षा उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।

अपराधियों को बचाने की कोशिश

नसरीन खान को पूरी घटना में हिन्दुओं द्वारा मुस्लिम आरोपितों से ‘जलना’ समझ में आया। उसने 5 साल से ज्यादा वक्त से कई महिलाओं के साथ हो रहे यौन शोषण को अफवाह करार दे दिया। ‘सी ग्रेड’ की फिल्मी कहानी की तरह उसने बताया, ‘TCS में काम करने वाले कुछ मुस्लिम लड़कों ने अपनी कड़ी मेहनत से बहुत बड़ी सफलता हासिल की थी। कंपनी में आगे बढ़ रहे इन स्मार्ट मुस्लिम लड़कों के अपने जूनियर हिंदू महिला सहकर्मियों के साथ दोस्ताना संबंध थे। यह बात कंपनी के कुछ हिंदू लड़कों को रास नहीं आई, और वे उनकी तरक्की से जलने लगे।’

वह यह भी बताती है कि TCS का माहौल अच्छा था, क्योंकि रमजान का भी सम्मान किया जाता था। वह यह भी कह रही है कि हिन्दुओं को निदा खान से चिढ़ थी, क्योंकि वह मुस्लिम थी। इसके बाद VHP और बजरंग दल का नाम लेते हुए उसने HR मुस्लिम लड़की को फँसाने का आरोप लगा दिया।

एक टैटू आर्टिस्ट इस्लाम की जानकार बनकर अपराधियों को बचाने की कोशिश करती है। श्यामली पांडा जानना चाहती हैं कि ‘जबरदस्ती धर्म बदलने से उन्हें आखिर क्या फायदा होता है?’ साथ ही दलील भी दे दी कि इस्लाम में धर्म को लेकर कोई जबरदस्ती नहीं है, चाहे वह दबाव से हो या ताकत से।

उन्होंने सवाल उठाया कि यह कैसे मुमकिन है कि अपराधी उन पर नमाज पढ़ने का दबाव डालें, तब जब वह उस वक्त खुद नमाज पढ़ेंगे। साथ ही ये भी तर्क दिया है कि बीफ खाने से कोई मुस्लिम नहीं बन जाता और न ही वह हिन्दू धर्म से बाहर हो जाता है। घटना को लेकर उसने कह दिया कि यह इस देश में मुसलमानों को इंसान न समझने की एक और कोशिश है।

इस्लाम की इस जानकार को न तो भारत का इतिहास पता है और न ही भारत में आतंकी घटनाओं के पीछे की वजह जानने में दिलचस्पी है। भारत का इतिहास इस्लामी आक्रांताओं की ज्यादतियों से पटा पड़ा है। ‘इस्लामी जिहाद’ का नारा बुलंद करने वाले ‘इस्लामिक स्टेट’, ‘जैश-ए-मोहम्मद’ और ‘लश्कर-ए-तैयबा’ जैसे खूंखार आतंकी संगठन मुस्लिम कट्टरपंथियों की देन हैं।

बेगुनाहों के खून से इनके हाथ रंगे हुए हैं। आतंकवाद फैलाने के लिए ये लोग इस्लाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। बांग्लादेश- पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ ज्यादती इन्हें नजर नहीं आती। हिन्दुओं की इन देशों में घटती आबादी, जबरदस्ती धर्मांतरण, मासूम लड़कियों को उठाकर जबरदस्ती धर्मांतरण कर निकाह कर लेना, इन्हें नजर नहीं आता। आखिर ‘इस्लाम’ में ये गलत है, तो इस्लामिक देशों में ये घटनाएँ होती कैसे हैं?

खोखले तर्क और खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश फहीम खान ने भी अपने ट्वीट में की है। 5 साल से इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काम कर रहे फहीम खान का कहना है कि आईटी के क्षेत्र में काम कर रहे ‘मुस्लिम’ सबसे ज्यादा अनुशासित, मेहनती होते हैं। वे दबाव में भी शांत रह कर अच्छा काम करते हैं। वे सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए समय और जगह चाहते हैं, और अगर काम का बोझ ज्यादा हो, तो देर तक रुक कर काम पूरा होने के बाद ही जाते हैं।

उन्होंने कहानी बना कर मुस्लिम कर्मचारियों को ‘द बेस्ट’ बताने की कोशिश की। लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि कोई धर्म मेहनती या अनुशासित नहीं बनाता। यह व्यक्तिगत गुण होते हैं। अगर ऐसा होता तो इस्लामिक देश अपराध और अराजकता मुक्त होता।

महिला पुलिस के खुलासे का भी विरोध

पूर्व पत्रकार इरेना अकबर ने घटना को गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की। साथ ही इस मामले का भंडाफोड़ करने के लिए गुप्त रूप से फर्म में गई महिला पुलिसकर्मियों की भी आलोचना की और उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि उनका ध्यान कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर होना चाहिए, न कि निजी कार्यालयों की बातचीत सुनने पर।

एक और बयान में आरोपितों का बचाव करते हुए कहा गया कि प्राइवेट क्षेत्र में मुसलमानों को ठीक वैसे ही निशाना बनाया गया है, जैसे सरकारी क्षेत्र में किया जाता है। कहने का मतलब है कि भारत में मुस्लिमों के साथ ‘भेदभाव’ किया जाता है। ये आरोप उस देश में लगाए जा रहे हैं जहाँ दशकों तक मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए शाहबानों केस सुर्खियाँ बनीं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे संस्थान सक्रिय हैं। वक्फ बोर्ड के पास संपत्तियों का अंबार है।

यौन उत्पीड़न करने वालों का विरोध न कर घटना को मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश ने इनकी असलियत सामने ला दी है।

इस्लामो-वामपंथी हमेशा ही अपराधों और अपराधियों के खिलाफ बोलने से पहले उसके धर्म को देखते हैं। वे हिंदुओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटना की जमकर निंदा करते हैं। कई मामलों में तो पूरे हिन्दू समुदाय को शर्मसार करने की कोशिश की जाती है, मनगढ़ंत तरीके ढूँढ लिए जाते हैं, लेकिन गलती से मामला इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़ा हो, तो बंगले झाँकने लग जाते हैं। सबसे ताजा उदाहरण दिल्ली में 28 साल के तरुण कुमार की हत्या का है। उसे कट्टरपंथियों ने पीट-पीट कर जान ले ली। पूरा मामला सामने आने के बाद मृतक का ही चरित्रहनन करने की कोशिश करने लगे।

टीसीएस मामले में भी इस्लामी वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों की करतूत वैसी ही है। अपराधी मुस्लिम निकले तो उन्हें पीड़ित दिखाओ, समाज को ‘मुस्लिम विरोधी’ साबित करने की कोशिश करो, भले ही इसमें कई पीड़ित महिलाओं की सिसकियाँ दब जाए, उनकी जिंदगी उजड़ जाए और वह इंसाफ की भीख माँगते-माँगते पूरी जिंदगी गुजार दे।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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