हिंदू श्रद्धालुओं के एक समूह ने बुधवार (17 दिसंबर 2025) को मद्रास हाईकोर्ट में कहा कि तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त का हिंदू धर्म के प्रति ‘तिरस्कार और अवमानना’ वाला रवैया है।
ये टिप्पणी तमिलनाडु सरकार और मदुरै जिला प्रशासन द्वारा दायर एक अपील की सुनवाई के दौरान की गई। यह अपील एकल जज के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम (दीपक) जलाने की अनुमति दी गई थी। इसी पहाड़ी पर अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर और सिकंदर बदूशा दरगाह दोनों स्थित हैं।
सरकार की अपील उस आदेश को चुनौती देती है, जो जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 4 दिसंबर 2025 को अवमानना याचिका पर सुनाते हुए दिया था। उस आदेश में उन्होंने मदुरै जिला प्रशासन द्वारा जारी निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया था, जिसके जरिए हिंदू श्रद्धालुओं को थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने से रोका गया था।
इस अपील पर जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। इसके अलावा कुछ अन्य अपीलें भी कोर्ट में दायर की गईं, जिनमें 9 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए एक अन्य आदेश को चुनौती दी गई है। उस आदेश में उन्होंने अवमानना मामले में मुख्य सचिव, एडीजीपी और डीसीपी को पेश होने का निर्देश दिया था, साथ ही केंद्रीय गृह सचिव को भी पक्षकार बनाने को कहा था।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि दीपथून (जहाँ दीपक जलाया जाता है) उस क्षेत्र में नहीं है, जो मुस्लिमों का है। इसलिए वहाँ कार्तिगई दीपम जलाने से मुस्लिमों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसी आधार पर उन्होंने दीपक जलाने की अनुमति दी थी।
आयुक्त ने किया हिन्दू धर्म का अपमान
हिंदू भक्त की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीराम ने हाई कोर्ट में कहा कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त ने पहले यह टिप्पणी की थी कि भगवान मुरुगन की दो पत्नियाँ होने के बावजूद थिरुपरनकुंद्रम में दो दीपक नहीं जलाए जा सकते।
इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए श्रीराम ने कहा कि उनकी आस्था और उनके भगवानों पर भरोसे का विषय आयुक्त द्वारा उपहास और तिरस्कार का कारण बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह उनके धर्म का अपमान है और उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे आयुक्त के पास उन्हें न भेजें, जिनके मन में उनकी आस्था के प्रति सम्मान नहीं बल्कि अपमान है।
वहीं, एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केपीएस पलनिवेल ने भी दलील दी कि पहाड़ी पर दूसरा दीपक जलाने पर आपत्ति करने का अधिकार अधिकारियों को नहीं है। उन्होंने कहा कि दीप प्रज्वलन एक आवश्यक धार्मिक परंपरा है और इसे पहाड़ी की चोटी पर ही किया जाना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले से एक दीपक जल रहा है, इसलिए दूसरा क्यों जलाया जाए। दीपम का धर्म में अपना विशेष महत्व और स्थान है।
पलनिवेल ने आगे बताया कि दीपक जलाने के कई धार्मिक और व्यावहारिक कारण हैं। पहला, यह ईश्वर का प्रतीक और स्वरूप माना जाता है। दूसरा, इससे पूरे गाँव के लोग दूर से इसे देख सकते हैं। तीसरा, पुराने समय में जब बिजली नहीं थी, तब प्रकाश का विशेष महत्व था। उन्होंने यह भी कहा कि पहाड़ों की एक से अधिक चोटियाँ हो सकती हैं और कई पहाड़ दोहरी चोटियों वाले होते हैं। इस पहाड़ी पर भी दो चोटियाँ हैं।
उन्होंने समझाया कि दीपक जलाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान वह चोटी होती, जिस पर दरगाह स्थित है। लेकिन किसी कारणवश मंदिर अपनी सबसे ऊँची चोटी खो चुका है, इसलिए उसके बाद वाली दूसरी ऊँची चोटी को दीप प्रज्वलन के लिए चुना गया। इसी संदर्भ में उन्होंने कार्तिगई दीपम के धार्मिक महत्व को कोर्ट के सामने विस्तार से रखा।
राज्य चाहता है कि हिंदू अपने अधिकारों का त्याग करके सह-अस्तित्व में रहें: हिंदू श्रद्धालु
सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कोर्ट से कहा कि राज्य सरकार की यह दलील स्वीकार नहीं की जानी चाहिए कि भक्तों को कोर्ट जाने के बजाय HR&CE (हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त) विभाग के पास जाकर विवाद सुलझाना चाहिए। श्रीराम ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अधिकारियों के सामने मेरे अधिकार सुरक्षित हैं। वहाँ मुझे और कितना अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ेगा?”
उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में मध्यस्थता (मेडिएशन) का कोई मतलब नहीं है। उनका तर्क था कि अब तक जितनी भी शांति बैठकों या समझौता बैठकों का आयोजन हुआ है, हर बार मंदिर को ही पीछे हटना पड़ा है और अपने अधिकार छोड़ने पड़े हैं।
उन्होंने इसकी तुलना मानसिक प्रताड़ना से करते हुए कहा कि यह ऐसा है जैसे पहले चोट पहुँचाई जाए और फिर दर्द में ही समझौते की बात की जाए। श्रीराम ने कहा कि हर बार समाधान के नाम पर हिंदुओं को ही अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ी है।
सीनियर एडवोकेट ने राज्य सरकार पर हिंदुओं के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य सह-अस्तित्व की बात तो करता है, लेकिन इसकी कीमत हिंदुओं से उनके अधिकार छोड़ने के रूप में चुकाने को कहा जा रहा है। श्रीराम ने कहा, “राज्य का रवैया यह है कि अपने अधिकारों का दावा मत करो, पीछे हटते रहो और किसी तरह साथ रहते रहो। जबकि राज्य का कर्तव्य है कि वह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मेरे धार्मिक अधिकारों की रक्षा करे और पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ रहे।”
उन्होंने यह भी कहा कि वह सह-अस्तित्व के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सह-अस्तित्व का मतलब अधिकारों का समर्पण नहीं हो सकता। श्रीराम ने आगे कहा कि मंदिर के अधिकारों पर अतिक्रमण करने की कोशिशें पहले से हो रही हैं और यह सिर्फ आशंका नहीं है।
उन्होंने बताया कि दूसरी ओर से पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल’ कहा जा रहा है, वहाँ पशु बलि की माँग की जा रही है और मंदिर की दीवारों को नुकसान पहुँचाया गया है। उन्होंने कहा कि धर्म का कोई रंग नहीं होना चाहिए, लेकिन एक त्योहार के दौरान पहाड़ियों को हरे रंग से रंग दिया गया। उनके अनुसार, ये सभी घटनाएँ मंदिर और हिंदू धार्मिक अधिकारों पर सीधा हमला हैं।
राज्य द्वारा पहाड़ी का स्वरूप बदलने का प्रयास: हिंदू श्रद्धालु
सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह फैसला पूरी तरह से तर्क और कारणों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू श्रद्धालुओं के वैध अधिकारों को बरकरार रखने के कारण ही जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ डीएमके के नेतृत्व वाले पूरे INDI गठबंधन ने महाभियोग प्रस्ताव शुरू किया है।
श्रीराम ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि जस्टिस स्वामीनाथन का आदेश मनमर्जी या खयाली सोच पर आधारित था। उन्होंने कहा, “यह एक सुविचारित और कारणों से भरा हुआ आदेश है। अगर कहीं मनमानी है, तो वह अपीलकर्ताओं के पक्ष में है, जो एक पक्ष के प्रति आँख मूँदकर झुके हुए हैं और दूसरे पक्ष का खुलकर स्वागत कर रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि यही पक्षपात मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट बोर्ड तक पहुँच गया है, जो इस मुद्दे पर बोलने से इनकार कर रहे हैं, जबकि कार्यकारी अधिकारी राज्य सरकार की लाइन पर ही काम कर रहा है।
Places of Worship Act को लेकर राज्य की दलील का जवाब देते हुए श्रीराम ने कहा कि हिंदुओं पर धार्मिक स्वरूप बदलने का आरोप गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया, “अगर कोई इस पहाड़ी के धार्मिक स्वरूप को बदल रहा है, तो वह राज्य है। यह स्थान हमेशा से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए दीपथून (दीप स्तंभ) रहा है।”
राज्य यह साबित नहीं कर सका कि पत्थर का स्तंभ दीपथून नहीं है: हिंदू श्रद्धालु
हाई कोर्ट में एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वल्लीअपन ने कहा कि तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी के शीर्ष पर कार्तिगई दीपम जलाना हिंदुओं की एक अनिवार्य धार्मिक परंपरा है। उन्होंने कहा कि कार्तिगई के दिन पहाड़ी पर दीप जलाने के पीछे गहरा धार्मिक आस्था है।
वल्लीअपन ने कोर्ट में कहा, “इस दीप के माध्यम से हमें भगवान के ज्योति स्वरूप के दर्शन होते हैं, जिसे हर कोई देख सकता है। पहाड़ी के ऊपर अग्नि (दीप) जलाने का विशेष धार्मिक महत्व है। हम इसे स्वयं भगवान का रूप मानते हैं, इसलिए इसे पहाड़ी के शीर्ष पर जलाया जाता है।”
उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार यह साबित करने के लिए कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर सकी कि जिस स्तंभ पर दीप जलाया जाता है, वह दीपस्तंभ (दीपथून) नहीं है। मुस्लिम पक्ष की दलील का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कल यह तर्क दिया गया कि पूरी पहाड़ी हमारी है, लेकिन यह दावा सही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरी पहाड़ी देवस्थानम की है, केवल कुछ हिस्से इससे अलग हैं।
इस मामले में अधिवक्ता कृष्णवल्ली ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य बार-बार इस मुद्दे को कोर्ट के बाहर सुलझाने पर जोर क्यों दे रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष को कोर्ट में सुनवाई पर कोई आपत्ति नहीं है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब भी कोई हिंदू या आम नागरिक कोर्ट आता है ताकि पूजा सही तरीके, सही स्थान और सही समय पर हो सके, तो देवस्थानम और HR&CE विभाग यह क्यों कहते हैं कि मामले को HR&CE के पास भेजा जाए।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


