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मालदा बंधक विवाद के बीच ताजी हुई 2016 के दंगों की याद, इस्लामी भीड़ ने फूँका था पुलिस थाना: जानें- कैसे कमलेश तिवारी विवाद की आड़ में हिंदुओं और मंदिरों पर हुए थे हमले

मालदा में जनवरी 2016 में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। तब कमलेश तिवारी के पैगंबर मुहम्मद पर विवादित बयान के खिलाफ मुस्लिम समुदाय ने रैली निकाली थी जो जल्दी ही हिंदुओं को निशाना बनाने वाली दंगे में बदल गई थी।

पश्चिम बंगाल के कालियाचक में पैदा हुआ तनाव उस जगह की पुरानी हिंसक घटनाओं की याद दिला रहा है। यही वह इलाका है जहाँ कुछ दिन पहले एक भीड़ द्वारा न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था। इस नई घटना ने 2016 में हुए कुख्यात मालदा दंगे की याद को फिर से ताजा कर दी हैं।

जनवरी 2016 में यहाँ बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया था। देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई, जिसमें बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और पूरा इलाका तनाव की चपेट में आ गया। यह घटना पश्चिम बंगाल की सबसे हिंसक घटनाओं में से एक मानी जाती है, जिसने पूरे क्षेत्र में डर और अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया था।

कैसे एक विरोध प्रदर्शन हिंसक दंगे में बदल गया

पश्चिम बंगाल के कालियाचक (मालदा जिला) में 3 जनवरी 2016 को हजारों लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ एक राजनीतिक व्यक्ति कमलेश तिवारी द्वारा की गई विवादित टिप्पणी के विरोध में जुटी थी। इस रैली को अनुमति मिली हुई थी और इसे मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित किया गया था, जो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे थे।

शुरुआत में यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया, बैरिकेड तोड़ दिए गए और पुलिस व सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हो गई। कुछ ही समय में यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह दंगे में बदल गया।

उग्र मुस्लिम भीड़ ने कालियाचक थाने पर हमला कर दिया, दफ्तरों में तोड़फोड़ की और वाहनों को आग के हवाले कर दिया। ब्लॉक विकास कार्यालय को भी निशाना बनाया गया और वहाँ जमकर नुकसान किया गया। सरकारी रिकॉर्ड, कंप्यूटर और फाइलें नष्ट कर दी गईं।

हालात ऐसे हो गए कि पुलिसकर्मियों को वहाँ से भागना पड़ा और भीड़ ने पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया। इन झड़पों में 30 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। साथ ही सीमा सुरक्षा बल और नॉर्थ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के कई वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया।

रेलवे नाकाबंदी और व्यापक व्यवधान

हिंसा केवल सरकारी इमारतों तक सीमित नहीं रही। प्रदर्शनकारी आगे बढ़ते हुए खाल्टिपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गए और कई घंटों तक रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया, जिससे ट्रेन सेवाएँ पूरी तरह ठप हो गईं।

नेशनल हाईवे 34 भी इस हिंसा से प्रभावित हुआ, जब एक NBSTC बस को आग के हवाले कर दिया गया और सड़क पर चल रहे वाहन वहीं फंस गए। हालात इतने बिगड़ गए कि यात्रियों को अपनी जान बचाने के लिए वाहन छोड़कर भागना पड़ा, क्योंकि भीड़ लगातार उग्र होती जा रही थी।

इस दौरान दुकानों के शटर गिर गए, सड़कों पर आवाजाही रुक गई और आम जनजीवन पूरी तरह ठहर गया। आसपास के इलाकों में डर का माहौल फैल गया, लोग अपने घरों में ही रहने को मजबूर हो गए।

हिंदू प्रॉपर्टी पर टारगेटेड हमलों की रिपोर्ट

उस समय सामने आई कई रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि हिंसा ने सांप्रदायिक रूप ले लिया था। आसपास के इलाकों, खासकर बेलियाडांगा में स्थित मंदिरों, जैसे शनि मंदिर और दुर्गा मंदिर, पर भी हमले किए गए। इसके अलावा हिंदू समुदाय से जुड़े करीब 25 घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की गई।

इन घटनाओं ने इलाके में तनाव और बढ़ा दिया। कई लोगों का कहना था कि शुरुआती विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ इस दंगे में हिंदू विरोधी हिंसा के तत्व भी शामिल हो गए थे, जिससे माहौल और ज्यादा संवेदनशील बन गया।

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई?

इस विरोध प्रदर्शन की जड़ दिसंबर 2015 में कमलेश तिवारी द्वारा दिए गए बयान में थी। पैगंबर मोहम्मद को लेकर की गई उनकी टिप्पणी के बाद देशभर में मुस्लिम संगठनों में भारी नाराजगी फैल गई थी।

यह विवाद खुद उस समय और बढ़ गया था, जब आजम खान ने समलैंगिकता कानून पर चल रही बहस के दौरान RSS सदस्यों को लेकर बयान दिया था। उस समय यह बहस भारतीय दंड संहिता की धारा 377 से जुड़ी हुई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में फिर से लागू कर दिया था, जबकि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था।

कमलेश तिवारी के बयान के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। कई संगठनों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई, यहाँ तक कि मौत की सजा तक की माँग की थी। बाद में उन्हें लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया था, जहाँ उन पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने और आपसी वैमनस्य फैलाने से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज किया गया था।

भारी भीड़ और अचानक तनाव बढ़ना

मालदा में हुई इस रैली में कथित तौर पर हजारों से लेकर दो लाख से ज्यादा लोगों की भागीदारी बताई गई थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, स्थिति तब बिगड़नी शुरू हुई जब इलाके से गुजर रही भीड़ का सामना पुलिस और सुरक्षा बलों से हुआ और उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया।

बताया जाता है कि एक बस और सुरक्षा कर्मियों के बीच हुई झड़प ने भी हालात को और भड़काने का काम किया। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन बेकाबू हो गया और हिंसा में बदल गया।

भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस को करीब 40 राउंड हवाई फायरिंग करनी पड़ी। हालात संभालने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स को तैनात किया गया, जिसके बाद जाकर स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में लाई जा सकी।

पुलिस कार्रवाई और प्रतिबंध

हिंसा के बाद हालात को काबू में करने के लिए प्रशासन ने धारा 144 लागू कर दी, ताकि किसी भी तरह की भीड़ इकट्ठा न हो सके। इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए फ्लैग मार्च भी निकाले गए।

राजनीतिक दौरों पर भी रोक लगा दी गई। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, जिनमें समीक भट्टाचार्य और एस एस अहलूवालिया शामिल थे।  उनके एक प्रतिनिधिमंडल को इलाके में प्रवेश करने से रोक दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि उनके आने से स्थिति और बिगड़ सकती है।

दंगे के बाद के दिनों में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और इसमें शामिल लोगों की पहचान करने के लिए जाँच शुरू की गई।

क्या हिंसा के पीछे कोई और मकसद था?

हालाँकि इस पूरे मामले की शुरुआत कमलेश तिवारी के बयान के विरोध से हुई थी, लेकिन बाद की जाँच में यह संकेत मिले कि हिंसा पूरी तरह अचानक नहीं थी। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि कुछ आपराधिक तत्वों ने इस विरोध प्रदर्शन का इस्तेमाल अपने मकसद के लिए किया। एक अहम पहलू यह भी था कि थाने के अंदर मौजूद रिकॉर्ड को खास तौर पर निशाना बनाकर नष्ट किया गया।

कालियाचक और इसके आसपास के इलाके पहले से ही नकली नोटों के कारोबार, ड्रग तस्करी और अवैध पोस्ता खेती जैसी गतिविधियों को लेकर जाँच के दायरे में रहे थे। अधिकारियों के अनुसार, दंगे से पहले इन नेटवर्क्स के खिलाफ कार्रवाई की गई थी, जिसमें बड़े पैमाने पर पोस्ता की फसलों को नष्ट किया गया था। माना जाता है कि इस कार्रवाई से स्थानीय आपराधिक समूह नाराज थे और उसी का असर इस हिंसा में देखने को मिला।

पोस्ता माफिया और अवैध व्यापार

मालदा क्षेत्र, खासकर बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास के इलाके, लंबे समय से अवैध गतिविधियों के लिए जाने जाते रहे हैं। इनमें तस्करी, नकली नोटों का कारोबार और मादक पदार्थों का उत्पादन शामिल है।

पोस्ता की खेती, जिसका इस्तेमाल अफीम और हेरोइन बनाने में होता है, यहाँ बड़े पैमाने पर की जाती थी। दंगों से ठीक कुछ दिन पहले ही प्रशासन ने इन फसलों को नष्ट करने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया था।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि भीड़ द्वारा थाने पर किया गया हमला इन अवैध गतिविधियों से जुड़े सबूतों को खत्म करने के मकसद से हो सकता है। इस आशंका को इस बात से भी बल मिला कि थाने के अंदर मौजूद रिकॉर्ड, फाइलें और कंप्यूटर को खास तौर पर निशाना बनाकर नष्ट किया गया था।

भूगोल और जनसांख्यिकीय संदर्भ

मालदा जिला हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की मिश्रित आबादी वाला क्षेत्र है, जहाँ कालियाचक जैसे कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी अधिक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जिले में दोनों समुदायों की अच्छी-खासी मौजूदगी है।

इस जिले की स्थिति बिहार, झारखंड और बांग्लादेश की सीमा के पास होने के कारण इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील बनाती है। सीमा से लगे इलाकों का इस्तेमाल अक्सर अवैध व्यापार के लिए रास्ते के तौर पर किया जाता रहा है। इसी जनसंख्या की विविधता और आपराधिक नेटवर्क के मेल ने इस क्षेत्र को अचानक भड़कने वाली हिंसा के लिए संवेदनशील बना दिया है।

नागरिक समाज और अलग-अलग विचार

हर कोई इस बात से सहमत नहीं था कि यह हिंसा पूरी तरह सांप्रदायिक थी। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (APDR) नाम के एक नागरिक अधिकार संगठन ने कहा कि इस घटना को केवल सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

संगठन के प्रतिनिधियों का तर्क था कि यह हिंसा ज्यादा कानून व्यवस्था की कमजोरी और उपद्रवियों की भूमिका को दिखाती है, न कि किसी सोची-समझी सांप्रदायिक साजिश को।

हालाँकि, राजनीतिक दलों और स्थानीय रिपोर्ट्स में इस दंगे की प्रकृति को लेकर बहस जारी रही। कुछ लोगों ने इसे सांप्रदायिक गुस्से से प्रेरित सुनियोजित हमला बताया, जबकि अन्य ने इसके पीछे आपराधिक कारणों को जिम्मेदार ठहराया।

आज भी स्थायी प्रभाव और प्रासंगिकता

2016 के मालदा दंगे 2016 ने पूरे क्षेत्र पर गहरा असर छोड़ा था। इस घटना ने कानून-व्यवस्था की कमजोरियों, अवैध नेटवर्क के प्रभाव और समुदायों के बीच संतुलन की नाजुक स्थिति को उजागर कर दिया था।

अब जब उसी कालियाचक इलाके में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं, तो 2016 की घटनाएँ और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती हैं।

एक ही जगह पर बार-बार भीड़ की ऐसी घटनाएं होना शासन, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या उन मूल समस्याओं को कभी पूरी तरह हल किया गया था, जिनकी वजह से पहले इतनी बड़ी हिंसा हुई थी।

तनाव का एक पैटर्न

2016 की घटनाओं ने यह दिखाया कि जब धार्मिक भावनाएँ, राजनीतिक तनाव और आपराधिक हित एक साथ जुड़ जाते हैं, तो कोई भी विरोध प्रदर्शन कितनी जल्दी बड़े स्तर की हिंसा में बदल सकता है। हाल ही में सामने आई बंधक बनाए जाने की घटना यह संकेत देती है कि कालियाचक आज भी एक संवेदनशील और अस्थिर इलाका बना हुआ है।

जब प्रशासन मौजूदा हालात से निपटने में लगा है, तब 2016 के दंगों से मिले सबक यह याद दिलाते हैं कि ऐसे क्षेत्रों में शांति कितनी नाजुक होती है। साथ ही यह भी जरूरी है कि केवल तात्कालिक कारणों ही नहीं, बल्कि गहरे स्तर की समस्याओं को भी समझकर उनका समाधान किया जाए।


(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Divya Bharti
Divya Bharti
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