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क्यों बंगाल BJP के लिए बना हुआ है बड़ी राजनीतिक चुनौती, जानिए- क्या हैं बाधाएँ और कहाँ से निकलेगा जीत का रास्ता

बंगाल में भाजपा की चुनौती केवल सत्ता हासिल करने की नहीं बल्कि अपनी पहचान बनाने की है। जब तक पार्टी 'बाहरी' की छवि से बाहर निकलकर 'बंगाली अस्मिता' के साथ खुद को जोड़ने में सफल नहीं होती, तब तक उसकी चुनावी संभावनाएँ सीमित रहेंगी।

पश्चिम बंगाल की राजनीति केवल चुनावी गणित का खेल नहीं है। यह पहचान, संस्कृति और नेतृत्व की विश्वसनीयता का भी प्रश्न है। हाल ही में प्रकाशित एक विश्लेषण में यह तर्क सामने आता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सबसे बड़ी कमजोरी उसका ‘स्थानीय चेहरा’ न होना है। यह समस्या केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक भी है।

दरअसल, बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ लंबे समय तक वही दल टिके हैं जिनके पास मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व और स्थानीय नैरेटिव रहा है। चाहे कॉन्ग्रेस का शुरुआती दौर हो, वामपंथ का 34 साल का शासन या फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) हर दौर में एक ‘बंगाली चेहरा’ निर्णायक रहा है। इसके उलट, भाजपा अभी तक इस कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाई है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भाजपा की सीमाएँ

भाजपा की जड़ें बंगाल में नई नहीं हैं। इसके पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना स्वयं श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता से की थी। इसके बावजूद, पार्टी को राज्य में प्रभावी शक्ति बनने में सात दशक लग गए। शुरुआती चुनावों में दक्षिणपंथी दलों का वोट प्रतिशत सीमित रहा जबकि कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों ने व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया। 

इसका एक बड़ा कारण यह था कि दक्षिणपंथी राजनीति बंगाल में एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक नैरेटिव विकसित नहीं कर पाई। जबकि वामपंथ ने मजदूर आंदोलनों और भूमि सुधार जैसे मुद्दों पर जनाधार बनाया और कॉन्ग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का लाभ उठाया। 

मोदी फैक्टर की सीमा

भाजपा का उभार 2019 के लोकसभा चुनावों में अचानक तेज हुआ जब पार्टी ने लगभग 40% वोट शेयर हासिल किया। लेकिन यह उभार मुख्यतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर आधारित था न कि राज्य में मजबूत संगठन या स्थानीय नेतृत्व पर। 

यही कारण है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में यह वोट शेयर सत्ता में नहीं बदल सका। भाजपा का पूरा अभियान ‘केंद्रीय नेतृत्व’ पर निर्भर रहा जबकि TMC ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में जमीनी नेटवर्क और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए मजबूत पकड़ बनाए रखी।

‘बाहरी बनाम बंगाली’ की राजनीति

बंगाल की राजनीति में पहचान का सवाल बेहद संवेदनशील है। टीएमसी ने भाजपा को ‘बाहरी’ (bohiragoto) पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने में काफी सफलता हासिल की है। यह नैरेटिव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी गहराई से असर डालता है।

भाजपा द्वारा बार-बार ‘घुसपैठ’ और ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ जैसे मुद्दों पर जोर देने से भी यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं समझती।

इसके विपरीत, बंगाल में मतदाता अक्सर ऐसे नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं जो उनकी भाषा, संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ा हो। यही कारण है कि ममता बनर्जी ने ‘बंगाली अस्मिता’ को एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार बना दिया।

संगठनात्मक कमजोरी

भाजपा की एक बड़ी समस्या उसका कमजोर संगठनात्मक ढाँचा भी है। 2019 के बाद पार्टी ने अपने वोट बैंक को स्थायी समर्थन में बदलने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। शिक्षकों, युवाओं, महिलाओं और सरकारी कर्मचारियों जैसे वर्गों के बीच कोई मजबूत राजनीतिक नेटवर्क नहीं बन पाया। 

इसके अलावा, पार्टी के पास राज्य स्तर पर एकजुट और प्रभावशाली नेतृत्व की भी कमी है। न तो कोई सर्वमान्य चेहरा उभर पाया है, और न ही दूसरी पंक्ति के नेताओं का विकास हुआ है, जो युवा मतदाताओं से जुड़ सकें।

क्या समाधान है?

इस स्थिति से निकलने का एकमात्र रास्ता यही है कि भाजपा बंगाल में एक मजबूत ‘बंगाली चेहरा’ विकसित करे ऐसा नेता जो न केवल राजनीतिक रूप से सक्षम हो बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी राज्य के साथ जुड़ा हो।

यह केवल चुनावी रणनीति का सवाल नहीं है बल्कि पार्टी के दीर्घकालिक अस्तित्व का भी प्रश्न है। यदि भाजपा खुद को ‘राष्ट्रीय पार्टी का स्थानीय संस्करण’ नहीं बल्कि ‘बंगाल की अपनी पार्टी’ के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाती तो उसकी वृद्धि सीमित रह सकती है।

आगे की राह

भाजपा के पास अभी भी अवसर है। राज्य में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक समस्याओं जैसे मुद्दे मौजूद हैं, जिन पर वह राजनीतिक लाभ उठा सकती है। लेकिन इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए स्थानीय नेतृत्व और जमीनी संगठन अनिवार्य है।

यदि पार्टी केवल केंद्रीय नेताओं और राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्भर रहती है, तो वह TMC के मजबूत क्षेत्रीय नैरेटिव को चुनौती नहीं दे पाएगी। लेकिन यदि वह एक विश्वसनीय बंगाली नेतृत्व तैयार कर लेती है तो बंगाल की राजनीति में वास्तविक परिवर्तन संभव है।

निष्कर्ष

बंगाल में भाजपा की चुनौती केवल सत्ता हासिल करने की नहीं बल्कि अपनी पहचान बनाने की है। जब तक पार्टी ‘बाहरी’ की छवि से बाहर निकलकर ‘बंगाली अस्मिता’ के साथ खुद को जोड़ने में सफल नहीं होती, तब तक उसकी चुनावी संभावनाएँ सीमित रहेंगी। एक मजबूत बंगाली चेहरा केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं बल्कि उस राजनीतिक विश्वास का प्रतीक होगा जिसकी बंगाल की जनता तलाश कर रही है।

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Dr. Prosenjit Nath
Dr. Prosenjit Nath
The writer is a technocrat, political analyst, and author. He pens national, geopolitical, and social issues.

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