Saturday, October 31, 2020
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कॉन्ग्रेस का ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’: राजद्रोह और AFSPA जैसे कानूनों में बदलाव देश की अखंडता पर संकट है

इतिहास देखें तो कम्युनिस्ट और माओवादी विचारधारा वाली पार्टियाँ पोटा, अफ्स्पा और UAPA जैसे हर कानून को समाप्त करने की बात समय-समय पर उठाती रही हैं जो देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने में सहायक हैं।

कुछ दिनों पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपना मैनिफेस्टो जारी किया जिसमें कुछ कानूनों में संशोधन करने का वादा किया गया है। कांग्रेस का कहना है कि यदि वह सत्ता में आई तो ‘राजद्रोह’ को परिभाषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (A) को समाप्त कर देगी। इसके पीछे कॉन्ग्रेस पार्टी का तर्क है कि इस धारा का दुरुपयोग होता है। इसके अतिरिक्त चुनावी घोषणापत्र में यह भी लिखा गया कि कॉन्ग्रेस के सत्ता में आते ही सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम (1958)- जिसे सामान्यतः ‘AFSPA’ कहा जाता है- में भी संशोधन किया जाएगा।

दोनों ही कानूनों का प्रयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाता है और इन्हें संशोधित करने अथवा समाप्त करने की बात चुनावी घोषणापत्र में कहना यह दिखाता है कि कश्मीर के आतंकियों और देश में चुनी हुई सरकार से नफरत करने वालों के तुष्टिकरण लिए कॉन्ग्रेस कितनी तत्पर है। हम इतिहास देखें तो कम्युनिस्ट और माओवादी विचारधारा वाली पार्टियाँ भी ऐसे हर कानून को समाप्त करने की बात समय-समय पर उठाती रही हैं जो देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने में सहायक हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी का इतिहास देखें तो 2004 में सत्ता में आते ही इन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण भारत में लागू होने वाले देश के पहले कानून ‘पोटा’ (Prevention of Terrorism Act) को समाप्त कर दिया था जिसका खामियाज़ा देश को आने वाले एक दशक तक भुगतना पड़ा था। आज आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाने वाला एक ही कानून देश में बचा है जिसे Unlawful Activities (Prevention) Act 1967 कहा जाता है। बीते कुछ सालों में UAPA के अंतर्गत पकड़े गए आतंकियों और अर्बन नक्सलियों ने इस कानून के विरुद्ध अभियान चला रखा है।

ध्यान रहे कि आनंद तेलतुंबडे की गिरफ्तारी और जेकेएलएफ पर प्रतिबंध UAPA के अंतर्गत ही संभव हो पाया था। इसीलिए अर्बन नक्सली गुटों ने तुरंत इंडिया सिविल वाच जैसी संस्था पैदा की और सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा जैसों के लिए समर्थन जुटाया। इस समर्थन का उद्देश्य UAPA को ‘draconian’ घोषित कर इसे भी समाप्त करना है। वास्तव में कॉन्ग्रेस और वामपंथी-माओवादी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं जो हर वो कानून समाप्त कर देना चाहते हैं जिससे देश की एकता और अखंडता सुरक्षित रहती है।    

राजद्रोह को परिभाषित करने वाला कानून: IPC सेक्शन 124 (A)

राजद्रोह कानून समाप्त करने या न करने के पीछे ढेरों तर्क दिए जा सकते हैं। सामान्यतः यह समझा जाता है कि आईपीसी 124 (A) के अंतर्गत ‘देशद्रोह’ की परिभाषा बताई गई है लेकिन ऐसा नहीं है। यह कानून विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध शत्रुता उत्पन्न करने के उद्देश्य से दिए गए बयान या अन्य माध्यमों से किए गए ऐसे किसी आचरण पर दंड का प्रावधान स्थापित करता है। इसमें देश से द्रोह नहीं बल्कि विधि द्वारा स्थापित सरकार से द्रोह को परिभाषित किया गया है।

जहाँ एक तरफ यह कानून विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरोध में घृणास्पद अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाता है वहीं दूसरी तरफ संविधान के अनुच्छेद 51A में लिखित मूलभूत दायित्वों की रक्षा भी करता है। संविधान में लिखित मूलभूत दायित्व यह कहते हैं कि प्रत्येक नागरिक को देश की एकता, अखंडता, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं करना चाहिए। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जनादेश और विधि द्वारा स्थापित सरकार भारतीय संविधान के अधीन कार्य करने वाली संस्था है। यह कैसे हो सकता है कि कोई नागरिक संविधान और राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करे लेकिन उसी संविधान द्वारा स्थापित निर्वाचन प्रक्रिया और विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध शत्रुता फैलाने वाला आचरण करे?  

ध्यान देने वाली बात है कि मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए तो हम कोर्ट जा सकते हैं लेकिन कोई नागरिक अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है या नहीं यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। ऐसे में राजद्रोह कानून देश के नागरिकों में एक प्रकार से अनुशासन की भावना जगाता है कि विधि द्वारा स्थापित देश की सरकार की आलोचना करो लेकिन शासन व्यवस्था के प्रति शत्रुता मत पालो। निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा विधिवत चुनी गई सरकार की नीतियाँ गलत हो सकती हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम उसको शत्रु मानकर हथियार उठा लें और क्रांति करने निकल पड़ें।

राजद्रोह कानून वामपंथी माओवादी जैसी रक्तपिपासु विचारधारा से देश को बचाने का कार्य भी करता है क्योंकि इस विचारधारा का बीजमंत्र ही मौजूदा सरकार को उखाड़ फेंकना और समानांतर सरकार चलाना है। देश के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में नक्सलियों की समानांतर सरकारें ही तो चलती रही हैं। नक्सली विधि द्वारा स्थापित भारत सरकार के विरुद्ध घृणा फ़ैलाने का काम कई दशकों से करते रहे हैं इसीलिए आज नक्सलवाद देश की एकता और अखंडता पर संकट बन चुका है। ऐसे में कॉन्ग्रेस का यह आश्वासन देना कि उनके सत्ता में आते ही राजद्रोह कानून समाप्त हो जाएगा, यही दिखाता है कि उनका गठबंधन अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र विरोधी ताकतों से है।

जहाँ तक किसी कानून के दुरुपयोग की बात है तो देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जिसका दुरुपयोग न हुआ हो। कानून का सदुपयोग अथवा दुरुपयोग सरकार की नीयत पर निर्भर करता है। किसी कानून का अस्तित्व देश की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर संभावित संकट की स्थिति पर निर्भर करता है। अभी देश में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई है कि आईपीसी की धारा 124A को समाप्त करने का वादा चुनावी घोषणापत्र में किया जाए।

दूसरी बात यह कि राजद्रोह का कानून अंग्रेज़ों के जमाने का कानून है। यदि कॉन्ग्रेस को इसे हटाना ही था तो स्वतंत्रता के पश्चात 60 वर्ष के शासनकाल में क्यों नहीं हटाया गया? सन 2012 में असीम त्रिवेदी को संविधान पर मूत्र विसर्जन करने वाले कार्टून के लिए राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करने वाली इसी कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार थी। क्या उस समय धारा 124A का दुरुपयोग नहीं हुआ था?  


सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम [AFSPA 1958, 1990]

स्वतंत्र भारत में सशस्त्र सेना (विशेषाधिकार) अधिनियम या ‘अफ्स्पा’ से अधिक विवादास्पद कानून कोई नहीं हुआ। कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र कहता है कि सत्ता में आते ही इसमें भी संशोधन किया जाएगा। अफ्स्पा में संशोधन करने के पीछे जो तर्क दिया गया है उसके शब्दों पर ध्यान देना आवश्यक है। कॉन्ग्रेस ने घोषणापत्र में लिखा है: “Congress promises to amend the Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 in order to strike a balance between the powers of security forces and the human rights of citizens and to remove immunity for enforced disappearance, sexual violence and torture.”

अर्थात कॉन्ग्रेस पार्टी दुनिया के सामने यह मानती है कि कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा लोगों को जबरन गायब करवाया गया और सेना के जवानों द्वारा यौन हिंसा और अत्याचार किया गया। इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या होगी कि भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध जारी प्रोपेगंडा युद्ध का हिस्सा बन चुकी है। इस प्रोपेगंडा युद्ध को समझे बिना कॉन्ग्रेस की कारस्तानी समझना कठिन है। यह सर्वविदित है कि जन्म लेते ही पाकिस्तान ने भारत विरोधी गतिविधियाँ आरंभ कर दी थीं। गत 70 वर्षों में उन गतिविधियों ने एक पैटर्न का रूप लिया।

इस पैटर्न में पहले भारत के साथ प्रत्यक्ष युद्ध (1947, 1965, 1971) किया गया जिसमें असफल होने पर पाकिस्तान ने आतंकवाद रूपी परोक्ष युद्ध लड़ा जो अभी तक जारी है। इसी क्रम में आईएसआई अब भारत के साथ प्रोपेगंडा युद्ध कर रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर पाकिस्तानी हुक्मरान यह कहते हैं कि भारतीय सेना कश्मीर में मानवाधिकार हनन में लिप्त है। भारत में पाकिस्तान समर्थित अर्बन नक्सली नित नए फर्ज़ी उदाहरण सामने लाते हैं और सेना को बदनाम करते हैं। इसी प्रक्रिया में अब कॉन्ग्रेस पार्टी भी सम्मिलित हो चुकी है।  

कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा की पैदाइश अर्बन नक्सलियों द्वारा अफ्स्पा के विरोध में लंबे-लंबे लेक्चर दिए जाते हैं लेकिन इन्हें गिलगित बल्तिस्तान और बलोचिस्तान में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा रोज़ाना किए जा रहे क़त्लेआम पर आँसू बहाने का समय नहीं मिलता। अफ्स्पा के विरोध में यह कहा जाता है कि यह ‘draconian law’ है और सेना इसका दुरुपयोग करती है। यह सही है कि सेना के कुछ अधिकारियों और जवानों द्वारा इसका दुरुपयोग किया गया है, लेकिन यह भी सच है कि उन अधिकारियों और जवानों को सिविल और सैन्य कानून के दायरे में दंड भी मिला है।

अफ्स्पा वास्तव में सन 1958 से 1990 के बीच जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में अलग-अलग समय पर लागू किए गए कानून हैं। सबसे पहले 1958 में यह कानून जवाहरलाल नेहरू पूर्वोत्तर राज्यों के लिए लाए थे क्योंकि वहाँ उग्रवादी गतिविधियाँ जन्म ले रही थीं। बाद में जब जम्मू कश्मीर में आतंकवाद पनपा तो 1990 में वहाँ भी अफ्स्पा लागू किया गया। अफ्स्पा सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों और जवानों को यह विशेषाधिकार देता है कि वे यदि उन्हें उचित लगता है तो वे किसी संदिग्ध व्यक्ति या वाहन की जाँच कर सकते हैं, बिना वारंट गिरफ्तार कर सकते हैं या गोली तक मार सकते हैं।

ऐसे सख्त कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के कारण परिस्थितियाँ विकराल रूप धारण कर चुकी थीं। स्थिति ऐसी थी कि यदि सेना को इतने अधिकार न दिए जाते तो पूर्वोत्तर की सात बहनें भारत का साथ छोड़ चुकी होतीं। जैसे-जैसे परिस्थितियाँ सामान्य हुईं, पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों से यह कानून हटा लिया गया। लेकिन कश्मीर में आज भी हालात युद्ध जैसे ही हैं इसलिए वहाँ अफ्स्पा लागू रहना अनिवार्य है।

ऐसा नहीं है कि भारत अकेला ऐसा देश है जहाँ सेना देश के भीतर छिपे शत्रुओं से लड़ रही है। कनाडा के ओका में 1990 में जब समस्या हुई तब वहाँ की सेना ने विद्रोह को कुचला था। ब्रिटिश सेनाओं ने 1969 से 2007 तक आयरलैंड में विद्रोह को कुचला। सन 1996 में फ़्रांस ने आंतरिक सुरक्षा के लिए ‘ऑपरेशन विजिपायरेट’ के अंतर्गत 2,00,000 सैनिकों की तैनाती की थी। लेकिन भारत में जिन क्षेत्रों में अफ्स्पा लागू है उस ‘कन्फ्लिक्ट ज़ोन’ की प्रकृति को समझने की आवश्यकता है।

जहाँ अफ्स्पा लागू है वहाँ पाकिस्तान समर्थित परोक्ष युद्ध के हालात हैं। हम जम्मू कश्मीर में पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहे हैं इसलिए वहाँ स्थिति संभालने के लिए हमें अफ्स्पा जैसे कानून की आवश्यकता है। भारत ने अफ्स्पा के अंतर्गत सेना को जो विशेषाधिकार दिए हैं वह उन क्षेत्रों में दिए हैं जहाँ वास्तविक शत्रु अपने देश का नागरिक नहीं बल्कि दूसरे देश का मज़हबी घुसपैठिया है। यदि अर्बन नक्सलियों के स्थापित नैरेटिव के अनुसार भारत ‘अपने ही देश के नागरिकों के साथ युद्ध’ कर रहा होता तो अफ्स्पा नक्सल-माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी लागू किया जाता जबकि ऐसा नहीं है।

कॉन्ग्रेस और वामपंथियों को इसका भी उत्तर देने की आवश्यकता है कि यदि अफ्स्पा में संशोधन किया जा सकता है तो अनुच्छेद 370 और 35A में संशोधन क्यों नहीं किया जा सकता जिनके कारण जम्मू कश्मीर राज्य में वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी और वाल्मीकि समुदाय समेत अनेक समुदाय के लोगों के साथ कानूनी रूप से भेदभाव किया जाता है। आज़ादी की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाली कॉन्ग्रेस को यह पता होना चाहिए कि नेहरू के विश्वस्त गोपालस्वामी आयंगर ने संविधान में अनुच्छेद 370 जुड़वाने के पीछे यही कारण बताया था कि जम्मू कश्मीर में युद्ध की स्थिति थी।

अफ्स्पा भी नेहरू 1958 में इसीलिए लाए थे क्योंकि पूर्वोत्तर में युद्ध जैसे हालात थे। ये अलग बात है कि 1990 में नेहरू की ‘कश्मीर गलती’ को सुधारने के लिए अफ्स्पा को जम्मू कश्मीर में भी लागू करना पड़ा। इस दृष्टि से यदि अफ्स्पा संशोधित हो सकता है तो इसका निष्कर्ष यह होगा कि कश्मीर की स्थिति अब बेहतर है। और यदि ऐसा है तो कॉन्ग्रेस को अपने घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 में भी संशोधन करने का वादा करना चाहिए।  

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