Saturday, February 4, 2023
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जमातों के निजी हितों से पैदा हुई कोरोना की दूसरी लहर, हम फिर उसी जगह हैं जहाँ से एक साल पहले चले थे

हम सबने मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा है। उसका नतीजा है कि अब हमें दोबारा कोरोना लहर का सामना करना पड़ रहा है। पूरे मामले में अच्छी बात ये है कि हमारे पास एक बार इस चुनौती को पीछे धकेलने का अनुभव है। कोशिश कीजिए, हम इसे दोबारा हरा सकते हैं!

हाल में एक ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का जुमला खूब चला। ये जुमला क्यों था? क्योंकि इसका इस्तेमाल ही कुछ ऐसे तरीके से हो रहा था। सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट या 4-6 ट्वीट ‘सत्ता से सच पूछना’ तो नहीं हो सकता। उन्हें क्या जरूरत पड़ी है 4-6 ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे की सोशल मीडिया पोस्ट देखने की?

आज ये सभी जानते हैं कि बड़े लोगों का सोशल मीडिया चलाने के लिए एक टीम होती है। मान लीजिए उनके लिए सोशल मीडिया चलाने वालों ने वो ट्वीट, वो पोस्ट या कमेंट देखा भी तो वो मंत्री या नेता को क्यों बताने जाएगा? उसका काम तो सोशल मीडिया पर नेताजी को प्रसिद्ध करना है! अपनी ही नाकामी वह काम और पैसे देने वाले को जाकर बता दे और काम हाथ से जाता रहे?

ये ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ तब होता जब विभागों को चिट्ठी लिखकर, आरटीआई के जरिए उनसे ये पूछा जाता कि जनता को बीमारी और इलाज के लिए जागरूक करने के लिए विभाग ने क्या किया? ये सवाल किसी आईएएस अफसर से होना चाहिए था। पूछा जाना था कि कितने अस्पतालों में नए वेंटिलेटर की सुविधा दी गई?

पूछा जाना था कि इस वेंटिलेटर को लगाने के लिए कितने कर्मचारियों को किसने प्रशिक्षण दिया? बिहार या दिल्ली में भी सवाल ये होना चाहिए था कि कोविड-19 के इलाज के लिए किन-किन इलाकों में कौन से अस्पताल तैयार कर दिए गए हैं? आज की तारीख में कम से कम बिहार में तो ये स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों (एम्स, पीएमसीएच, एनएमसीएच किसी में भी) बेड खाली नहीं हैं।

इसके बाद मरीज और उसके परिजन क्या करेंगे? चूँकि अखबारों में लगातार ये सरकारी प्रचारों के जरिए नहीं बताया जा रहा कि किस अस्पताल में इसके इलाज की व्यवस्था है और कहाँ कितने बेड खाली हैं, इसलिए मरीज और उसके परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहने को मजबूर हैं।

क्यों सरकारों से इतना भी नहीं हो पाया कि लाखों का प्रचार रोज देते रहने के बाद भी कोविड-19 के इलाज के लिए अस्पतालों की एक सूची छपवा देते? वेंटिलेटर लगाने के लिए मिलने वाले प्रशिक्षण की भी वही स्थिति है। नए लोगों को वेंटिलेटर लगाने, आँगनबाड़ी-आशा कर्मचारियों को इस बारे में प्रशिक्षित करने के लिए क्या किया गया है, ये भी पूछा जाना चाहिए।

एक सिद्धांत अक्सर ‘अवतारवाद’ का भी सुनाई देता है। इसमें माना जाता है कि बहुसंख्यक भारतीय अपनी समस्याओं के लिए किसी अवतार के आने और समस्या सुलझा देने का इंतजार करते हैं। शायद विदेशों के कोई ‘सुपरमैन’ आएगा वाली सोच से ये जन्मा होगा। यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था राज्य सरकार के हाथ में होती है।

उनसे कड़े सवाल पूछने के बदले लोग इंतजार कर रहे हैं कि कोई मोदी आएगा और जादू की छड़ी घुमा कर सब ठीक कर देगा? पिछले वर्ष जब इसी दौर में लॉकडाउन लगा था तो इससे अर्थव्यवस्था चौपट हो गई का शोर मचाने जो लोग आए थे वो सब इस स्थिति के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। आज जब दिल्ली के व्यावसायिक संगठन खुद ही बाजार बंद कर रहे हैं, उस समय उनकी बातें भी तो याद आएँगी ही!

चाहें या ना चाहें, ये स्वीकारना होगा कि इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब अक्टूबर-नवंबर के दौरान बिहार में चुनाव करवाए जा रहे थे। उस वक्त तेजस्वी यादव की रैलियों में भीड़ दिख रही थी और ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ वालों ने भीड़, मास्क की अवहेलना, आपसी दूरी जैसे नियमों से आँखें मूँद ली थीं। इन चुनावों में चुनाव आयोग ने वर्चुअल रैलियों की बात भी की थी। उस समय इस पर फैसला लेने के लिए बैठक हुई थी

इस बैठक में कॉन्ग्रेस, राजद, सीपीआई (एमएल), आरएलएसपी, सीपीआई, सीपीआई (एम) के नेता मौजूद थे। उन्होंने इस कदम का पूरा विरोध किया था। उस वक्त तक कोरोना का कहर भी केंद्र सरकार के क़दमों से नियंत्रण में आने लगा था। ऊपर से तेजस्वी जीतते दिख रहे थे तो वर्चुअल रैलियों के बदले भीड़ लगाने की छूट मिली।

शायद लोगों को लगा था कि कोरोना का खतरा टल गया। बीमारियों से बचने के लिए खुद स्वच्छता रखनी होती है, परहेज कोई और नहीं कर देगा, ये बातें लोग भूल गए थे। फिर ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ जमातों के अपने निजी हित तो सधते ही थे! नतीजा ये हुआ कि एक के बाद एक चुनाव घोषित होते रहे और हम एक गोल चक्कर लगाने के बाद फिर से उसी जगह पर हैं, जहाँ से हम एक साल पहले चले थे। बल्कि पिछले वर्ष तक तो मौतों की खबर कहीं दूर-दराज से अख़बार-समाचार के जरिए आती थी। इस वर्ष तो वो रिश्तेदारों-दोस्तों के फ़ोन से आने लगी है। पिछले वर्ष से भी बुरी स्थिति से निपटने के लिए पहले से ज्यादा सख्त कदम तो उठाने ही होंगे।

महामारी या आपदा की स्थिति में सरकार या किसी और की सहायता कब आएगी, इसका बैठकर इंतजार तो नहीं किया जा सकता। हमारे हाथ में खुद के ऊपर प्रतिबन्ध लगाना तो है ही। अगर बहुत जरूरी ना हो तो घरों से ना निकलें। एक वर्ष में ज़ूम, गूगल मीट, जैसे दर्जनों ऐसे सॉफ्टवेयर हैं, जो मीटिंग को डिजिटल-वर्चुअल तरीके से निपटा सकते हैं।

उनका इस्तेमाल अधिकांश बड़ी निजी कंपनियाँ पहले से ही कर रही हैं। स्थानीय दुकानदारों को भी कोऑपरेटिव की तरह साथ मिलकर होम डिलीवरी जैसी व्यवस्थाएँ तैयार करनी होंगी। फिल्म थिएटर को खोला जाना एक मूर्खतापूर्ण फैसला था। ऐसी गैरजरूरी चीज़ों को फ़ौरन फिर से बंद किया ही जाना चाहिए।

विवाह जैसे आयोजनों में भीड़ की इजाजत ना होने के कारण शादियों और ऐसे दूसरे आयोजनों में दिखावे के लिए फिजूलखर्ची भी कम हो गई थी। थोड़ी ढील मिलते ही उसमें वही सब शुरू हो गया- ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाना, सजावट से लेकर खाने की बर्बादी तक में फिजूलखर्ची।

जब कोरोना संक्रमण के फैलने के खतरों को देखते हुए कुंभ जैसे आयोजनों को साधु ही प्रतीकात्मक कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केरल ने ‘थ्रिस्सुर पूरम’ मनाए जाने की इजाजत दे दी है। ये तब है जब केरल में टेस्ट के पॉजिटिव निकलने की दर 17% पर पहुँची हुई है। मगर फिर वहाँ तो एक सेक्युलर सरकार है, तो ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का नियम वहाँ लागू नहीं होगा।

पूरे मामले को निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो बस एक बात नजर आती है। भारत में तंत्र कुछ इस तरह से चलता है, जिसमें अधिकार तो किन्हीं अधिकारियों के पास होते हैं, लेकिन जवाबदेही किसी के सर नहीं होती। हम सबने मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा है। उसका नतीजा है कि अब हमें दोबारा कोरोना लहर का सामना करना पड़ रहा है। पूरे मामले में अच्छी बात ये है कि हमारे पास एक बार इस चुनौती को पीछे धकेलने का अनुभव है। कोशिश कीजिए, हम इसे दोबारा हरा सकते हैं!

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Anand Kumar
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