प्रिय मीडिया गिरोह, हर दलित जीतेन्द्र की मौत जातिवाद के कारण नहीं होती

जिस तरह से उत्तराखंड के एक 'दलित' की मृत्यु पर, कनेक्टिकट में रहने वाली एंथ्रोपोलॉजिस्ट से लेकर बनारस में घूमने वाले पत्रकार तक, बिना वहाँ की सामाजिक स्थिति को जाने जातिवाद की बात कर रहे हैं, ये पत्रकारिता का दुर्भाग्य है।

हाल ही में उत्तराखंड से के एक जनजातीय क्षेत्र से आई एक खबर ने देशभर में दलित-सवर्ण के मुद्दे को नई चिंगारी देने का काम किया। यदि मीडिया में बैठे गिद्द-गिरोह के शब्दों में कहें तो इस घटना ने दलित-सवर्ण मुद्दे को एक दिशा देने का काम किया। इस सारे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात ये देखने को मिली, कि जो भी मीडिया गिरोह इस खबर को, जिस लिबास में बेचकर अपनी विकृत मानसिकता को बेच सकता था, उसने वही किया। जौनसार-जौनपुर क्षेत्र में ‘जौनपुर में एक दलित युवक की पिटाई’ के नाम से खबर पढ़ते ही मैं शंका से इस मामले को देखता रहा और हुआ भी यही। जिस प्रकार देशभर के तमाम प्रमुख मीडिया चैनल्स से लेकर, निष्पक्ष पत्रकारों और हिटलर के लिंग नापने वाले मीडिया गिरोह के पत्थरकारों ने बिना ‘दलित’ शब्द के नहीं पढ़ाया या सुनवाया, एक बार के लिए मैं भी इस प्रकरण को संदेह की दृष्टि से देखने को मजबूर हो गया।

मीडिया के गिद्ध-गिरोहों को ‘दलित’ की मृत्यु से फ़र्क़ पड़ता है?

निस्संदेह, टिहरी जिले के जौनपुर-जौनसार जैसे जनजातीय क्षेत्र में घटी यह घटना हैरान करने वाली है। हैरान इसलिए, क्योंकि मैं इसी जगह में पला-बढ़ा हूँ और इस समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु को ‘दलित की मृत्यु’ बताना सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी। हालाँकि, किसी व्यक्ति की मृत्यु को कोई भी तर्क सही साबित नहीं करता है। लेकिन, जब इस सम्पूर्ण प्रकरण को एक ‘दलित’ की मृत्यु में समेट दिया गया, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम इस बात की समीक्षा करें।

यह समीक्षा खासकर मीडिया में हर वक़्त इस प्रकार की घटनाओं के इन्तजार में लार टपकाने वाले उस गिद्ध-गिरोह के कारण आवश्यक हो जाती है, जो दलित की मृत्यु में ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे विशेषणों के साथ अपनी पूर्वग्रही मानसिकता के कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करता है। ब्राह्मण और हिन्दू जैसे शब्दों से भी घृणा करने वाले कुछ लोग जब कुछ विकृत मानसिकता के लोगों को अपना हथियार बनाकर, एक युवक की मृत्यु पर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे कैप्शन बेचते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि वो पूरे देश भर में अपनी घृणित मानसिकता से निकलने वाले टार की मार्केटिंग में जुटे हुए हैं।

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कुछ इसी प्रकार का उदाहरण मीडिया के इस समुदाय विशेष ने तब दिया था, जब पुलवामा आतंकी घटना के बाद JNU की  फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद के जरिए देहरादून में बैठे प्रेमनगर के जंगलों में छुपकर हर नशा करने वाले, जिहाद पढ़ने वाले, आतंकवादियों का समर्थन करने और दंगाई मानसिकता वाले कश्मीरी, कथित विद्यार्थियों के बारे में पेश किया था। यह गिरोह है, जो बस इस इन्तजार में रहता है कि आखिर कब मौका मिले और कब वो अपनी विषैली मानसिकता का बीजारोपण वहाँ पर कर सकें।

हिंसात्मक मानसिकता का शिकार सवर्ण और दलित कोई भी हो सकता है

यह भी जानना आवश्यक है कि इस घटना में जीतेन्द्र की जाति को दलित बताकर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे प्रसंग चलाने वाले वही लोग हैं, जो आज तक आतंकवाद का मजहब पता लगा पाने में नाकाम रहे हैं। यह सही भी है, यदि हर दूसरी आतंकवादी घटना का मजहब ढूँढा जाने लगे और घटना की संगीनता से ज्यादा हमारी चिंता का विषय धर्म-जाति और सम्प्रदाय ही बन जाए, तो ऐसे में श्री लंका में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के पीछे तो स्पष्ट रूप से मुस्लिम संगठन का हाथ है और न्यूजीलैंड में मस्जिद में मारे गए मुसलमानों के पीछे एक क्रिश्चियन का हाथ है। लेकिन, हम सभी जानते हैं कि आतंकवाद का मजहब तलाशने से ज्यादा जरूरी उस मानसिकता द्वारा हुई हानि को कवर करना है। ठीक इसी प्रकार, यदि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, तो फिर एक शादी समारोह के दौरान हिंसात्मक मानसिकता से उपजे विवाद में किसी ‘दलित’ की मृत्यु कैसे हो जाती है?

अमेरिका में बैठकर जनजातीय समाज पर चिंतन से बेहतर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है

शादी में जिस जीतेन्द्र के साथ मारपीट हुई, वह दलित था या नहीं से पहले उन लोगों पर विचार किया जाना चाहिए, जिन्होंने उन्माद में एक व्यक्ति को पीट दिया और उसने अवसाद में घर जाकर मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगल ली थीं, जिस कारण उसे अगली सुबह अस्पताल ले जाना पड़ा। लेकिन क्या गिद्ध मीडिया के अमेरिका के कनेक्टिकट के न्यू हेवन में बैठी, येल में पीएचडी कर रही सामाजिक विचारक को यह पता है कि जिस घटना को वो एक AC कमरे में बैठकर सिर्फ अपने संगठन की विचारधारा को  खुश करने के लिए ‘देवभूमि में दलित की मृत्यु’ मात्र में समेट रही हैं, उस समाज में तो दलित-सवर्ण-अगड़ा-पिछड़ा जैसे शब्द महत्वहीन हैं?

लेकिन यह आम चलन है कि अपना कोई विदेशी सम्बन्ध बताकर भारत जैसे देश में अपने पाठकों और सम्पादकों की बौद्धिक क्षमता को चकमा देते हुए आसानी से अपनी विश्वसनीयता साबित की जाए। फिर चाहे वह अमेरिका में बैठा EVM एक्सपर्ट सैयद शूजा हो, या फिर NDTV द्वारा जर्मनी से उठाकर लाए गए प्रॉपेगैंडा पत्रकार ध्रुव राठी हो।

जौनपुर-जौनसार में नहीं है जातिगत भेदभाव

जनजातीय इलाका होने के कारण, जौनपुर-जौनसार में जातिगत भेदभाव मामूली स्तर पे भी नहीं है। यदि सामान्य शब्दों में कहूँ तो लोग आपस में एकदूसरे को खुलकर औजी-ओड-भामण-खस कहकर बुलाते हैं। यदि किसी खेत में बैल चोरी करने घुस जाए तो पूरा गाँव एक स्वर में आवाज लगाकर बुलाता है कि फलां खेत में ‘ल्वार-ओड-भामण’ की गाय-बैल घुस गई है। यहाँ के लोग वर्षों अशिक्षित जरूर रहे, नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव गाँधी के ऐतिहासिक नेतृत्व के समय भी। लेकिन, यहाँ पर सभी सामाजिक समीकरणों और जिम्मेदारियों से बँधे हुए जाति व्यवस्था को निभाते आए हैं। और किसी का, कभी भी इस आधार पर दमन या शोषण नहीं किया गया। ब्राह्मण-राजपूत-दलित, सभी यहाँ पर ‘जिमदार’ यानी भूमि के स्वामी हैं। ‘डोम’ यदि गाँव के लोगों की कृषि और पशुधन को संभालता है, तो औजी के बिना कोई भी पारम्परिक अनुष्ठान और कार्यक्रम संभव ही नहीं है, बदले में सारे गाँव के लोग उसे हर माह अनाज से लेकर, कपड़े, जमीन और धन देते हैं।

बढ़ई का काम करने वाले ‘ओड’, मकान बनाने से लेकर मिस्त्री कामों में पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को सिखाते आए हैं। यह भी बताना जरूरी है कि इस इलाके में घरों की नक्काशी और लकड़ी का काम बेहद उम्दा किस्म का है। लोहार से लेकर तमाम अन्य जातियाँ, अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए रहते हैं। यह तालमेल भी मैंने शायद ही कहीं देखा होगा कि जितनी जमीन एक दलित परिवार के पास है, लगभग उतनी ही ब्राह्मण और राजपूतों के पास भी हैं। आर्थिक असमानता इस इलाके में नगण्य है।

जनजातीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ पर बिना नारीवाद और प्रगतिशील होने का आडंबर किए ही, हर किसी को बराबर अधिकार और सम्मान प्राप्त हैं। यहाँ तक कि जौनपुर-जौनसार में पारिवारिक व्यवस्था मातृसत्तात्मक ही है। सभी जातियाँ एक ही गाँव में रहती हैं, सभी के मकान एक-दुसरे से चिपककर बसे हुए हैं। बिना किसी भेदभाव के लोग एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते हैं। और शादी-विवाह और अन्य समारोह में भी सभी जातियाँ एक ही लंगर में खाना खाने बैठा करती हैं। ऐसे में इस बात की विश्वसनीयता स्वतः शून्य हो जाती है कि बसाण-गों में किसी युवक को उसकी जाति की वजह से मार दिया गया। लेकिन, आदत से मजबूर मीडिया गिरोहों के गिद्धप्रमुखों ने अपनी मक्कारी को खूब बेचा है। अब इनके निशाने पर उत्तराखंड भी है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगलने के कारण हुआ था जीतेन्द्र बेहोश

स्थानीय लोगों का कहना है कि जीतेन्द्र मिर्गी का मरीज था और लम्बे समय से दवाएँ ले रहा था। शादी के दौरान खाने के वक़्त हुई झड़प के बाद जीतेन्द्र ने अवसाद में घर जाकर सभी दवाएँ एकसाथ निगल ली जिस कारण सुबह उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। हालाँकि,अभी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स का आना बाकी है। सामाजिक समारोह में इस प्रकार की झड़प और हिंसा जौनपुर-जौनसार में आम बात है और यही वजह है कि समय-समय पर यहाँ पर 10-15 गाँव मिलकर शादी-विवाह में शराब और DJ को प्रतिबंधित करते आए हैं लेकिन ऐसे में किसी व्यक्ति की मृत्यु होना बेहद चौंकाने वाला प्रकरण है।

यह दुर्भाग्य है कि इस घटना में जिस जीतेन्द्र की मृत्यु हुई वह दलित था और मीडिया ने इसे ही मुद्दा बनाकर उत्तराखंड के सर पर जातिवाद जैसे शब्द स्थापित करने के हर सम्भव प्रयास कर रही है। यह मैं अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहना चाहूँगा की यह घटना हिंसात्मक है, सामजिक उन्माद का उदाहरण है लेकिन इसकी वजह यदि मीडिया आपको पीड़ित की जाति दलित होना बता रही है, तो आपको आज ही उनसे किनारा कर लेना चाहिए क्योंकि वो उस विष को बेच रहे हैं, जिसे शायद आप पढ़ना चाहते हैं।

निष्पक्ष मीडिया के पत्थरकारों से सावधान

इस समय के महान निष्पक्ष पत्रकार रविश कुमार पांडेय जी अपने हालिया प्राइम टाइम के प्रेम्बल में कलेजे पर चोट खाए आशिक़ की भाँति उत्तराखंड में हुई जातिगत हत्या पर बोले। लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि रवीश बाबू बनारस में चुनाव कवर करने गए थे। प्राथमिकताओं का अंदाजा और विमर्श का केंद्र इसी एक हरकत से समझा जा सकता है कि किस तरह ‘डर का माहौल’ का राग अलाप उत्तराखंड में बची खुची, रही सही शांति के भी भंग करने का प्रोपगंडा चलाया जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें, तो यह वही उत्तराखंड है, जो लोकपाल को सबसे पहले लागू करता है, कन्या धन योजना और ऐसे ही न जाने कितनी चीजों को सबसे आगे रखता है। इसी उत्तराखंड से सबसे ज्यादा प्रतिभाएँ संगीत और कला से लेकर तमाम अन्य क्षेत्रों में खूब नाम कमा रही हैं और यह बताना भी जरूरी हो जाता है कि उनमें से अधिकांश दलित ही हैं।

ये उसी देवभूमि की बात है, जिसमें धर्म-सम्प्रदाय, जाति आज भी चुनाव का मुद्दा नहीं हैं। यदि समकालीन परिदृश्य में ही बात करें तो वो सभी मुद्दे, जिन पर अन्य राज्यों में राजनीतिक दल हमेशा से ही हार-जीत के समीकरण का जायजा करती है, इस उत्तराखंड राज्य से नदारद मिलती है।

सवर्ण, अगड़ा, पिछड़ा या फिर दलितों के विषय पर ही आ जाएँ,  तो उत्तराखंड के हर पारम्परिक अनुष्ठान, छोटे-बड़े कार्यों, जागर (जगार) में भी ऐसा व्यक्ति जो कागजों और गिद्ध मीडिया  की नजर में ‘दलित’ है, उसके बिना कोई मंगलकार्य पूरा नहीं होता है। मात्र रस्मी तौर पर ही नहीं, अपितु पूर्ण भागीदारी के साथ उसका होना अनिवार्य होता है।

शादी समारोह के दौरान घटित हुई इस घटना में धूर्तता के साथ ‘देवभूमि’ शब्द जोड़ने वाले दी लल्लनटॉप जैसे निकृष्ट मीडिया गिरोहों को लार टपकाने से पहले यह बात मालूम होनी चाहिए कि भले ही वो सम-विषम नारी किस्म के पत्थरकारों से जितना भी उन्माद मचवाने की कोशिश कर लें, लेकिन इस राज्य की संरचना को वो और उनके सहयोगी पत्थरकार कोई हानि नहीं पहुँचा सकते हैं।

लार टपकाती मीडिया के ‘पत्थरकारों’ के उदाहरण इन तस्वीर में आप देख सकते हैं


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