ना केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे दक्षिण में बीजेपी के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल के. अन्नामलाई ने पार्टी छोड़ दी है। अन्नामलाई ने ‘वी द लीडर्स’ नाम से अपनी पार्टी का गठन किया है और वो अब तमिलनाडु में जन आंदोलन करेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। अन्नामलाई के जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तैरने लगी है कि बीजेपी बीच सफर में अपने नेताओं या अपने सहयोगियों को छोड़ देती हैं।
हालाँकि, इस बात में कितनी सच्चाई है ये हम इस लेख में जानेंगे। पहली शुरुआत BJP और अन्नामलाई से ही करते हैं। चाहते तो अन्नामलाई तमिलनाडु में बैठ इस्तीफा दे देते लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बीजेपी ने उन्हें साथ रखने की लगातार कोशिशें कीं, पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे बातचीत की उनकी शिकायतों को समझा और साथ देने की भी बात कही। लेकिन बात नहीं बनी और इसमें अन्नामलाई की भी अपनी वजह रही होंगी।
वो बीजेपी ही थी जिसने अन्नामलाई को तमिलनाडु में पार्टी का नेतृत्व करने का मौका दिया और पूरी ताकत उनके पीछे लगा दी। सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता जिस अपनेपन के साथ अन्नामलाई को संबोधित करते उससे साफ नजर आता था कि वो अन्नामलाई में एक भविष्य का नेता देखते हैं लेकिन ये साथ लंबा नहीं चला तो इसके लिए बीजेपी ही जिम्मेदार नहीं।
यह आरोप कि बीजेपी अपने सहयोगियों को खत्म कर देती है, उन्हें धीरे-धीरे कमजोर कर देती है और अंततः उनकी राजनीतिक जमीन अपने कब्जे में ले लेती है। यह आरोप इतना दोहराया गया है कि कई लोगों ने इसे लगभग सत्य मान लिया। लेकिन क्या वास्तव में तस्वीर इतनी सीधी है? क्या हर राज्य में BJP ने अपने सहयोगियों को किनारे लगाया या कई मामलों में उसने राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व, सम्मान और जगह दी?
अगर भारतीय राजनीति को सिर्फ आरोपों से नहीं बल्कि उदाहरणों और घटनाओं के क्रम से समझा जाए, तो एक दूसरा पक्ष भी साफ दिखाई देता है कि BJP की गठबंधन राजनीति का एक बड़ा आधार सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति रही है। यह रणनीति हमेशा सफल रही हो, ऐसा नहीं है। मतभेद भी हुए, रिश्ते टूटे भी लेकिन यह कहना कि BJP का स्वभाव ही सहयोगियों को खत्म करना है, तथ्यों के सामने अधूरा तर्क नजर आता है।
सबसे पहले बिहार को देखिए। नीतीश कुमार की जेडीयू और BJP के बीच लंबे समय से संबंध है। नीतीश लंबे वक्त तक बीजेपी के साथ राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2020 विधानसभा चुनाव में BJP ने 74 सीटें जीतीं जबकि जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। BJP स्पष्ट रूप से बड़ी पार्टी बन चुकी थी। सामान्य राजनीतिक गणित कहता कि मुख्यमंत्री BJP का होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बने। BJP ने अपने बड़े जनादेश के बावजूद गठबंधन धर्म को प्राथमिकता दी और सहयोगी दल के नेता को शीर्ष पद पर बनाए रखा। यह कोई छोटी राजनीतिक घटना नहीं थी। भारतीय राजनीति में सत्ता अक्सर संख्या के हिसाब से चलती है लेकिन यहाँ BJP ने संख्या से ऊपर गठबंधन को रखा।
बाद में 2022 में जेडीयू ने खुद NDA छोड़ा और महागठबंधन में चली गई यानी रिश्ता टूटने की शुरुआत BJP की ओर से नहीं हुई। अब दोनों दल साथ हैं और जेडीयू का राजनीतिक स्पेस आज भी उनता ही मजबूत है।
बिहार की बात सिर्फ जेडीयू तक सीमित नहीं है। भाजपा ने जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को लगातार राजनीतिक स्पेस दिया। मुकेश सहनी की VIP पार्टी को भी गठबंधन में जगह दी गई, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) लगातार NDA में है और राजनीतिक महत्व बना हुआ है।
ये वे दल थे जिनकी अपनी सीटें सीमित थीं लेकिन BJP ने उन्हें राजनीतिक प्रासंगिकता दी। अगर उद्देश्य केवल सहयोगियों को खत्म करना होता, तो छोटे दलों को सीटें देकर अपने वोट बैंक का हिस्सा साझा करने की मजबूरी BJP क्यों स्वीकार करती?
महाराष्ट्र का उदाहरण भी कम दिलचस्प नहीं है। भाजपा और शिवसेना का रिश्ता कोई 5-10 साल का नहीं था बल्कि यह लगभग तीन दशक तक चला। 1980 के दशक के अंत से दोनों दल साथ आए और महाराष्ट्र की राजनीति में एक वैचारिक साझेदारी बनी।
2019 विधानसभा चुनाव में दोनों ने साथ चुनाव लड़ा और बहुमत हासिल किया। भाजपा 105 सीटों पर और शिवसेना 56 सीटों पर जीती। लेकिन सरकार गठन के समय मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ और उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाने का फैसला किया। यहाँ भी यह गठबंधन तोड़ने की पहल भाजपा की तरफ से नहीं की गई थी।
हाँ, बाद के वर्षों में शिवसेना में विभाजन हुआ और एकनाथ शिंदे गुट भाजपा के साथ आया। आलोचक इसे भाजपा की रणनीति कह सकते हैं लेकिन उतना ही बड़ा तथ्य यह भी है कि भाजपा चाहती तो मुख्यमंत्री पद अपने पास रख सकती थी, फिर भी शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया गया। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद सहयोगी चेहरे को आगे रखना भाजपा की गठबंधन शैली का हिस्सा था।
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल भाजपा का सबसे पुराना सहयोगी था। दोनों का रिश्ता दो दशक से अधिक समय तक चला। कृषि कानूनों के मुद्दे पर मतभेद बढ़े और 2020 में अकाली दल ने एनडीए छोड़ने का फैसला किया। यह अलग बात है कि किसान आंदोलन के दबाव और पंजाब की राजनीति ने अकाली दल को यह निर्णय लेने पर मजबूर किया, लेकिन तथ्य यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा अकाली दल की ओर से हुई थी। भाजपा ने अपने सबसे पुराने सहयोगी को बाहर नहीं किया बल्कि सहयोगी ने खुद रास्ता अलग चुना।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति को देखें तो यहाँ भी सहयोगियों को साथ रखने का एक मॉडल दिखता है। अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल हों या निषाद पार्टी के संजय निषाद दोनों दलों को भाजपा ने केवल चुनावी समय की जरूरत नहीं माना।
मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया, सीटों में भागीदारी दी गई और सामाजिक समीकरणों में उन्हें जगह मिली। भाजपा समझती रही कि उत्तर प्रदेश जैसी विशाल राजनीति केवल अकेले नहीं लड़ी जा सकती, सामाजिक आधार का विस्तार सहयोगियों के साथ ही संभव है।
पूर्वोत्तर में भाजपा की गठबंधन नीति शायद सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। नागालैंड में भाजपा ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के साथ चुनाव लड़ा और क्षेत्रीय नेतृत्व को स्वीकार किया। असम में असम गण परिषद (AGP) को साथ रखा गया।
मेघालय और मणिपुर में भी क्षेत्रीय दलों के साथ साझा सत्ता मॉडल अपनाया गया। भाजपा चाहती तो अपनी राष्ट्रीय ताकत के आधार पर ‘बड़े भाई’ की राजनीति कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर में उसने स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ समन्वय का रास्ता चुना। यही कारण है कि एनडीए का विस्तार पूर्वोत्तर में सबसे तेज हुआ।
आंध्र प्रदेश इसका नया उदाहरण है। 2024 के बाद जब चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी एनडीए के लिए अहम सहयोगी बनकर उभरी, तब भाजपा ने न केवल उन्हें महत्व दिया बल्कि गठबंधन को स्थिर बनाए रखने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत के समीकरण में सहयोगियों की अहमियत को भाजपा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। यह वही राजनीति है जिसमें ‘एकला चलो’ के बजाय ‘साथ लेकर चलो’ का संकेत दिखता है।
दिलचस्प बात यह है कि भाजपा पर सबसे ज्यादा आरोप वही लोग लगाते हैं जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन राजनीति को भूल जाते हैं, इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े हैं। हाल ही में तमिलनाडु में भी ऐसा ही दिखा। कॉन्ग्रेस वर्षों तक DMK के साथ रही लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलते ही रिश्तों में दूर बढ़। कॉन्ग्रेस ने DMK की पीठ में छुरा घोंप दिया और विजय की TVK के साथ हाथ मिला लिया।
यह भी सच है कि गठबंधन राजनीति हमेशा बराबरी का रिश्ता नहीं होती। बड़ी पार्टी स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली होती है। भाजपा भी अपवाद नहीं। कई सहयोगी कमजोर भी पड़े, कुछ दलों का जनाधार भाजपा के विस्तार से प्रभावित भी हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भाजपा की ‘साजिश’ थी या भारतीय राजनीति का स्वाभाविक परिणाम।
इतना जरूर दिखता है कि भाजपा ने कई बार राजनीतिक लाभ की स्थिति में होते हुए भी सहयोगियों को नेतृत्व दिया, मुख्यमंत्री पद छोड़ा, सीटें साझा कीं और छोटे दलों को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दी। बिहार में नीतीश कुमार, महाराष्ट्र में शिंदे, उत्तर प्रदेश में अपना दल और निषाद पार्टी और भी तमाम उदाहरण केवल संयोग नहीं लगते।
इसलिए जब यह कहा जाता है कि भाजपा सहयोगियों को ‘खा जाती’ है, तब शायद यह भी पूछना चाहिए कि अगर ऐसा ही होता तो इतने क्षेत्रीय दल बार-बार उसके साथ क्यों लौटते?


