Saturday, October 31, 2020
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के के मुहम्मद को पद्मश्री: अयोध्या के गुनहगारों के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा

तथाकथित विख्यात इतिहासकारों के ज़रिये ऐसा नैरेटिव जानबूझकर गढ़ा गया था ताकि समुदाय विशेष की भावनाएँ आहत हों और हिंसात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। इस षड्यंत्र की पोल खोलती है पुरातत्वविद के के मुहम्मद की पुस्तक 'मैं हूँ भारतीय'।

अयोध्या केवल कुछ एकड़ ज़मीन के मालिकाना हक़ का मसला नहीं है। यह हज़ारों वर्षों से चली आ रही शाश्वत सनातनी परंपरा पर कुठाराघात का सोचा समझा षड्यंत्र था। श्रीराम केवल एक अवतारी देवता ही नहीं बल्कि भारत के लोक में रचे-बसे एक ऐसे तंत्र के संवाहक हैं जिसका शास्त्र पुस्तकीय कम लौकिक अधिक है। विश्वभर में बने अनगिनत राम मंदिर इसी लोकशास्त्र की भक्तिमय परिकल्पना को साकार करते हैं जो प्रभु को मूर्तरूप में निहारना और पूजना चाहती है।

प्रश्न किया जाता है कि जब देशभर में इतने राम मंदिर हैं तब अयोध्या के लिए ही लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है। हालाँकि यह प्रश्न पूछने वालों में इतनी हिम्मत नहीं कि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड से यही सवाल कर सकें। बहरहाल, यह लोकाचार ही है कि आज भी किसी से भेंट होने पर पूछा जाता है कि रहने वाले कहाँ के हो। मूल निवास पूछने पर उस व्यक्ति का चाल, चरित्र, आचार, विचार सब पता चल जाता है।

मूलनिवास या जन्मस्थान किसी व्यक्ति का आत्मीय गौरव होता है क्योंकि उससे उसकी पहचान जुड़ी होती है। हज़ारों वर्षों तक मध्य भारत के वनवासियों ने अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी थी क्योंकि वह उनकी मातृभूमि थी। इसके उल्लेख मिलते हैं कि मौर्यकाल में भी राजा उन वनवासियों की भूमि पर ज़बरन कब्जा नहीं करता था।  

अयोध्या भी भगवान रामलला विराजमान की मातृभूमि है और उसपर ज़बरन हक जताने का अधिकार किसी को नहीं था। लेकिन मीर बकी ने रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़ा और उस पर एक ऐसा ढाँचा खड़ा किया जिसके कारण सदियों तक रामलला को अपमान सहना पड़ा। इतिहास में यह पहला केस है जहाँ भगवान को अपनी जन्मभूमि वापस लेने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

यह लड़ाई केवल क़ानूनी लड़ाई नहीं है, यह नैरेटिव बिल्डिंग की लड़ाई है। सही को गलत साबित करने वालों के विरुद्ध खड़े हुए सही को सही कहने वालों की लड़ाई है। अयोध्या को कम्युनल विवाद बताना एक समुदाय विशेष को सनातनी परंपराओं के विरुद्ध भड़काने का षड्यंत्र था जिसके दोषी तथाकथित विख्यात इतिहासकार थे।

उनके ज़रिये ऐसा नैरेटिव जानबूझकर गढ़ा गया था ताकि समुदाय विशेष की भावनाएँ आहत हों और हिंसात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो। इस षड्यंत्र की पोल खोलती है पुरातत्वविद के के मुहम्मद की पुस्तक “मैं हूँ भारतीय”।

के के मुहम्मद ने अपनी पुस्तक में जिस साफ़गोई से बातें कहीं हैं उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। मुहम्मद ने मिथ्या अवधारणा निर्मित करने में वामपंथी इतिहासकारों के साथ मीडिया के एक वर्ग की मिलीभगत को भी रेखांकित किया है। उस समय मुहम्मद प्रोफेसर बी बी लाल के नेतृत्व में अयोध्या में उत्खनन टीम के सदस्य थे।

उन्होंने लिखा है कि 1992 में विवादित ढाँचा गिराए जाने से पहले सन 1976-77 में उन्होंने अयोध्या में उत्खनन के दौरान विवादित ढाँचे की दीवारों में मंदिर के स्तंभ देखे थे। उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थर से हुआ था और उनके निचले भाग में 11वीं-12वीं शताब्दी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। ज्ञातव्य है कि मंदिर निर्माण कला में पूर्ण कलश आठ ऐश्वर्य चिन्हों में से एक होते हैं।

विवादित ढाँचा गिराए जाने से पूर्व ऐसे एक-दो नहीं बल्कि 14 स्तंभों को के के मुहम्मद की टीम ने प्रत्यक्ष देखा था। जिन पत्थरों से इन स्तंभों का निर्माण किया गया था उसी प्रकार के स्तंभ और उसके नीचे के भाग में ईंट का चबूतरा विवादित ढाँचे की बगल में और पीछे के भाग में उत्खनन करने से प्राप्त हुआ था। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर मुहम्मद ने दिसंबर 15, 1990 को यह बयान दिया था कि विवादित ढाँचे के नीचे कभी मंदिर था।

के के मुहम्मद लिखते हैं कि उस समय कुछ मुस्लिम नरमवादी विवादित ढाँचा हिन्दुओं को देकर समस्या का समाधान निकालना चाहते थे परंतु इसे खुलकर कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी। कोढ़ में खाज तब उत्पन्न हुआ जब उग्रपंथी मुस्लिम गुट की सहायता करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने कथित ‘बाबरी मस्जिद’ के ऊपर दावा न छोड़ने का उपदेश दिया। मुहम्मद ने बड़ी बेबाकी उन इतिहासकारों का नाम भी लिया है जिन्होंने अयोध्या को ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ मत का केंद्र साबित करने का प्रयास किया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रोमिला थापर और बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने ‘रामायण’ के ऐतिहासिक तथ्यों पर सवाल खड़े कर दिए और झूठ बोला कि 19वीं शताब्दी के पहले मंदिर तोड़ने के प्रमाण नहीं हैं। आर एस शर्मा, अनवर अली, द्विजेन्द्र नारायण झा और इरफ़ान हबीब जैसे इतिहासकारों ने इस षड्यंत्र में उनका साथ दिया।

मजे की बात यह कि इस मंडली में केवल सूरजभान ही पुरातत्वविद थे बाकी सब प्रोफेसर इतिहासकार थे। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि इतिहासकार अपना अधिकतर मत शोध प्रबंधों और पुस्तकों के आधार पर प्रकट करता है उसे फील्ड में जाकर उत्खनन करने का प्रशिक्षण नहीं मिलता। इसलिए उत्खनन से मिलने वाले साक्ष्यों पर एक इतिहासकार के मत से अधिक प्रामाणिक पुरातत्वविद का मत समझा जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त अकादमिक जगत के व्यक्ति को एक विशेषज्ञ के रूप में अपना मत प्रकट करते हुए निष्पक्ष होकर सच्चाई का साथ देना चाहिए। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने मजहबी उन्माद को बढ़ावा देने का काम किया। अयोध्या मसले पर उन्होंने न्यायालय तक में झूठ बोला था। आर एस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञों के रूप में काम किया था।  

के के मुहम्मद लिखते हैं कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष इरफ़ान हबीब की अध्यक्षता में हुई थीं। बाबरी कमेटी की बैठक ICHR के कार्यालय में होने का विरोध भी किया गया था लेकिन इरफ़ान हबीब नहीं माने। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्धिजीवियों को अपने उदार विचार छोड़ने की प्रेरणा दी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने वामपंथियों के लेख धड़ल्ले से छापे जिसके कारण बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी को संबल मिला।

इसी कारण विवादित ढाँचे को हिन्दुओं को देकर समस्या के समाधान के लिए सोच रहे साधारण मुस्लिमों की सोच में परिवर्तन हुआ और उन्होंने विवादित ढाँचा हिन्दुओं को न देने की दिशा में सोचना प्रारंभ कर दिया। मुहम्मद के अनुसार पंथनिरपेक्ष होकर समस्या को देखने की अपेक्षा वामपंथियों की बाईं आँख से अयोध्या मसले का विश्लेषण करके टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने बड़ा अपराध किया।

मुहम्मद द्वारा लिखे इस विवरण से पता चलता है कि पढ़े लिखे अकादमिक और पत्रकारिता जगत के मध्य गठजोड़ हो जाए तो वे किस प्रकार ‘फॉल्स नैरेटिव’ गढ़कर देश के दो समुदायों के बीच तनाव पैदा कर सकते हैं। विवादित ढाँचा गिराए जाने के बाद प्राप्त हुए पुरातत्व अवशेषों में से एक है विष्णु हरिशिला पटल।

इसमें 11वीं-12वीं शताब्दी की नागरी लिपि में संस्कृत में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और रावण को मारने वाले विष्णु को समर्पित किया जाता है। ध्यान रहे कि श्रीराम विष्णु के अवतार हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि वह मंदिर श्रीराम का ही था जो बाबर के सिपहसालार मीर बकी ने तोड़ा था।

वर्ष 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के निर्देशानुसार किए गए उत्खनन में मंदिर के 50 स्तंभों के नीचे के भाग में ईंट से बना चबूतरा मिला था। उत्तर प्रदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक डॉ राकेश तिवारी द्वारा समर्पित रिपोर्ट में बताया गया है कि विवादित ढाँचे के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े हुए 263 पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए थे। के के मुहम्मद हमें यह भी बताते हैं कि उत्खनन को निष्पक्ष रखने के लिए कुल 137 श्रमिकों में से 52 मुस्लिम समुदाय से लिए गए थे।

इतनी निष्पक्ष जाँच को मज़हबी रंग देने का काम वामपंथी इतिहासकारों ने किया था। उत्खनन में प्राप्त साक्ष्यों और उच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद वामपंथियों ने अपना सुर आजतक नहीं बदला। वे आज भी अयोध्या में रामजन्मभूमि पर अनर्गल प्रलाप करते हुए कट्टर मज़हबी ताकतों को बल प्रदान करते रहते हैं। विगत 26 वर्षों में इनका बनाया फॉल्स नैरेटिव अब पाठ्यपुस्तकों और कोर्स में दाख़िल हो चुका है।

रामजन्मभूमि मसले को राजनीतिशास्त्र की पुस्तकों में एक ‘सांप्रदायिक’ मामला लिखा जाता है। सरकारी अधिकारियों से लेकर रणनीतिक चिंतक तक समाज के प्रत्येक बुद्धिजीवी वर्ग ने भगवान राम के नाम को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भारत के वामपंथी इतिहासकारों का यह नैरेटिव नोम चोम्स्की द्वारा प्रतिपादित ‘मैन्युफैक्चरिंग कन्सेंट’ के विचार का एक क्लासिक केस है। दुखद बात यह है अभी तक हम इस नैरेटिव के ख़तरे से अनभिज्ञ हैं।

बहरहाल, के के मुहम्मद को पद्म सम्मान मिलने से इस नैरेटिव में परिवर्तन की आशा जगी है। मुहम्मद को पद्म श्री अलंकरण दिए जाने से वामपंथी गिरोह के मुँहपर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा गया है।        

डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख में दी गई सभी सूचनाएँ श्री के के मुहम्मद की पुस्तक ‘मैं हूँ भारतीय’ से ली गई हैं।

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