Monday, July 6, 2020
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मीडिया गिरोह केजरीवाल के बाद अब ‘लाल सलाम’ के साथ खेलना चाहता है ‘पुण्डा-पुण्डी’

शेहला और स्वरा के अलावा जिग्नेश मेवानी और AAP के प्रोपगैंडाबाज इंटरनेट ट्रॉल ध्रुव राठी को भी जर्मनी से उठाकर बेगूसराय की जमीनी हकीकत जाँचने और समझने के लिए उतरा गया है। अर्बन नक्सल का ये साथ और किसी को पसंद हो, ना हो लेकिन पत्रकारिता के समुदाय विशेष को ये साथ खूब पसंद है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

राजनीति के डाकू खड़गसिंह, यानी अरविन्द केजरीवाल का प्रकरण अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुआ है कि भारतीय मीडिया गिरोह ने अपना दूसरा झुनझुना तलाशना शुरू कर दिया है। मीडिया गिरोह द्वारा हाल ही में गोद लिए गए इस नवीनतम झुनझुने का नाम है, कामरेड कन्हैया कुमार! JNU के इस ‘चर्चित’ नाम के ही कारण ‘बिहार की औद्योगिक राजधानी’, ‘दिनकर की धरती’, ‘पूरब का लेनिनग्राद’, जैसे नामों के बीच एक बार फिर बेगूसराय में ‘लाल झंडे’, ‘अर्बन नक्सल’ और ‘वामपंथ’ जैसे शब्दों पर चर्चा हो रही है।

अभी बहुत समय नहीं हुआ है, जब देश के कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक माने जाने वाले JNU में देशविरोधी नारे लगाए जाने के बाद कन्हैया कुमार और उनके छुटभईये साथी गुर्गे उमर खालिद राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिए गए। चर्चा में रहने के शौकीनों का पत्रकारिता में बैठे, ‘नई छत’ तलाशने वाले लोगों को बेसब्री से इंतज़ार होता है।

‘आत्ममुग्ध बौने’ को भी लिया था मीडिया गिरोह ने ‘गोद’

राजनीति और समसामयिकी में रूचि रखने वाले देश के युवाओं को अच्छे से याद है कि उनके साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ करने वाले आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल किस तरह से सोशल मीडिया द्वारा रातों-रात हीरो बना दिए गए थे। ‘आत्ममुग्ध बौने’ के नाम से जाने जाने वाले धूर्त अरविन्द केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस के विरोध में बने माहौल का फायदा उठाकर लोगों की भावनाओं को पहले विश्वास में लिया, अपने आंदोलन को ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नाम दिया और ऐन समय पर कॉन्ग्रेस के साथ ही सत्ता का जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई। आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही शीला दीक्षित द्वारा किए गए भ्रष्टाचारों वाली 365 पन्नों की फ़ाइल अचानक से मुद्दों से गायब हो गई।

नई वाली राजनीति के नाम पर और IIT डिग्री का झाँसा देकर अरविन्द केजरीवाल ने उस युवा को निशाना बनाया, जो वाकई में केजरीवाल से राजनीती में एक ऐतिहासिक बदलाव की उम्मीद लगा बैठा था। लेकिन IRS, IIT जैसे नामों को भुनाने के बाद अरविन्द केजरीवाल ने ये साबित कर दिया कि डिग्री इंसान के अंदर बैठी मक्कारी को रिप्लेस नहीं कर पाती है। यही वजह है कि एक ‘चायवाला चौकीदार’ देश का प्रधान सेवक बन जाता है और एक IIT से पढ़ा हुआ आदमी आत्ममुग्ध बौने में तब्दील होकर रह जाता है। ‘बड़ी यूनिवर्सिटी’ से ग्रेजुएट होना पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह और IIT से पढ़े हुए अरविंद केजरीवाल से पहले इतनी बड़ी ‘गाली’ कभी नहीं हुआ करती थी।

हालाँकि, जल्दी ही अरविंद केजरीवाल ने जनता का यह सपना भी तोड़ दिया। सत्ता मिलते ही कमाल रशीद खान से पहले ही हर शुक्रवार को फिल्मों के रिव्यु देकर केजरीवाल ने राजनीति की नई परिभाषा गढ़नी शुरू कर दी। अब चूँकि केजरीवाल अच्छे से समझ चुके थे कि इस देश की मीडिया के भीतर किसी व्यक्ति विशेष से घृणा में किसी भी राह चलते आदमी को हीरो बना देने की व्याकुलता है, इसलिए केजरीवाल ने चर्चा में बने रहने का हर संभव षड्यंत्र रचा।

मीडिया गिरोह के कुलपतियों ने केजरीवाल को विशेष संरक्षण दिया। इंसान से लेकर जानवरों तक की जाति में रूचि रखने वाले एक ‘निष्पक्ष’ पत्रकार ने केजरीवाल द्वारा खुद को बनिया बताने के बावजूद भी अपनी गोद में बिठाकर खूब दूध पिलाया। उसी निष्पक्ष पत्रकार ने केजरीवाल के लिए इंदिरा गाँधी की कार का चालान काट देने वाली पूर्व IPS अधिकारी का पीछा कर ये साबित करने का भरसक प्रयास किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की कार का चालान काटना कोई बड़ी बात नहीं थी।

संयोग की बात है कि ये वही पत्रकार है जिसे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बस एक नजर और अटेंशन का उसी तरह इन्तजार रहता है, जिस तरह एक 18 साल के प्रेम में डूबे एक युवा को प्रेमिका की बस एक नजर का इन्तजार रहता है। लेकिन, जब लाख कोशिशों के बावजूद भी प्रेमिका उसे घास नहीं डालती, तो प्रेमी अपने हाथ की नस काटने तक को तैयार हो जाता है।

कामरेड कन्हैया कुमार में मीडिया ने तलाश लिया नया ‘तैमूर’

अरविन्द केजरीवाल और प्रियंका गाँधी से एकतरफा मोहब्बत में धोखा खाने के बाद इस मीडिया गिरोह को अब बेताबी से किसी नए झुनझुने की तलाश थी। JNU जैसे संस्थान से निकले माओवंशी कामपंथियों से बढ़िया विकल्प और क्या हो सकता था?

पटियाला हाउस कोर्ट में जमकर कूटे जाने के बाद कामरेड कन्हैया कुमार का मीडिया में बने रहने का ‘पोटेंशियल’ मीडिया गिरोह ने तुरंत भाँप लिया था। इसके बाद अब तमाम छोटी-बड़ी टुकड़ियाँ कन्हैया कुमार के लिए दरबार सजाने में व्यस्त दिखाई देने लगी हैं।

बेगूसराय से भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह के खिलाफ कामरेड कन्हैया ने टिकट लिया और अपनी गरीबी के सिलेंडर को कैमरा के सामने लाकर जमकर बेच रहा है। कन्हैया कुमार के LPG सिलेंडर दिखाकर मीडिया गिरोह की TRP में भी उछाल आने के कारण कामरेड की गरीबी पर निष्पक्ष पत्रकारों को खूब चरमसुख मिलता नजर आ रहा है। लेकिन अचानक ‘वन फाइन डे’ इस LPG सिलेंडर न जुटा पाने वाले कामरेड की तस्वीरों से बेगूसराय के लगभग हर हिंदी और अंग्रेजी समाचार पत्र के पहले पन्ने भर गए।

वामपंथ के टार और मीडिया गिरोह की मक्कारी के मिश्रण से ही यह चमत्कार सम्भव हो पाता है कि एक शाम LPG सिलेंडर के लिए मशक्कत करता हुआ युवा अगली सुबह हर महँगे-सस्ते, हिंदी-अंग्रेजी अखबार का पहला पन्ना बन जाता है।

चंदा-परस्त वामपंथ

देखा जाए तो अरविन्द केजरीवाल और कन्हैया कुमार में सबसे बड़ी समानता है ‘चंदा’। अगर अरविन्द केजरीवाल राजनीति के चंदा मामा हैं तो कन्हैया कुमार राजनीति के चंदा-युवा बन गए हैं। इसी चंदे से केजरीवाल की गरीबी और आम आदमी की ‘आदमियत’ बेची गई और इसी गरीबी से कन्हैया कुमार की फिजा बनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं।

‘चंदा-भक्षी’ शेहला रशीद हैं समर्थन में

इस ‘चंदा-धंधा’ प्रकरण में सबसे मजेदार बात यह है कि कन्हैया कुमार का समर्थन करते हुए चंदे की माँग करने वाली शेहला रशीद भी उनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी है। शेहला रशीद की चंदा डकार जाने की अनोखी प्रतिभा देखकर ही उन्हें दोबारा चंदे के धंधे की बागडोर सौंपी गई है। ये वही शेहला रशीद है, जिन पर कठुआ रेप पीड़ितों के परिवार को न्याय दिलाने के नाम पर चंदा इकठ्ठा करने और चुपचाप डकार जाने का आरोप है।

40.63 लाख रुपए इकट्ठा होने की जानकारी शेहला रशिद ने ट्वीट कर खुद बताई थी। जब पीड़ित परिवार ने चंदा इकट्ठा करने वाली शेहला रशिद से उस फंड का विवरण माँगा तो अब वह दाएँ-बाएँ देखने लगी थी। पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया था कि शेहला रशीद द्वारा इकट्ठा किए गए चंदे में से उन्हें एक रुपए तक की मदद नहीं मिली। इस मामले में केस लड़ने के लिए उन्हें अपने जीवन यापन का आधार अपने पशु भी बेचने पड़े हैं। लेकिन, मृतक मासूम बेटी को न्याय दिलाने के नाम पर उगाहे गए चंदे के पैसे आखिर हैं कहाँ? क्या अंतर्ध्यान हो गए, ये आज तक एक पहेली ही है।

कामरेड कन्हैया कुमार की दूसरी साथी हैं फिल्म एक्ट्रेस स्वरा भास्कर! जो अपनी फिल्म में खुलकर अपने ‘मन की बात’ करने के लिए फेमस हैं। यानी, कुल मिलाकर राम मिलाए जोड़ी, एक सिल्ला एक लोढ़ी।

शेहला और स्वरा के अलावा जिग्नेश मेवानी और AAP के प्रोपगैंडाबाज इंटरनेट ट्रॉल ध्रुव राठी को भी जर्मनी से उठाकर बेगूसराय की जमीनी हकीकत जाँचने और समझने के लिए उतरा गया है। अर्बन नक्सल का ये साथ और किसी को पसंद हो, ना हो लेकिन पत्रकारिता के समुदाय विशेष को ये साथ खूब पसंद है। हैरानी की बात है कि JNU में रहते हुए जो शेहला रशीद और कन्हैया कुमार कम्युनिस्ट हुआ करते थे, वो राजनीति में आते ही मुस्लिम और भूमिहार हो गए। जितनी तेजी से इन्होने रंग बदला है उस हिसाब से अरविन्द केजरीवाल कहीं भी नहीं ठहरते हैं।    

धीरे-धीरे बेगूसराय में ‘लाल आतंक’ अपना रंग दिखाने लगा है। कुछ दिन पहले ही कन्हैया कुमार की कम्युनिस्ट पार्टी के गुंडों ने स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किए जाने पर उन्हें उनके घरों में घुसकर मारा। इसके बदले में देखने को मिला कि कुछ लोगों ने कन्हैया कुमार पर हाथ साफ कर दिए और चुनाव प्रचार के दौरान उनको कूट दिया गया। यानी अर्बन नक्सल अपने पहले चरण में लगभग कामयाब होते नजर आ रहे हैं।

केजरीवाल के डसे हुए पत्रकारिता के कुछ स्थापित मीडिया गिरोह अभी भी कमर कस के कामरेड कन्हैया कुमार की जमकर लहर बना रहे हैं। BBC ने जरा ‘हट के’ इस अर्बन नक्सल के लाडले कामरेड को लेकर अभियान चलाते हुए  ‘कन्हैया के प्रचार में दिन-रात लगी लड़कियां क्या कहती हैं’ जैसे लेख चलाए हैं।

‘निष्पक्षता’ की परिभाषा गढ़ने वाले और रोजाना अपनी मायूस शक्ल लेकर टीवी पर आकर लोगों से टीवी ना देखने की अपील करने वाले एक पत्रकार ने कन्हैया कुमार की गरीबी में घुसकर उनसे एक ऐतिहासिक सवाल पूछ डाला। ये ऐसा सवाल था जो कामरेड कन्हैया कुमार के संसद पहुँचने से पहले समाज और राजनीति को लेकर उनके उनके विजन और दर्शन को जानने में सबसे ज्यादा सहायता करने वाला था। ये सवाल था, “कन्हैया कुमार शादी कब करेंगे?”

यही पत्रकार वो महान पत्रकार हैं, जिन्हें इस बात का गम सुबह-शाम सताए जा रहा है कि आखिर नरेंद्र मोदी उन्हें क्यों नहीं इंटरव्यू देते? लेकिन नरेंद्र मोदी तो शादीशुदा हैं, उनसे शादी कब कर रहे हैं जैसी सवाल पूछने का कोई महत्त्व नहीं है, फिर भी इस पत्रकार के अंदर एक गहरी लालसा प्रतिदिन उनके स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसी वजह से आजकल स्वास्थ्य लाभ के लिए वो अपने प्राइम टाइम में आम भी खाते नजर आ रहे हैं।

खैर, लोकसभा चुनाव जारी हैं और मीडिया का ये लेटेस्ट झुनझुना यानी कामरेड कन्हैया कुमार का राजनीतिक भविष्य भी दाँव पर लगा है। मीडिया द्वारा तैयार किए जाने वाले ये चेहरे चर्चा में आते हैं, उससे दोगुने स्ट्राइक रेट से ये जमीन में धूल खाते नजर आते हैं।

केजरीवाल अभी भी चर्चा में हैं, लेकिन अब ख़बरों का ‘हिसाब‘ किताब बदल चुका है।  अब केजरीवाल की खबरें देखने और सुनने को मिलती हैं कि उनका उन्हीं के विधायकों ने मार-मार के मोर बना दिया है। तो कभी अरविन्द केजरीवाल कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन की भीख माँगने और गिड़गिड़ाने की ख़बरों की वजह से सनसनी बन जाते हैं।

अब यही अध्याय शायद एक बार फिर दोहराया जाना बाकी है। कामरेड कन्हैया अगर सभी को गलत साबित करते हुए आगे बढ़ते हैं, तो ये राजनीति में युवाओं के आगमन के लिए एक अच्छा संकेत साबित होगा। लेकिन, अगर वो भी अरविन्द केजरीवाल वर्जन-2.0 निकलते हैं, तो एक बार फिर हर मायने में मीडिया से लेकर तमाम समर्थकों के साथ खुला धोखा होना तय है। केजरीवाल का डसा हुआ ये आदतन लतखोर मीडिया अगर इस बार ‘लाल सलाम’ से दोबारा डसा जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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