Thursday, October 22, 2020
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चुंबन दिवस विशेष: राफ़ेल ने कहा राहुल से ‘ज़हर है कि प्यार है तेरा चुम्मा’

राहुल गाँधी ने जिस राफ़ेल को इतनी शिद्दत से चूमा था, उसे मोदी ने इतना ठंढा कर दिया है कि उनके होंठ चिपक गए हैं, और वो अगर वहाँ से खींचना चाहें तो चेहरा लहुलुहान हो जाएगा।

आज कैग रिपोर्ट भी आ गई, बताया कि राफ़ेल विमान मोदी सरकार ने मनमोहन काल से 2.86% सस्ते में लिया है। ये डील सस्ती कैसे हुई, उसके सारे कारण आप यहाँ पढ़ सकते हैं। लेकिन गुणियों में श्रेष्ठ, घोटालों को सूँघकर जान लेने वाले, घोटालों की गोद में पल कर बड़े हुए राहुल गाँधी ने एक लाइन में नकार दिया है इस रिपोर्ट को।

‘मेरे पास कोई सबूत नहीं है, लेकिन मैं जानता हूँ कि मोदी चोर है’ जैसे कालजयी संवादों के जन्मदाता राहुल गाँधी ने ज़माने को दिखा दिया है कि अगर आप प्रेम करते हैं किसी से तो उसे पागलपन की हद तक चाहना पड़ता है। राफ़ेल राहुल की वही प्रेमिका है, जिसके बारे में व्यंग्यकार नीरज बधवार जी ने लिखा है कि ‘राफ़ेल मामला राहुल गाँधी के लिए उस रिश्ते की तरह है, जिसमें वो इतना इन्वेस्ट कर चुके हैं कि धोखा मिलने के बाद भी, उससे बाहर आने को तैयार नहीं।’

इसी आर्टिकल का वीडियो यहाँ देखें

ये बात बिलकुल सही है। हर जिले में प्रेस कॉन्फ़्रेंस से लेकर, हर शाम काग़ज़ के टुकड़े दिखा कर केजरीवाल ब्रांड के ‘सबूत’ लहराने वाले राहुल गाँधी ने जिस राफ़ेल को इतनी शिद्दत से चूमा था, उसे मोदी ने इतना ठंढा कर दिया है कि उनके होंठ चिपक गए हैं, और वो अगर वहाँ से खींचना चाहें तो चेहरा लहुलुहान हो जाएगा। 

राहुल गाँधी और पत्रकारिता के समुदाय विशेष गिरोह के तथाकथित पत्रकारों ने पहले ही साल से ये लाइन पकड़ रखी थी कि सरकार है तो घोटाले भी होंगे ही। वो लोग धैर्य के साथ आगे बढ़ रहे थे, कि अब होगा घोटाला, तब होगा घोटाला। घोटाला नहीं हुआ। फिर लांछन लगाने में गिरोह सक्रिय हुआ। गडकरी को घेरा, अमित शाह को घेरा, अजित डोभाल को घेरा, लेकिन हर बार मामला फुस्स हो गया। 

फिर नई योजना बनी कि गडकरी को प्रधानमंत्री के लिए प्रमोट किया जाए, उनके बयान को काट-छाँट कर दिखाया गया। दरार पैदा हुई नहीं, गडकरी ने दो लाइन में खंडन किया और फ्लायओवर बनाने लगे। 

अब कुछ नहीं रह गया, तो फिर गोएबल्स को याद कर भाजपा को घेरने वाले गोएबल्स से सीख लेकर राफ़ेल मुद्दे को पीटना शुरु किया कि ये एक पब्लिक डिबेट का मामला बन जाए। मामला बन भी गया। लगातार, हर दूसरे दिन ‘मैं नहीं मानता’, ‘चौकीदार चोर है’, ‘सब को मैनेज किया हुआ है’, ‘कैग पर दबाव है’ आदि कह-कह कर एक नॉनइशू को इशू बनाया गया। 

मुद्दा बना और लोग इस पर बातें करने लगे कि कोई इतनी बार एक ही बात क्यों बोल रहा है, इस पर सरकार कुछ बोलती क्यों नहीं? सरकार ने बताना शुरु किया तो तर्क आया कि जाँच होनी चाहिए। जाँच भी सुप्रीम कोर्ट या सीबीआई से नहीं, ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी से जिसमें कॉन्ग्रेस के भी लोग हैं। यानी, निष्पक्ष जाँच नहीं, बल्कि जहाँ उनके नेता फ़ैसले पर प्रभाव बना सकें, रिपोर्ट लीक कर सकें, ऐसी जाँच।

इसमें एक बात यह भी है कि दो देशों के साथ हुए रक्षा समझौतों पर, जिसमें गोपनीय तकनीक आदि का इस्तेमाल हो रहा हो, उसे पब्लिक डोमेन में नहीं लाया जा सकता है। इससे दो देशों के संबंध खराब होते हैं, और देश की छवि धूमिल होने से आगे से कोई भी देश आपको इस तरह के समझौतों में शामिल करने से हिचकिचाता है। 

ऐसा नहीं है कि इस बात को राहुल गाँधी या उनकी पार्टी के लोग नहीं जानते। इसके उलट, बात यह है कि वो जानते हैं, ऐसा नहीं हो सकता इसीलिए इस बात पर अटके हुए हैं क्योंकि आम जनता को ये बातें समझानी मुश्किल है। आम जनता का तर्क यही होता है कि ‘जाँच करा लो, क्या दिक्कत है?’ फिर, पत्रकारों के गिरोह, जो अच्छे से जानते हैं कि क्या हो सकता है, क्या नहीं, वो भी इसी लाइन पर कहने लगते हैं, “नहीं, क्या समस्या है जाँच कराने में? एक बार सरकार करा क्यों नहीं लेती?”

ये पूरा गिरोह एक वेल-ऑयल्ड मशीन की तरह काम करता है। अंधेरा होते ही एक सियार ‘हुआँ’ करता है, तो बाकी भी करने लगते हैं। लोकसभा में चर्चा हो गई, सवालों का जवाब दे दिया गया, सुप्रीम कोर्ट ने संतुष्टि जता दी, बिंदुवार आँकड़े दे दिए गए, कैग की रिपोर्ट आ गई, लेकिन राहुल का लिप-लॉक टूट ही नहीं रहा! 

मीडिया के समुदाय विशेष की असहनीय पीड़ा तो देखिए कि बेचारों की मति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि ‘मेरे पास कोई सबूत नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ मोदी चोर है’ जैसे कुतर्कों को सुनने के बाद भी एक मतछिन्नू आदमी के पीछे खड़ा है। ये बात अपने आप में विचित्र है कि ऐसी बहकी-बहकी बातें करने वाले कुलदीपक को हवाओं से बचाने में लगे पड़े हैं। आज कल इसी को निष्पक्ष पत्रकारिता भी कहा जाता है। 

कैग की रिपोर्ट में हर बिंदु पर बताया गया है कि किस हिस्से में सरकार ने ज़्यादा पैसे दिए, किस हिस्से में कम, और कुल मिलाकर डील सस्ती ही मिली। अब, कल कॉन्ग्रेस द्वारा कैग को ही ख़ारिज किए जाने के बाद, राहुल आज मोदी को घेर रहे हैं कि उसने कहा था कि नौ प्रतिशत सस्ता है, ये तो कम ही सस्ता हुआ है। मतलब, मोदी ने किस आधार पर इसे सस्ता कहा था, उसका ज़िक्र नहीं। 

और तो और, अब मुद्दा यह नहीं है कि राफ़ेल में घोटाला हुआ है, बल्कि यह है कि मोदी ने जितना पैसा बताया था, उतना तो नहीं बचा है! अब कैग की रिपोर्ट की वो लाइन उठकर नृत्य चालू आहे! जबकि उसी कैग की रिपोर्ट में यह अच्छे से समझाया गया है कि नौ प्रतिशत वाली बात किस संदर्भ में कही गई थी। 

हाल ही में, पता चला कि रक्षा सौदों का दलाल क्रिश्चियन मिशेल जो कि कॉन्ग्रेस के ही समय हुए अगस्टा वैस्टलैंड घोटाले में अभियुक्त है, वो राफ़ेल डील रोकने को लिए उसके प्रतिस्पर्धी यूरोफाइटर के लिए लॉबी कर रहा था। अब राहुल जी अपनी पार्टी की गंदगी पर मिट्टी डालने के लिए राफ़ेल को अपनी प्रेमिका बनाकर उसके गीतों को नहीं गाएँगे तो और क्या करेंगे?

अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद से लेकर सत्ता पाने की हर संभव कोशिश करने में जी-जान से जुटा गिरोह राफ़ेल को पीट-पीट कर चपटा करने के बाद, उसे पिघला कर तार बना चुका है, लेकिन मिलावट के कण मिले नहीं। हाँ, अब ये जंजाल इतना बड़ा बन चुका है कि कॉन्ग्रेस इससे बाहर आना ही नहीं चाहती। अब यही एक सहारा है जिससे मोदी को चोर और भ्रष्ट साबित किया जा सके।

वैलेंटाइन सप्ताह चल रहा है और, राहुल गाँधी की बातों को भी गंभीरता से लेने लायक बनाने वाले राफ़ेल को राहुल गाँधी ऐसे समय में छोड़ दें, यह संभव नहीं दिखता। अभी तो फ़िज़ाओं में प्रेम है, और आनेवाले समय में राजनीति होगी। राहुल जी दोनों ही विषयों में, एक ही प्रेमिका के साथ उतरना चाह रहे हैं, लेकिन बेवफ़ा राफ़ेल बिदक कर भाग जाती है। 

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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