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RSS पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ‘फैंटेसी कहानी’, भारत को चलाने वाली ‘सीक्रेट सोसायटी’ बताया: बौद्धिक दिवालियापन है नाजी टैग से डर फैलाने की वामपंथी मीडिया की कोशिश

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के पीछे एक छिपा हुआ डर दिखता है। RSS ने बिना विदेशी फंडिंग, बिना अभिजात (एलीट) वर्ग की मंजूरी और बिना पश्चिमी उदारवाद के अनुरुप बने, पीढ़ियों तक चलने वाली संस्थाएँ खड़ी की हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा संगठन नहीं कर पाया।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 26 दिसंबर को ‘From the Shadows to Power: How the Hindu Right Reshaped India’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख को मुजीब मशाल और हरि कुमार ने लिखा है। यह लेख सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना भर नहीं है बल्कि समाज के लिए काम कर रहे देश के सबसे बड़े हिंदू संगठन को बदनाम करने की साजिश है।

लेख में एक तरह की वैचारिक कहानी गढ़ी गई है जिसमें RSS को एक रहस्यमय, बेहद ताकतवर और तथाकथित ‘फार-राइट’ गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है। लेख का पूरा चित्रण ऐसा है मानो RSS भारत का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ हो, जो पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित कर रहा हो। अगर इस लेख या फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य लेफ्ट-लिबरल मीडिया संस्थानों में छपने वाले ऐसे ही दूसरे लेखों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा बताया जाता है कि RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और चुपचाप देश के पंथनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर किया जा रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

मसला यह नहीं है कि न्यूयॉर्क टाइम्स या कोई अन्य मीडिया संस्थान RSS की आलोचना करता है। भारत में काम करने वाले और देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले संगठनों पर सवाल उठाना उनका अधिकार है। असली समस्या यह है कि यह आलोचना किस तरह की जा रही है।

इन लेखों में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद पूर्वाग्रह से भरी हुई है। इतिहास को चुनिंदा तरीके से पेश किया गया है और ठोस सबूतों की जगह इशारों और आरोपों ने ले ली है। इन लेखों की सामग्री एक जानी-पहचानी लेफ्ट-लिबरल सोच को सामने लाती है।

यह वही सोच है, जिसमें हिंदुओं के संगठित होने को ही अपने आप में खतरनाक बताया जाता है। ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है मानो धार्मिक नारे लगाते हुए हिंदू ही खुद को और देश की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहे हों।

‘फार-राइट’ शब्द का इस्तेमाल, समझाने के लिए नहीं बल्कि ठप्पा लगाने के लिए

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में बार-बार RSS को ‘फार-राइट हिंदू राष्ट्रवादी संगठन’ बताया गया है। यह शब्द सीधे तौर पर पश्चिमी राजनीति की शब्दावली से लिया गया है और बिना किसी भारतीय संदर्भ के इस्तेमाल किया गया है। भारत और पश्चिमी देशों में ‘फार-राइट’ की अवधारणा पूरी तरह अलग है।

भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो बीते 100 वर्षों से सामाजिक जीवन में काम कर रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

इसके बावजूद लेख में ‘फार-राइट’ शब्द को किसी विश्लेषण की श्रेणी के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय निष्कर्ष या एजेंडे की तरह इस्तेमाल किया गया है। जैसे ही पश्चिमी संदर्भ वाला ‘फार-राइट’ का ठप्पा किसी भारतीय संगठन पर लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उनसे जुड़ने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। इसके बाद जन-आंदोलन से लेकर वैचारिक प्रभाव तक हर चीज को अपने आप ‘उग्रवाद’ के रूप में पेश किया जाने लगता है।

‘नाजी’ शब्द बोले बिना नाजी जैसा चित्रण

न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में सीधे तौर पर ‘नाजी’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। न ही RSS की तुलना खुलकर हिटलर या थर्ड राइख से की गई है। यह जानबूझकर किया गया है। इसकी जगह लेख इशारों और जोड़-तोड़ के सहारे पाठकों को एक तय नतीजे तक पहुँचाने की कोशिश करता है। इसके लिए बार-बार फासीवादी दौर की तस्वीरों और संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है।

लेख में कहा गया है कि RSS के शुरुआती नेताओं ने 1930 और 1940 के दशक में यूरोप की फासीवादी पार्टियों के राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरणा ली थी। साथ ही एमएस गोलवलकर के लेखन का जिक्र करते हुए उसे हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए व्यवहार से जोड़ा गया है। इन ऐतिहासिक संदर्भों की पड़ताल नहीं की गई बल्कि इन्हें इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि आज के RSS को यूरोपीय फासीवाद के नैतिक बोझ से जोड़ दिया जाए।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

पूरे लेख में इस्तेमाल की गई भाषा भी इसी धारणा को मजबूत करती है। ‘शैडोई कबाल’ (गुप्त साजिश करने वाला गुट), ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’ (श्रेष्ठता), ‘संस्थाओं में घुसपैठ’ जैसे शब्द वही हैं जिन्हें पश्चिमी मीडिया आमतौर पर तानाशाही आंदोलनों के लिए इस्तेमाल करता है।

सीधे आरोप लगाए बिना लेकिन फासीवादी संकेतों से पूरी कहानी भरकर लेख एक तरह का शक पैदा करता है। इस तरीके से लेख लिखने वालों को यह कहने की गुंजाइश मिल जाती है कि उन्होंने कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जबकि असल उद्देश्य पूरा हो जाता है। नतीजतन, हिंदुओं के सामाजिक संगठन को ही अपने आप में खतरनाक दिखाने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक संगठन से ‘गुप्त संस्था’ तक का गढ़ा गया सफर

RSS से जुड़े नेता जब राजनीति में आते हैं, तो वे सार्वजनिक मंचों से भाषण देते हैं और अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं। RSS से जुड़े लोग खुले तौर पर स्थानीय बैठकों का आयोजन करते हैं और मोहल्लों के पार्कों में रोज शाखाएँ लगाते हैं। यह कोई छुपी हुई गतिविधि नहीं है। इन शाखाओं में कोई भी व्यक्ति आ सकता है, चाहे वह संगठन का सदस्य हो या नहीं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स RSS को बार-बार ‘शेडो’ और ‘सीक्रेट’ संगठन बताता है। लेख में संगठन को निष्पक्ष रूप से देखने या कोई अलग नजरिया रखने की कोशिश नहीं की गई। लेख में दिखाई गई तस्वीर और RSS की वास्तविक स्थिति के बीच का फर्क कहीं भी साफ नहीं किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी अपने RSS से जुड़ाव को नहीं छिपाया। वे खुद को संगठन का ‘कार्यकर्ता’ कहते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, न्यायाधीश, अधिकारी और अन्य पेशेवर लोग भी खुले तौर पर संघ से अपने संबंध स्वीकार करते रहे हैं।

फिर भी RSS को भारत की राजनीति और समाज का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ दिखाया जाता है। जबकि असल में गुप्त संगठन ऐसे नहीं होते, जहाँ सदस्य खुलेआम अपनी पहचान बताते फिरें और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लें। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स की असहजता गोपनीयता से नहीं बल्कि संगठन के बड़े आकार से जुड़ी दिखती है।

सबूत के बिना ‘घुसपैठ’ का आरोप

लेख में दावा किया गया है कि RSS ने न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया और शिक्षा संस्थानों में ‘घुसपैठ’ कर ली है। यह एक गंभीर आरोप है लेकिन इसके लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है। ना कोई दस्तावेज, ना कोई आदेश प्रणाली, ना कोई निर्देश और ना ही कोई वित्तीय कड़ी दिखाई गई है।

इसके बजाय विचारधारा की समानता और संगठनों के आपसी संबंधों को ही साजिश का प्रमाण मान लिया गया है। इसी तर्क से देखा जाए तो दशकों से विश्वविद्यालयों पर हावी वामपंथी शिक्षाविद भी ‘घुसपैठ’ के दायरे में आएँगे। लेकिन जब ऐसे आरोप उठते हैं, तो लेफ्ट-लिबरल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं।

लेख में ‘एफिलिएट’ शब्द का भी बार-बार इस्तेमाल किया गया है। किसी भी हिंदू मुद्दे से जुड़े समूह की गतिविधि को बिना जिम्मेदारी तय किए सीधे RSS से जोड़ दिया जाता है।

फासीवाद और गाँधी की हत्या का संदर्भ लेकिन अदालत के फैसले का नहीं

RSS पर लिखते समय पश्चिमी मीडिया अक्सर शुरुआती संघ विचारकों को फासीवाद से जोड़ता है और महात्मा गाँधी की हत्या का मुद्दा बार-बार उठाता है। इस लेख में भी वही तरीका अपनाया गया है। जबकि भारतीय अदालतें दशकों पहले RSS को एक संगठन के रूप में इस मामले में बरी कर चुकी हैं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे संस्थान उस कानूनी निष्कर्ष तक जानबूझकर नहीं पहुँचते और संकेतों को अधूरा छोड़ देते हैं ताकि संदेह बना रहे। गांधी हत्या के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराने का दावा बिना न्यायिक फैसले पर बात किए आसानी से किया जाता है क्योंकि यह तय की गई कहानी के अनुकूल बैठता है।

यह इतिहास की निष्पक्ष जाँच नहीं बल्कि एक तय नैरेटिव को बनाए रखने की कोशिश है। RSS को लगातार नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाया जाता है क्योंकि अगर अदालतों के फैसलों को स्वीकार कर लिया जाए तो पूरी कहानी ही बिखर जाएगी।

बिना पूरे संदर्भ के बुलडोजर का जिक्र

इसके बाद लेख उत्तर प्रदेश के हिस्से पर आता है, जो पहले से तय ढाँचे पर चलता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से पश्चिमी मीडिया लगातार उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश करता रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

लेख में पूरा घटनाक्रम ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद के इर्द-गिर्द गढ़ा गया है, जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव फैला। हालाँकि, यह नहीं बताया गया कि हालात तेजी से बिगड़कर कानून-व्यवस्था की समस्या बन गए थे, जहाँ हिंसा भड़काने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।

इसी तरह कांवड़ यात्रा के दौरान शांतिपूर्ण श्रद्धालुओं पर फूल बरसाने को भी पश्चिमी मीडिया ने सवालों के घेरे में रखा जबकि उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्रवाई हमेशा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटनाओं के बाद हुई है। ज्ञानवापी और संभल मस्जिद जैसे मामलों में भी दंगाइयों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जिसे योगी आदित्यनाथ की सख्ती ने बड़े टकराव में बदलने से रोका।

बुलडोजर, गिरफ्तारी, इंटरनेट बंद और पुलिस कार्रवाई को लेख में धार्मिक दमन बताया गया है लेकिन उन घटनाओं का जिक्र नहीं है, जिनकी वजह से सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। जब योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली थी उस वक्त प्रदेश में दंगे, गैंगवार और अपराध आम थे। 2017 के बाद कानून-व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। बुलडोजर कार्रवाई भी तभी होती है, जब इमारत अवैध हो और उसका संबंध अपराधी से साबित हो।

इस लेख में इस पूरे क्रम को हटाकर प्रशासनिक कार्रवाई को वैचारिक उत्पीड़न बना दिया गया है। शासन को अपने आप तानाशाही और जनसमर्थन को भीड़ की मानसिकता बताकर पेश किया गया है।

जब सेवा को फासीवादी ढाँचा बताया जाने लगे

पश्चिमी और लेफ्ट-लिबरल मीडिया जिसमें भारतीय भी शामिल हैं, अक्सर हिंदुओं से जुड़ी हर गतिविधि को नकारात्मक रूप में पेश करता है। हाल ही में ‘द कारवां’ ने RSS से जुड़े स्कूलों, छात्रावासों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, चिकित्सा सेवाओं, योग केंद्रों और आपदा राहत कार्यों को ‘आखिरी छोर तक वैचारिक नियंत्रण’ का जरिया बताया। न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में भी इसी रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।

यह नजरिया असल चिंता को उजागर करता है। समस्या काम से नहीं बल्कि संगठन से है। अगर यही सेवाएँ किसी विदेशी फंडिंग वाले NGO या सोरोस-USAID से जुड़े संस्थान करते तो उनकी तारीफ होती। यहाँ आलोचना राजनीतिक नहीं रह जाती बल्कि सभ्यतागत हो जाती है। जहाँ हिंदू समाज की स्वयंसेवी व्यवस्था को ही अवैध ठहराया जाता है।

लेफ्ट-लिबरल मीडिया को असल बेचैनी किस बात से है

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के पीछे एक छिपा हुआ डर दिखता है। RSS ने बिना विदेशी फंडिंग, बिना अभिजात (एलीट) वर्ग की मंजूरी और बिना पश्चिमी उदारवाद के अनुरुप बने, पीढ़ियों तक चलने वाली संस्थाएँ खड़ी की हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा संगठन नहीं कर पाया।

RSS सम्मेलन नहीं बल्कि कार्यकर्ता तैयार करता है। यह दानदाताओं पर नहीं बल्कि स्वयंसेवकों पर चलता है। यह अनुदानों और नौकरशाही पर नहीं बल्कि विकेंद्रीकरण पर आधारित है। RSS की यही स्थायित्व और स्वतंत्रता वाम-उदारवादी और पश्चिमी मीडिया को साजिश जैसी लगती है, क्योंकि वे या तो इस मॉडल को समझना नहीं चाहते या वैचारिक विरोध के कारण समझने से इनकार करते हैं।

लोकतंत्र को माना जाता है, सम्मान नहीं दिया जाता

न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख बार-बार यह संकेत देता है कि भले ही भारत में चुनाव होते हों लेकिन असल सत्ता RSS के हाथ में है। संस्थाएँ काम तो कर रही हैं लेकिन उन्हें ‘कब्जे में लिया गया’ बताया जाता है। चुनावी जीत को जनसमर्थन नहीं बल्कि संगठन की चालाकी के रूप में समझाया जाता है। इस तरह पश्चिमी टिप्पणीकार ना कहते हुए भी भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर देते हैं।

जब राजनीतिक नतीजे उनकी सोच के मुताबिक नहीं होते, तो लोकतंत्र को ही कमजोर बताया जाने लगता है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिमी मीडिया बार-बार यह दावा करता रहा है कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है या देश तानाशाही की ओर बढ़ गया है।

पत्रकारिता के नाम पर डर की कहानी

इसमें कोई शक नहीं कि RSS की आलोचना हो सकती है। अगर किसी को लगता है कि संगठन ने कुछ गलत किया है, तो सवाल उठाना उसका अधिकार है। उसके विचार, राजनीति और प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो पेश किया है, वह आलोचना नहीं बल्कि डर पर आधारित कहानी है।

भारी-भरकम शब्दों, अधूरे ऐतिहासिक संदर्भों और सभ्यतागत गलतफहमी के जरिए एक नैरेटिव गढ़ा गया है। RSS को एक सबसे शक्तिशाली गुप्त संगठन बताकर और नाजी से तुलना दोहराकर लेख भारत से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल सोच की उस परेशानी को दिखाता है, जो यह स्वीकार नहीं कर पाती कि हिंदू समाज अपने तरीके से संगठित हो सकता है। RSS किसी ‘छाया से निकलकर’ नहीं आया। वह हमेशा सबके सामने रहा है। असल परेशानी यह है कि अब वह अपने अस्तित्व के लिए किसी से अनुमति नहीं माँगता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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