आज बात करेंगे ‘द टेलिग्राफ’ के हेडलाइन्स की और ऐसी कई हेडलाइन की जिन्हें अक्सर टेलिग्राफ के मुख्य पृष्ठ पर देखा तो जाता है, लेकिन पूरी खबर के अंदर उस शब्द का जिक्र तक नहीं मिलता, जिसका इस्तेमाल अक्सर हेडलाइन में नजर आता है। ‘द टेलिग्राफ’ नाम का अखबार एबीपी ग्रुप का ही एक अखबार है, जिसे एक पूरे परिवार द्वारा संचालित किया जाता है। खैर, 17 मार्च को अखबार ने अपने पहले पेज पर एक खबर लगाई, जो कि बीजेपी द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए गए पूर्व चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई को लेकर थी। अखबार ने हेडलाइन में लिखा ‘कोविंद, नोट कॉविड, डिड इट’ मतलब कि रंजन गोगोई कोरोना वायरस के कारण नहीं बल्कि रामनाथ कोविंद के कारण राज्यसभा पहुँचे हैं। इतना ही नहीं नीचे खबर में राफेल और अयोध्या मामले को टारगेट करके गोगोई की खबर को लिखा गया।
अब ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि एक देश के सम्मानित पद पर बैठे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का नाम को कोरोना वायरस से क्यों जोड़ा गया? दरअसल अखबार का यही अजेंडा है कि किसी भी तरह से अपने से अलग विचारधारा वाले लोगों, पार्टियों और विचारकों पर मुखर हो कर, नीचता से हमला करे। इसी कड़ी में राष्ट्रपति कोविंद भी आते हैं जो बीजेपी की ओर से राष्ट्रपति बने और आरएसएस की विचारधारा से हैं। इसीलिए उनको अखबार ने अपना निशाना बनाया और कोरोना वायरस से उनकी तुलना की। वैसे भी इन वामपंथी लम्पट गिरोह को हिन्दू धर्म से, भाजपा से, संघ से और हर गैर-वामपंथी विचारधारा से हमेशा घृणा रही है।
रामनाथ कोविंद के सामाजिक और राजनैतिक जीवन के बारे में तो अधिकांश लोगों को यही पता होता है कि वह राष्ट्रपति बनने से पहले बिहार के राज्यपाल भी थे, लेकिन बड़ी बात यह नहीं बल्कि यह है कि वह पहले बीजेपी द्वारा भेजे गए ऐसे राष्ट्रपति है, जो पिछड़ी जाति से आते हैं और आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं। इनका जन्म एक मिट्टी के छोटे से घर में हुआ जो कि बाद में गिर गया था। इसके बाद, जब कोविंद पाँच वर्ष के थे तब उनकी माता जी का देहांत फूस की छत वाले घर में आग लगने के कारण हो गया। इसके बाद बड़े हुए तो हर रोज आठ किलोमीटर पैदर चलकर पढ़ाई करने के लिए जाते थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक छोटे से घर से निकले हुए व्यक्ति ने देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने में कितनी मेहनत की होगी। जाहे फिर वह उनका राजनीतिक जीवन हो या फिर सामाजिक जीवन हो।
‘द टेलिग्राफ’ की हेडलाइन में शब्दों से खेलने की रही है फितरत
अब आप जरा ‘द टेलिग्राफ’ द्वारा हर रोज हेडिंग में एक प्रोपेगेंडा के तहत नए शब्दों को डालने की फितरत भी जान लीजिए। दरअसल इनका खबरों से अधिक हेडलाइन पर पूरा फोकस रहता है कि आखिर हेडलाइन में शब्दों के साथ कैसे खेला जाए और आश्चर्य की बात यह है कि पूरी खबर में उस हेडलाइन से जुड़ा कोई शब्द नहीं मिलेगा और न ही खबर में कोई रेफरेंस होगा। यहाँ तक कि ये लोग खुद पूरी खबर में भी बता नहीं पाते कि यह जो हेडलाइन बनाई गई है आखिर वह शब्द यहाँ क्यों लाए गए हैं।
आश्चर्य की बात यह कि ममता के बंगाल से छपने वाले इस अखबार में बंगाल के मजहबी दंगे दिखाई नहीं देते, बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं की आए दिन होती हत्याएँ नहीं दिखतीं, लेकिन दलितों को एक वायरस से तुलना करते हुए, राष्ट्रपति पर निशाना साधा जाता है, क्योंकि वो भाजपा-संघ से जुड़े हुए रहे हैं। यही अजेंडा इनकी घटिया जातिवादी सोच को और गाँधी परिवार की चापलूसी को दर्शाता है इस बात का अंदाजा आप खुद अखबार में छपी हेडिंग को पड़कर लगा सकते हैं।
नीचे के विडियो में मैंने इस प्रपंची अखबार के 15 मुखपृष्ठों की लीड पर बात की है:


