‘मुझे मोदी से दिक्कत नहीं है, भक्तों से है’ – बोत हार्ड भाई, बोत हार्ड…

मजाक तो लोग किसी भी बात का उड़ा लेते हैं, और अच्छे हास्य को जस्टिफिकेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती। अच्छे हास्य को मानव शरीर के अंगों के नामों की ज़रूरत नहीं पड़ती। कला-साहित्य समाज को दिशा ज़रूर देते हैं, लेकिन दिशाहीन कलाकार समाज को बहकाता है।

आजकल यूट्यूब कॉमेडियन से लेकर कन्हैया कुमार तक एक नया राग छेड़ रहे हैं कि उन्हें ‘मोदी से दिक्कत नहीं है, भक्तों से है’, और यह कि ‘हमारी लड़ाई व्यक्ति से नहीं संविधान बचाने को लेकर है। पहला आदमी कुणाल कमरा है, दूसरा कन्हैया कुमार है। दोनों के नाम में इतने ‘के’ हैं कि ये लोग एकता कपूर के सीरियल होते तो हिट हो चुके होते, सस्ती लोकप्रियता के लिए मोदी-मोदी नहीं जपते। 

इनकी समस्या वाक़ई मोदी नहीं है, इनकी समस्या है कि इनके पास मोदी को छोड़कर और कुछ है ही नहीं करने को। कुणाल कमरा की बात करें तो वो पेशे से कॉमेडियन हैं। अपने विडियो के अंत में वो बाक़ायदा लेनन के शब्द रखते हैं कि ‘ह्यूमर और नॉन-वायलेंस’ से ही सब कुछ जीता जा सकता है। हालाँकि, वो ये नहीं समझ पाए कि उनसे बड़े-बड़े कॉमेडियन, जिन्होंने निजी आक्षेप भी किए, पोलिटिकल व्यंग्य और कटाक्ष भी किए, रीगन के इनॉगुरेशन तक में बोले, लेकिन उन्हें ‘फक’, ‘शिट’, ‘L@udu’, ‘g**nd’, ‘l@ud@’ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

अभी एक विडियो देखा जिसमें कुणाल कमरा ने ‘एक हाथ में फोन, एक हाथ में l@ud@’ कहकर मनोरंजन करने की शुरुआत की, और एनआरआई लोगों को देश से कितना मतलब है इसकी बात उन्होंने ‘बीस साल से टिशू से अपनी ‘g@#d’ पोंछ रहे हैं’ कहकर की। यूपी में मंदिर के प्रसाद खाकर आदमी ‘बाथरूम’ तो हैं नहीं, निकालेगा किधर से लेकर, ‘अमित शाह बॉलर का हाथ काट रहा होगा, उसकी जीभ भी कटी हुई होगी’ जैसे ‘पंच लाइन’ फेंककर ‘मनोरंजन किया।

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ये कॉमेडी नहीं है। चूँकि आपके सामने बैठा व्यक्ति हँस रहा, यह बात उस कंटेंट को कॉमेडी या ह्यूमर नहीं बना देती। जैसे कि AIB का ‘रोस्ट’ न तो ‘रोस्ट’ था, न ही कॉमेडी। ये आपकी अभिव्यक्ति हो सकती है, विचार हो सकते हैं, लेकिन कॉमेडी कहकर, हास्य के स्तर को मत गिराइए। पचास लोगों के सामने हर दो मिनट पर माँ-बहन की गाली निकालते हुए, किसी के ऊपर दो-दो लाइन फेंकना, ह्यूमर नहीं है। 

जब आप तथ्यों से दूर हो जाते हैं, आपको पता है कि दुकान इसी बात से ही चलेगी, तब आप कुछ भी क्लेम कर देते हैं कि यूपी के 40% घरों में बाथरूम नहीं है, दो साल में सड़क गायब हो जाती है, पुल बन नहीं पा रहा, और विकास कहीं है नहीं। ज़ाहिर है कि जो लोग सुनने आए हैं, वो हास्य रस का आनंद लेने आए हैं, न कि वहाँ बैठकर गूगल करेंगे कि सामने खड़े व्यक्ति ने ह्यूमर के नाम पर जो फैक्ट फेंके हैं, उसमें कितनी सच्चाई है। 

कुणाल की बातों पर आप हँस सकते हैं क्योंकि और कोई चारा नहीं है। स्वच्छ भारत के तहत कितने ट्वॉयलेट बने, और गडकरी ने कितनी सड़कें बनवाईँ, ये देखने के लिए दिल्ली के क्लब से बाहर निकल कर वास्तव में यूपी या बिहार के गाँव में जाना पड़ेगा। विकास कितना हुआ है, उसको समझने के लिए कमरे से बाहर निकलना पड़ेगा क्योंकि दिल्ली भले ही जैसी थी, वैसी ही हो, लेकिन जहाँ विकास की ज़रूरत थी, वहाँ हुआ है, और दिखता है। 

वैसे ही वामपंथी विचारधारा से ताल्लुक़ रखने वाला कोई भी व्यक्ति जब संविधान बचाने की बात करता है तो उसे भी कॉमेडियन ही माना जाना चाहिए। कन्हैया कुमार संविधान बचाने, पीएम पद की गरिमा की बातें करते हुए आउट ऑफ प्लेस लगते हैं। कन्हैया ने जिन लोगों को समर्थन दिया है, जिस-जिस तरह के देश और संविधान-विरोधी कैम्पेन का हिस्सा रहे हैं, उनके मुँह से संविधान और गरिमा दोनों ही शब्द खोखले लगते हैं। 

समस्या तो मोदी से ही है, वरना जो अच्छा हो रहा है, उसका मजाक उड़ाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मजाक तो लोग किसी भी बात का उड़ा लेते हैं, और अच्छे हास्य को जस्टिफिकेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती। अच्छे हास्य को मानव शरीर के अंगों के नामों की ज़रूरत नहीं पड़ती। ऐसे शब्द भूलने से लोग इसलिए हँसते हैं क्योंकि वैसे शब्द निजी बातचीत का हिस्सा होते हैं, लेकिन पब्लिक में उन्हें सुनना या बोलना इतना अजीब लगता है कि लोग उस व्यक्ति पर हँस देते हैं कि ये बोल क्या रहा है। 

हो सकता है बातचीत का तरीक़ा बदल गया हो, और हमारी बातों में ऐसे शब्द नॉर्मलाइज हो चुके हों, लेकिन हर नॉर्मलाइज्ड चीज कला के नाम पर प्रदर्शित नहीं की जा सकती। ऐसे शब्दों का उपयोग तभी किया जाता है जब बचाना हो कि इन शब्दों का उपयोग नहीं होना चाहिए। कला-साहित्य समाज को दिशा ज़रूर देते हैं, लेकिन दिशाहीन कलाकार समाज को बहकाता है।

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