Sunday, April 14, 2024
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राहुल गॉंधी भोज से पहले बिझो होता है, बिना उसके खाने नहीं पहुॅंचते, साथ गए झा जी से ही पूछ लेते

न्योता देना और उसे कबूल करना बड़प्पन है। लेकिन, न्योता देने वाले को यह अधिकार होता है कि परिस्थितियों के हिसाब से वह इसे कैंसिल कर आपको सूचना दे दें। उम्मीद की जाती है कि मेहमान भी ​मेजबान की भावनाओं का सम्मान करते हुए कहे कोई नहीं जी, अगली बार आएँगे।

प्रिय राहुल गॉंधी,

आपसे हमारी उम्मीदें बहुत ज्यादा नहीं हैं। खासकर, जब भारतीय परंपराओं की बात हो। लेकिन, गुजरात चुनाव के दौरान जब आपको मंदिर-मंदिर प्र​दक्षिणा करते देखा और पता चला कि आप जनेऊधारी ब्राह्मण हैं, तब से यह उम्मीद रहती है कि दाएँ-बाएँ वाले के टिप्स के असर से परंपराओं के नाम पर नौटंकी ठीक कर लेंगे। इसलिए उम्मीद थी कि आप आज जम्मू-कश्मीर नहीं जाएँगे, क्योंकि धीरे-धीरे हालात सामान्य करने में जुटे वहाँ के प्रशासन ने आपसे नहीं आने की अपील की थी।

उम्मीदों का एक कारण यह भी था कि आप विपक्ष के जिन चेहरों को साथ लेकर श्रीनगर जाने वाले थे, उनमें एक ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा देने वाली पार्टी के झा नामजीवी सांसद भी थे।

न्योता मिलना और उसे कबूल करना बड़प्पन है। लेकिन, न्योता देने वाले को यह अधिकार होता है कि परिस्थितियों के हिसाब से वह इसे कैंसिल कर आपको सूचना दे दें। उम्मीद की जाती है कि मेहमान भी ​मेजबान की भावनाओं का सम्मान करते हुए कहे कोई नहीं जी, अगली बार आएँगे।

मिथिला में भोज देने से पहले बिझो की परंपरा है। सबको पता होता है कि फलाने घर में चुल्हा जल रहा है, व्यंजन बन रहा है और भोग लगाने का न्योता भी है। लेकिन, लोग बिझो का इंतजार करते हैं। यानी जब तक कोई आकर खाने के लिए चलने को न कहे लोग नहीं पहुॅंचते। सुबह से भोज की प्रतीक्षा कर रहे लोग बिझो न होने पर खाने नहीं जाते। सोचा था कि दाएँ-बाएँ खड़े झा जी आपके कान में बिझो वाला गप्प फूंक देंगे और आप इशारा समझ ठीकठाक अभिनय इस बार भी कर लेंगे। ठीक वैसे ही जैसे गुजरात में आप कथित तौर पर आप गहलोत के इशारों पर कर रहे थे।

पता नहीं झा जी को दाएँ-बाएँ में बहुत दूर कर दिया या फिर संभव है दिल्ली में बैठ उच्च सदन की सदस्यता हासिल करने के चक्कर में वे भी परंपरा भूल गए होंगे।

यह सही है कि जम्मू-कश्मीर के हालात पर आपकी अनर्गल टिप्पणियों के बाद वहॉं के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा था कि वे विमान भेजेंगे और आप अपनी नजरों से देख लीजिए। आपका भी बड़प्पन कहा कि विमान भेजने की जरूरत नहीं। हमें लगा कि कश्मीर में पूर्वजों की गलती का प्रायश्चित करने का जो मौका आपको राज्यपाल ने दिया है, उसका आप सदुपयोग कर प्रायश्चित करेंगे। शायद राज्यपाल को भी यही उम्मीद रही होगी कि आप राजनीति छोड़ राज्य के हालात सामान्य बनाने में मदद करेंगे। जैसा आज आपको श्रीनगर एयरपोर्ट से बैरंग लौटाने के बाद उन्होंने दोहराया भी है।

आपसे इस उम्मीद का एक कारण यह भी था कि आपकी पार्टी के भीतर ही आर्टिकल 370 पर कुछ नेता पार्टी स्टैंड से अलग राय रख रहे हैं। इनमें से कुछ आपके बेहद करीबी भी माने जाते हैं।

पर आप ठहरे कॉन्ग्रेसी। वो भी गॉंधी-नेहरू परिवार से। प्रायश्चित तो आप से होना न था। इसलिए पहले विपक्षी एकता के नाम पर आपने दाएँ-बाएँ खड़े करने के लिए फौज जुटाई। फिर सोचा श्रीनगर पहुॅंच भी वही झूठ फैलाएँगे जो आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से देश भर में घूम-घूम कर फैला रहे। आपके इस झूठ पर पाकिस्तान छोड़ कोई लहोलोहाट भी नहीं हो रहा। यह भी उम्मीद रही होगी कि अपने पूर्वजों की तरह आप भी कश्मीरी अवाम गुमराह कर पाएँगे।

जम्मू-कश्मीर में हालात धीरे-धीरे सामान्य करने में जुटे प्रशासन को आपकी नीयत के इस खोट का पता लगते देर न लगी। इसलिए, आने से पहले ही कह दिया नो एंट्री। पर आप बाप-दादा की नाकामियों के कब्र पर न जाएँ ऐसा कैसे हो सकता। यह जानते हुए भी कि श्रीनगर एयरपोर्ट से ही लौटाए जा सकते हैं, आपने दिल्ली से उड़ान भरी। हुआ वही जो होना था। लेकिन, इससे आपको एक और झूठ बोलने का मौका तो मिला। और आप यही चाहते भी थे।

दिल्ली लौटते ही आपने देर भी नहीं लगाई। कहा, “मुझे राज्यपाल ने जम्मू-कश्मीर आने का न्योता दिया था। मैंने उसे स्वीकार किया। उन्होंने कहा था कि सब कुछ सामान्य है। उन्होंने कहा था कि वो मेरे लिए एक हवाई जहाज भेजेंगे। मैंने विमान लेने से इनकार कर दिया था। लेकिन उनके निमंत्रण को स्वीकार कर कहा था कि मैं वहां आऊँगा। मैं विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के साथ वहॉं गया था। हम लोगों से मिलना चाहते थे। वे किन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं यह जानना चाहते थे। हमें एयरपोर्ट से आगे जाने की इजाजत नहीं दी गई। हमारे साथ गए मीडिया के कुछ लोगों को पीटा भी गया। यह स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य नहीं है।”

श्रीनगर एयरपोर्ट से ही बैरंग लौटे

हम सबको, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल को भी आपसे यही उम्मीद थी। एक बार फिर से सबको सही साबित करने के लिए धन्यवाद।

लेकिन, हमारा नहीं तो कम से कम उनका तो ख्याल करिए, जो आपसे हर बाद उम्मीद लगा लेते हैं, पहले से भी किसी बड़े चमत्कार की और आप हर बार, बार-बार, पिछली बार से भी ज्यादा वीभत्स तरीके से उस सपने को चीर-फाड़ देते हैं।

आपका,

एक झा जी, जिसे उच्च सदन की सदस्यता नहीं चाहिए

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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