Wednesday, July 15, 2020
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रवीश जी, मोदी की खुन्नस बच्चों पर क्यों? लीजिए 15 कार्य गिनिए जो मोदी ने शिक्षा के लिए किए

रवीश जी, भारत में हर 55 मिनट में एक विद्यार्थी आत्महत्या करता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में तनाव को न तो मानसिक रोग (पागलपन नहीं) की तरह देखा जाता है, न ही, स्कूल-कॉलेज तो छोड़ ही दीजिए, दिल्ली जैसे शहरों में इसे लेकर कोई जागरुकता है।

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हाल ही में पीएम मोदी ने ‘परीक्षा पे चर्चा’ के दूसरे संस्करण में परीक्षा के तनाव से जूझ रहे छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों का हौसला बढ़ाया। इस कार्यक्रम का पूरा उद्देश्य था कि जो छात्र बोर्ड की परीक्षा दे रहे हैं उनके भीतर से डर को ख़त्म किया जा सके। पीएम मोदी द्वारा इस कार्यक्रम में की गई पूरी बातचीत पर अभी देश में चर्चा हो ही रही थी कि ‘द वायर’ ने अपने एक आर्टिकल में मोदी जी के इस कदम पर सवालों की झड़ी लगा दी।

इस आर्टिकल का शीर्षक ही ऐसा है कि अगर कोई नया पाठक इसे पढ़े तो वो अपने मन में स्वयं ही सवाल खड़े करना शुरू कर देगा कि क्या वाकई पीएम मोदी ने सत्ता को संभालने के बाद देश में बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था के लिए कुछ नहीं किया? वो पाठक इस बात पर बिलकुल भी गौर नहीं करेगा कि मोदी जी को सत्ता में आए सिर्फ साढ़े 4 साल हुए हैं और देश में शिक्षा व्यवस्था की हालात आज़ादी के बाद से ही चरमरा के साँसे भर रही है। यह बताने की मुझे जरूरत नहीं है कि देश में 2014 से पहले किस परिवार का राज रहा है।

इस आर्टिकल के शीर्षक में मोदी जी से सवाल किया गया है कि क्या उन्हें नहीं पता बच्चों के तनाव का कारण बोर्ड की परीक्षा नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था है। यह शीर्षक ही सोचिए कितना हास्यास्पद है- जिन मोदी जी को यह पता है कि आजकल कौन से ऑनलाइन गेम (PUB G) की वज़ह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटक रहा है, उन्हें शिक्षा व्यवस्था के बारे में नहीं पता होगा क्या?

वैसे यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस लेख को लिखने वाले का नाम रवीश कुमार है। यह वही रवीश हैं जो सेकुलर देश में साँस लेने से घबराते हैं, जो अपने कार्यक्रम में बागों में बहार बताते हैं, और नए-नए तरीकों से, खोज-खोज कर केवल सरकार की आलोचना करने में व्यस्त रहते हैं। 2014 में बाद अचानक से ही वो पत्रकार कम समाजसेवी ज्यादा बनकर उभरते हैं। इस समाजसेवा में जुटकर रवीश अपने प्राइम टाइम में केवल उन विषयों पर ही बात करते हैं जिनपर कहीं बात न हो रही हो।

वो देश के कोनों-कोनों से सिर्फ़ उन तीन गाँवो की चर्चा करना अपने शो में नहीं भूलते हैं जिनमें अभी बिज़ली न पहुँची हो। या फिर, आज बजट की ही बात करें तो टैक्स छूट का दायरा बढ़ने पर उन्हें 3 करोड़ लोगों को मिली मदद नहीं दिखी, बल्कि उन्होंने अपना गणित लगाकर बता दिया, “2.5 लाख से 5 लाख होने पर कितना बचेगा? साल में लगभग 7500 टैक्स देते थे ऐसे लोग, महीना का लगभग 5-600 होता है, दिन के 10-12 रुपए। इस से किसको क्या मिलेगा पता नहीं।”

उन्हीं रवीश के आर्टिकल को पढ़कर लगता है मानो उन्होंने कभी ज़मीनी स्तर पर उतर के बोर्ड दे रहे बच्चों के प्रेशर के बारे में जानने की कोशिश नहीं की है। चूंकि मैं देश के क्रीमी माहौल में पढ़े-बढ़े बच्चों के बारे में नहीं जानती हूँ इसलिए मैं मध्य वर्गीय और ग़रीब बच्चों की मानसिकता और माहौल पर ही बात करुँगी।

अमूमन देखा जाता है कि हम लोग जिस माहौल में पढ़ते-बढ़ते हैं वहाँ पर बोर्ड परीक्षा को लेकर हमेशा से ही बच्चों को खौफ़ में रखा जाता है ताकि बच्चा बोर्ड परीक्षा के पड़ाव तक पहुँचते हुए किसी प्रकार की लापारवाही न बरते। फिर चाहे वो बच्चा क्लास का टॉपर ही क्यों न हो, बोर्ड परीक्षा के नाम से सिर-माथे पर पसीने सबके ही आता है। धड़कने उन अभिभावकों की भी बढ़ी रहती हैं जिनके बच्चे 99.99 प्रतिशत लेकर आते हैं और धड़कन उनकी भी बढ़ती है जिनके मार्जिन लाइन पर 33 प्रतिशत से पास होते हैं।

मोदी जी द्वारा की गई ‘परीक्षा पे चर्चा’ का उद्देश्य यह था कि बोर्ड परीक्षा के नाम से घबराई इन बढ़ी हुई धड़कनों को हौसला देकर शांत किया जा सके ताकि परीक्षा के लिए जाते समय उनपर किसी प्रकार का कोई दबाव न हो। इस कार्यक्रम का एक उद्देश्य उन अभिभावकों को विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ी कई संभावनाओं के बारे में बताना भी था जिनके अभाव में कई माता-पिता जबरन ही बच्चों डॉक्टर, इंजीनियर बनने के उद्देश्य से विज्ञान विषय की पढ़ाई में ढकेल देते हैं।

जानकारी के लिए बता दूँ कि भारत में हर 55 मिनट में एक विद्यार्थी आत्महत्या करता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में तनाव को न तो मानसिक रोग (पागलपन नहीं) की तरह देखा जाता है, न ही, स्कूल-कॉलेज तो छोड़ ही दीजिए, दिल्ली जैसे शहरों में इसे लेकर कोई जागरुकता है। फिर, ऐसे में अगर प्रधानमंत्री इस विषय पर, बच्चों से बात करते हैं, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को अपील करते हैं की तनाव को ठीक से हैंडल करें, तो इसमें बुराई क्या है? एक प्रधानमंत्री की पहुँच अगर इतनी है कि वो एक साथ लाखों विद्यार्थियों से जुड़ जाए, तो क्या रवीश जी यह चाहते हैं कि 10,000 बच्चे इस साल आत्महत्या कर लें, तब तक सरकार हर स्कूल में काउंसलर की वेकन्सी निकाले?

आपकी बातों से भी ये तो नहीं लगता कि आप इस मुद्दे को लेकर चिंतित हैं। आपको हर समस्या का हल इन्हीं 4 सालों में चाहिए क्योंकि मोदी तो हवाई यात्रा में व्यस्त रहते हैं, और शिक्षा पर ध्यान नहीं देते। सारा ध्यान तो आप दे रहे हैं क्योंकि आपको ये पता है कि मोदी को कितने मिनट किस काम में देना चाहिए, किस में नहीं। आपके हिसाब से तो आदमी शौचालय बनवाकर उसमें नहीं जाता इसके लिए भी मोदी ज़िम्मेदार है क्योंकि उसको बाल्टी में पानी लेकर वहाँ खड़ा रहना चाहिए!

‘द वायर’ के इस आर्टिकल को पढ़कर बिलकुल भी हैरान होने वाली बात नहीं हैं। सराहना की जगह पीएम के हर कदम की आलोचना करने वाले यह लोग बेबुनियादी बातों को ही आधार बनाते है। पीएम से देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल करने वाले लोगों ने कभी इन सवालों को 2014 से पहले खड़ा करना उचित क्यों नहीं समझा। वह लोग जो पीएम के इस कदम पर सवाल खड़े कर रहे हैं कि उनके पास इस कार्यक्रम के लिए समय कहाँ से आया? उन्होंने कभी नेहरू पर सवाल नहीं खड़ा किया कि आख़िर देश के बारे में सोचने की जगह वो बच्चों के चाचा क्यों बन गए। उस समय कौन सी देश में शिक्षा की व्यवस्था इतनी अच्छी थी जो नेहरू बच्चों से बात करते पाए जाते थे।

खैर इन बातों से मैं यह साबित नहीं कर पाऊँगी, कि ऐसे आर्टिकलों से सिर्फ पीएम द्वारा किए गए कार्यों को न केवल छुपाने की कोशिश की जा रही है बल्कि उनकी छवि को भी धूमिल किया जा रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम

-बता दें कि साल 2014 में सत्ता में आने के बाद लालकिले से अपने पहले संबोधन में 15 अगस्त को हर स्कूल में बालक-बालिकाओं के लिए अलग अलग शौचालय बनाने का वादा किया गया था जिसके बाद इस काम को करने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में शौचायल की बात करना इसलिए भी मैं ज़रूरी समझ रही हूं क्योंकि शौचालय एक बहुत बड़ी वजह है जिसकी वजह से कई लड़कियाँ अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़ देती हैं। 2015 में आई एक खबर के अनुसार झारखंड के जमशेदपुर इलाके में शौचालय की कमी की वज़ह से 200 लड़कियों ने एक साथ न सिर्फ स्कूल को छोड़ा बल्कि पढ़ाई से भी अपना तोड़ लिया था।

-डिजिटल इंडिया का सपना सिर्फ उद्योगों को मद्देनज़र रख कर ही नहीं किया गया था बल्कि इसका क्रियान्वयन शिक्षा के क्षेत्र में भी हुआ। जिसका परिणाम ‘ई-पाठशाला’ है जिसमें दोषरहित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई गई हैं, यहाँ पर सभी पुस्तकें और अन्य अध्ययन सामग्रियाँ उपलब्ध हैं।

-इसके अलावा सरकार द्वारा शाला सिद्धि योजना साल 2015 में शुरू की गई। इस पोर्टल पर सभी स्कूल निर्धारित मापदंडों के आधार पर अपना-अपना मूल्याकंन करते हैं, जिसके रिकॉर्ड सभी के लिए उपलब्ध होता है।

-मिड-डे का शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान हैं। लेकिन इसके आँकड़ों में काफ़ी लंबे समय से गड़बड़ियाँ आ रही थी। लेकिन अब गड़बड़ियों को ई-पोर्टल और आधार नम्बर की मदद से काफी हद तक कम किया गया है। इसमें बजट से होने वाले धन आवंटन को वास्तविकता पर आधारित करने का प्रयास किया गया है। मंत्रालय के अनुसार आधार के चलते फर्जी नामों कमी आई।

-इसके अलावा सरकार ने बदलते समय में विज्ञान और गणित की प्रमुख भूमिका को देखते हुए इसमें अपेक्षित बदलाव किया है। जिसके बाद से सभी राज्यों के बोर्ड में NCERT के पाठ्यक्रम पर आधारित शिक्षा ही दी जाने लगी।

-आपको बता दें कि सरकार द्वारा लागू की गई इन प्रभावी नीतियों के चलते पहले के मुकाबले अब अधिक से अधिक बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। U-Dise के अनुसार 2011 की जनगणना के अनुसार इस वर्ग के 20.78 करोड़ बच्चे थे जिनमें से 19.67 करोड़ बच्चों ने 2015-16 में देश के प्राइमरी स्कूलों की तरफ रुख किया।

इसके अलावा प्राइमरी से हाइयर प्राइमरी में एडमिशन लेने वाले बच्चों का औसत  2009-10 के 83.53 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 90.14 प्रतिशत हो गया है।

इसी दिशा में केंद्रीय विद्यालयों में ए़डमिशन के लिए ऑनलाइन फॉर्म भी उपलब्ध किए जाने लगे हैं।

‘द वायर’ के लेख में जहाँ शिक्षक और छात्रों के अनुपात को लेकर शिकायत है वो भी मोदी सरकार के राज बेहतर हुआ है। 2009-10 में 32 छात्रों पर एक शिक्षक थे, वह अनुपात 2015-16 में 24 छात्रों पर एक शिक्षक तक आ गया है। इसके अलावा रिक्‍त पदों को भरने के लिए लगभग 6,000 शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

इसके अलावा मोदी सरकार ने स्कूली शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए भी काफी प्रभावी कदम उठाए हैं लेकिन विरोधियों के सवाल न खत्म होंगे और न ही वो अपने पाठकों को बरगलाने से बाज आएँगे।

RUSA (राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान),मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी योजनाएँ है जिसके तहत राज्यों के उच्चतर शिक्षण संस्थाओं की गुणवत्ता के स्तर को बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

NAAC: ये समिति मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत ये सर्वोच्च संस्था है जो देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का मूल्याकंन करती है। पहले मूल्याकंन के लिए NAAC अपनी टीम भेजता था जो मौके पर मानदंडों को परखते थे। इसमें भ्रष्टाचार का बोलबाल था। इसको खत्म करके मोदी सरकार ने Self Assessment की प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया है। जो इस साल जुलाई से लागू होगी।

NIRF (नेशलन इंस्टीट्यूश्नल रैंकिंग फ्रेमवर्क): देश की उच्च शिक्षण संस्थाओं में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए 2016 से इस रैंकिग सिस्टम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया है। इस रैकिंग सिस्टम में देश के सभी कॉलेजों और विश्विघालयों की गुणवत्ता के निर्धारित मानदंडों के आधार पर रैंकिग की जाती है। ‘भारत रैंकिंग 2017’ में कुल 2,995 संस्थानों ने भाग लिया । इसके अंतर्गत 232 विश्वविद्यालय, 1024 प्रौद्योगिकी संस्थान, 546 प्रबंधन संस्थान, 318 फार्मेसी संस्थान तथा 637 सामान्य स्नातक महाविद्यालय शामिल हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार पर उंगली उठाने वालों के लिए जानना जरूरी है कि केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता का स्तर ऊँचा करने के लिए, 7 IIT, 14 IIIT, एक नया NIT, 62 नए नवोदय विद्यालय और 103 से भी अधिक केन्द्रीय विद्यालय और खोले हैं।

ऊपर लिखी सब बातें हुईं केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए उन कदमों के बारे मे जो उन्होंने शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए किया है। अब दोबारा से वापस आते हैं उस लेख पर जिसकी वज़ह से इन बातों को लिखने की ज़रुरत पड़ी। इस लेख में कहा गया है कि जो कार्य देश के प्रधानमंत्री ने किया है उसे मानव संसाधन का कोई मंत्री भी कर सकता था। ठीक है, यह बात स्वीकार्य है कि यह कार्य मानव संसाधन मंत्री भी कर सकते थे। लेकिन, पीएम ने खुद यदि इसका ज़िम्मा उठाया तो इसमें क्या गुनाह है। मोदी इस समय देश के उस पद पर हैं जिसके लिए उन्हें जनता द्वारा चुना गया है। अगर वो खुद छात्रों को, अभिभावकों को सचेत करना चाहते हैं। तो इसमें उनके इस कदम पर इतने सवालों को क्यों उठाए जा रहा है।

रवीश जी, आप नहीं जानते है क्या कि परीक्षा के डर से हमारे समाज में कितने छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। 2006 में आत्महत्या कर रहे छात्रों की संख्या 2016 तक आते-आते 9,500 हो गई। अगर ऐसे में देश का पीएम खुद बच्चों के तनाव को कम करने का प्रयास करें। तरह-तरह के क्षेत्रों में संभावना दिखाकर उन्हें उनका विस्तार करने का अवसर दे रहे हैं तो इसमें क्या गलत है। घर के बड़े के बोलने से ही एक बच्चा मान लेता है सही राह पर आ जाता है तो वह तो देश के प्रधानमंत्री हैं। देश का प्रधानमंत्री इस संवेदनशील मुद्दे पर बात करते हैं तो इसमें क्या बुराई है?

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