Friday, April 16, 2021
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केजरीवाल के कारनामे: नए खुले नहीं, 37 बंद हो गए फिर भी दिल्ली में बढ़ गए ठेके

2016 अगस्त में केजरीवाल सरकार एक पॉलिसी लेकर आई जिसमें कहा गया था कि शराब की कोई नई दुकान नहीं खुलेगी। साथ ही किसी क्षेत्र में वहाँ के निवासियों को ठेके से दिक्कत होने पर उसे बंद करने की बात भी कही थी।

हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ़ गोयबल्स का मशहूर कथन है- अगर किसी झूठ को बार-बार बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। हालाँकि मनोवैज्ञानिक इस ख़याल को सही नहीं मानते। वे इसे सच का भ्रम बताते हैं। लेकिन, दिल्ली की आप सरकार को देख लगता है कि गोयबल्स ने जो कहा था वह आज भी प्रासंगिक है।

भारतीय राजनीति में गोयबल्स के कथन को सही साबित करने वाली बहुत सी मिसालें मिल जाएँगी। लेकिन, सत्ता में आने के बाद इस पर जिस तरह आप ने अमल किया है, वैसी मिसालें कम ही मिलेंगी। पार्टी और उसके नेता एक ही झूठ को इतनी बार दोहराते हैं कि वह सच लगने लगता है! दिल्ली सरकार की आबकारी नीति का भी कुछ ऐसा ही हाल है।

हाल ही में आप विधायक अलका लांबा ने विधानसभा में इस मुद्दे पर केजरीवाल सरकार को घेरा था। उन्होंने पूछा था कि आखिर जब आम आदमी पार्टी शराबबंदी का नारा देकर सत्ता में आई थी तो उसने आते ही 2015-16 में 133 नए ठेके खोले जाने की अनुमति क्यों दी? लांबा का सवाल वाजिब था क्योंकि 2014 में शराबबंदी आम आदमी पार्टी के वादों में प्रमुख था।

लांबा के सवाल का साफ़-साफ़ जवाब देने की बजाय सदन में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, आँकड़ों का हवाला देकर उसे उलझाते रहे। उन्होंने इस दौरान अपनी पार्टी द्वारा शराबबंदी पर लिए 2016 के आदेश का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद कभी भी शराब की दुकानें खोलना नहीं रहा। उनकी सरकार ने कभी इसे तवज्जो नहीं दी। डिप्टी सीएम सिसोदिया ने इस बात पर भी जोर डाला कि उन्होंने 2015 से लेकर 2019 तक 37 दुकानें बंद की हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स में दर्शाए आँकड़े।

फिर क्या? एक ही पार्टी के दो नेताओं द्वारा आँकड़ो का ब्यौरा अपने-अपने पक्ष को मजबूत दिखाने के लिए दिया गया। इसमें पता चला कि 2012-13 में दिल्ली में कुल शराब की दुकानों की संख्या 682 थी। जो 2014-15 में 768 हुई और 2015-16 में 862 पहुँच गई।

2016 के अगस्त में केजरीवाल सरकार एक पॉलिसी लेकर आई जिसमें कहा गया था कि अब शराब की कोई नई दुकान नहीं खुलेंगी। साथ ही किसी क्षेत्र में वहाँ के निवासियों को शराब के ठेके से दिक्कत होने पर उसे बंद करने की बात भी कही गई थी।

लेकिन हैरानी वाली बात ये रही कि इस फैसले के बाद भी 2016-17 में ठेकों की संख्या बढ़कर 879 हो गई। बाद में कहीं वर्ष 2017-2018 में इन ठेकों की संख्या में 13 दुकानों की गिरावट दिखी और ये 866 रह गए। इसके बाद 2018-19 में दावा किया जा रहा है कि इनकी संख्या 863 है।

इस बीच घटते-बढ़ते आँकड़ों में शराब बिक्री से राज्य को प्राप्त होने वाले राजस्व (करोड़ो में) में बिना उतार-चढ़ाव भारी इजाफा हुआ। साल 2015-16 में जहाँ राज्य को 862 ठेकों से 4,238.32 करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त हो रहा था वो साल 2018-19 में 863 दुकानों से 5,028.17 करोड़ रुपए हो गया।

इस राजस्व में और बिक्री में इतनी बढ़त कैसे हुई इसका अंदाजा हाल ही में एम्स द्वारा कराए एक सर्वे से लगाया जा सकता है। जो स्पष्ट करता है कि दिल्ली वाले महीने भर में 5,00,00 लीटर शराब गटक जाते हैं, जिसकी कुल कीमत 60 मिलियन के आसपास पड़ती है। शराब की जितनी तलब दिल्ली वालों को है, उससे साफ़ है कि आने वाले सालों में 20-30 दुकान और भी बंद हो जाएँ, तो भी राजस्व में पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

लेकिन, सवाल राजस्व में आए उछाल का नहीं है। मसला है चुनाव के दौरान आप का किया वादा और सत्ता मिलने के बाद उसे भूल जाना। केजरीवाल सरकार अगर चुनाव के समय इसे एजेंडा नहीं बनाती तो न शायद पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रही अलका लांबा को सवाल करने और न ही सिसोदिया को जवाब देने की जरूरत होती।

लांबा के सीधे से सवाल पर कि 2015 में 133 ठेकों को खोलने की अनुमति क्यों दी गई? मनीष सिसोदिया बताते हैं कि दुकान खुलने में लंबा समय लगता है, जो पुरानी सरकार के कार्यकाल के दौरान प्रोसेस में थे, वो ही खोले गए हैं।

हो सकता है इस जवाब से कई लोग संतुष्ट हो जाएँ, लेकिन ये विचार का विषय है कि चुनावों से पहले शराबबंदी पर कड़ा रुख दर्शाने वाली आप सरकार अगर इच्छाशक्ति रखती तो उन 133 दुकानों को खुलने से रोक सकती थी, क्योंकि शीला सरकार में उन्हें खोले जाने को लेकर अप्रुवल नहीं मिला था।

मनीष सिसोदिया ने अपनी सफाई में जिन 37 दुकानों के बंद होने के जिक्र किया, उन्हें भी आँकड़ों से जोड़कर एक बार देखिए… साल 2015 में 133 दुकानें खुलने के बाद ठेकों की संख्या 862 थी। 2016 में फैसला आया कोई दुकान नहीं खुलेगी। इस बीच 37 दुकान बंद हुई, लेकिन बावजूद फिलहाल दिल्ली में ठेकों की संख्या 863 है। कैसे???

स्पष्ट है आधे-अधूरे आँकड़ों से दिल्ली सरकार या तो लोगों को बरगला रही है या फिर ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि ” हमने कुछ तो किया ही नहीं है”।

गौरतलब है कि बीते दिनों अरविंद केजरीवाल बिजली कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी को भी चर्चा का मुद्दा बन चुके हैं। जिस पर अलका लांबा ने शराबबंदी को लेकर किए ट्वीट से पहले एक ट्वीट किया था कि अगर शीला दीक्षित सरकार निजी बिजली कम्पनियों को 210 करोड़ की सब्सिडी देकर कम्पनियों को लाभ पहुँचा रही थीं, तो आज केजरीवाल सरकार उन्हीं बिजली कम्पनियों को 1699.29 करोड़ की सब्सिडी देकर कैसे जनता को लाभ पहुँचा रही है?

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