Sunday, March 7, 2021
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कभी शाम होते घरों में बंद कर दी जाती थीं बिहार की महिलाएँ, आज हैं चुनावी बहस का हिस्सा: लालू से नीतीश तक के सफर में कुछ तो बदला है

लालू के समय में जो बिटिया शाम होते ही ढोर जैसे घरों में बंद कर दी जाती थी, अब शाम को विहंगो जैसे साईकिल पर उन्मुक्तता से बैठ बिहार-विहार करती हैं।

अपने प्रिय नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ की पुनः यात्रा ने पाटलिपुत्र की महान स्त्रियों की विरासत की चिर स्मृति मन में जगा दी। वही भूमि, जिसने 16 महाजनपदों की अवधारणा देकर भारत को राज करना सिखाया। उसकी महिलाएँ आत्मबल से कितनी लबालब होंगी, जिन्होंने भारतवर्ष को उत्तरोत्तर सम्राट तैयार कर के दिए!

रामायणकालीन माता सीता हों, जिन्होंने लंका जैसे शक्तिशाली साम्राज्य से अकेले निडरता से आँखें मिलाई, उर्मिला, जिन्होंने स्वाधिकार से लक्ष्मण को अपने स्वच्छंद धर्म निर्वाहन को प्रवृत्त किया। कैसा विषद आत्मबल रहा होगा सुजाता का, जिनकी ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो’ की शुभेक्षा से भरी खीर ग्रहण करने मात्र से बुद्ध को आत्मबोध हो गया।

फिर यशोधरा, मूरा, शुभाद्रंगी जैसे माताएँ और राजकन्याएँ हों, या उभया मिश्रा जैसी विदुषी, जिनके सामने शंकराचार्य को भी लगभग घुटने टेकने पड़े, बिहारी महिलाओं के शौर्य को बहुत दूर जाकर ढूँढना नहीं पड़ता।

वैसे ‘प्रिंट की जोती’ की मानें, या फिर यूँ भी बिहार मातृसत्तात्मक ही रहा है यानी, ‘बिहारी गाइज आर मोस्टली मम्माज़ बॉय’ (‘जोती’ जी से साभार) सिवाय एक यादव परिवार की बहू के, जो आधी रात को घर से निष्कासित की जाती है, उसे अपवाद रखें। हुआ तो गाँधी परिवार में मेनका जी के साथ भी ऐसा ही, परंतु हम इसे लेकर भारत में और बिहार में महिलाओं की पारंपरिक स्थिति पर धारणा नहीं बना सकते।

जैसा कि सर्वविदित है कि सामाजिक कुपोषण की पहली शिकार भी स्त्री होती हैं। वर्षों तक घोटालों और प्राकृतिक आपदा झेलता बिहार निश्चित ही अपने कई समर्थ नौनिहालों से हाथ धो चुका है और इसका बहुत बड़ा मूल्य महिलाओं ने चुकाया।

एक ‘जातउद्घोषक’ सरकार में एक जाति विशेष की महिलाओं के चुन-चुन कर बलात्कार किए जाने की बात हो या बाहुबलियों की अतिशयोक्ति, बिहार की ललनाओं की परीक्षा सदियों तक चली।

वैसे, लालू के समय में जो बिटिया शाम होते ही ढोर जैसे घरों में बंद कर दी जाती थी, अब शाम को विहंगो जैसे साईकिल पर उन्मुक्तता से बैठ बिहार विहार करती है। इस वाक्य के अलंकार निश्चय ही भावातिरेक में लालू के उस काल को सोच कर आते हैं, जब अपराध ने अपनी नई सीमाएँ तय कीं।

सीमाएँ ही नहीं, अपराध निरन्तर नए रूप और प्रतिमान स्थापित करता रहा। स्वाभाविक है कि समाज में अपराध की पहली और अंतिम भोक्ता महिलाएँ होती हैं, चाहे आपको कुल का मान मर्दन करना हो, या फिर व्यक्ति और समुदाय का। लेकिन NRCB के आँकड़ों से यह जानना बहुत सुखद रहा कि नीतीश कुमार के शासन में बिहार में महिलाओ के विरूद्ध अपराध भारत में तीसरे पायदान पर हैं। राजस्थान और दिल्ली से कहीं अधिक सुरक्षित बिहार अब स्वछंद साँस लेता प्रतीत होता है।

इस चुनावी मौसम में तब जानने का मन हुआ कि राजनीतिक पराक्रम के खेल में महिलाओं को लेकर कोई चुनावी वार्ता है भी या नहीं? इसी क्रम में बिहार में जारी विधानसभा चुनाव के चुनावी एजेंडे पर देखे गए कुछ राजनीतिक भाषणों से भी वास्ता पड़ा।

आशानुरूप, सबसे निराशाजनक बात थी कि बिहार के राजपुत्रों- तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के भाषणों से खानापूर्ति के अलावा महिला विकास और सशक्तिकरण जैसे शब्द ही गायब थे। चिराग ज्यादा सुनने में नहीं आए पर वो अपेक्षाकृत काफी कुशल वक्ता और नेता हैं।

ऐसे ही भारतीय जनता पार्टी का पक्ष रखते हुए श्री गुरुप्रसाद पासवान को इस बीच काफी न्यूज चैनल पर सुना जिसमें कुछ महत्वपूर्ण बातें पता चलीं। इसके अनुसार, बिहार में इस बीच राजग सरकार के अंतर्गत –

  • 7 करोड़ जन-धन खाते, जो अक्टूबर 2020 तक खुले, उनमें 2.5 करोड़ महिलाओं के हैं
  • 4 लाख मुद्रा योजना के अन्तर्गत आवंटित ऋण में 2.5 लाख महिलाएँ लाभान्वित हुईं
  • 15 करोड़ महिलाएँ स्वयम सहायता के माध्यम से एमेजॉन, फ्लिपकार्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में बहुआयामी भूमिका निबाह रही हैं।
  • इसमें समाज की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था, पंचायत में दिया गया आरक्षण उल्लेखनीय है

यह जानकारी उत्साहजनक है और उससे भी ऊपर, यह देखना सुखद है कि बिहार के राजनीति में लालू के जातिगत गोलबंदी और तुष्टीकरण से ऊपर महिला विकास और सशक्तिकरण का एक स्वस्थ और बहुप्रतीक्षित विमर्श शुरू हुआ जो अब तब बिहार के राजनीतिक पृष्ठभूमि से नदारद था! इस सकारात्मकता का स्वागत होना चाहिए और ईश्वर इस मंथन को पुष्पित-पल्लवित करे!

नोट: यह लेख श्रद्धा सुमन राय द्वारा लिखा गया है, जो कि वर्तमान में एक बहुराष्ट्रीय संस्था में यांत्रिक अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।

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