Sunday, July 5, 2020
Home विचार राजनैतिक मुद्दे चुनाव से पहले फिर 'विशेष राज्य' के दर्जे का शिगूफा, आखिर इस राजनीतिक जुमले...

चुनाव से पहले फिर ‘विशेष राज्य’ के दर्जे का शिगूफा, आखिर इस राजनीतिक जुमले से कब बाहर निकलेगा बिहार

बिहार सरकार और एएडीआरआई निदेशक जैसे आर्थिक सलाहकारों के रवैए से तो यही लगता है कि वे प्रदेश को अभी भी 'जंगलराज' बनाम 'सुशासन' की घुट्टी पिलाते हुए जनता को विशेष दर्जे की माँग से बरगलाना चाहते हैं। बदकिस्मती यह है कि प्रमुख विपक्षी दल जैसे राजद और कॉन्ग्रेस भी इसी इसी माँग के सहारे अपनी राजनीति साधना चाहते हैं।

ये भी पढ़ें

Shishu Ranjan
Economist and Banker

देश में लॉकडाउन की घोषणा हुए दो महीने होने को हैं। कोरोना के शुरुआती दौर में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों की प्राथमिकता थी कि संक्रमण की रफ्तार कैसी तोड़ी जाए।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार बिना लॉकडाउन वाली स्थिति में 15 अप्रैल तक भारत में संक्रमितों की संख्या संभवतः 8.5 लाख के क़रीब होती। लॉकडाउन की नीति ने सरकारों की प्राथमिक आशय को पूरा किया है। यही कारण है कि विश्व की दूसरी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद भारत में संक्रमण की रफ़्तार विश्व के कई देशों से कम है।

लेकिन आर्थिक गतिविधियों के बंद होने की वजह से देश में अन्य कठिनाइयाँ उभर कर सामने आ गई हैं। इनमें गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन इत्यादि प्रमुख हैं।

भारत में कुल रोजगार में 93% भागीदारी असंगठित क्षेत्र की है, जो इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। रिक्शा-ठेला चालक, सब्जी बेचने वाले, ड्राइवर-गार्ड, माली, दूध-अखबार पहुँचाने वाले, मंडी से लेकर कल-कारखानों में दिहाड़ी पर काम करने वाले, घरेलू कार्यों में सहयोग करने वाले और इसी तरह के अन्य कार्यों में लिप्त वर्ग के लोग जो गाँव की गरीबी और बेरोजगारी से भागकर शहरों में अपना भविष्य तलाशने आए थे, आज उनमें से अधिकांश मजदूर बेरोजगार होकर वापस गाँव जाने को प्रयत्नशील हैं।

सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करने की मजबूरी और उनसे होने वाली मौतों ने सोती हुई राज्य सरकारों को भी नींद से जगा दिया है। वर्तमान परिस्थिति में प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाना, उनमें संक्रमण की जाँच करना, उनके इलाज का प्रबंध करना वगैरह सरकारों के लिए चुनौती बनी हुई है।

प्रवासी मजदूरों की इस दुर्दशा ने एक बार फिर देश में विभिन्न राज्यों के आर्थिक विकास की असमानता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। एक तरफ विकास की सीढ़ी पर आगे खड़े गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य हैं। दूसरी ओर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, बंगाल जैसे राज्य हैं, जहाँ से पलायित लोग अन्य राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की संभावनाएँ तलाशते हैं।

अब कोरोना जनित आर्थिक मंदी से प्रभावित यह वर्ग घर वापसी कर रहा है। ऐसे में इनके गृह राज्य की सरकारें स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के प्रयासों में जुट गई हैं। इस मंदी में सरकारों के राजस्व का भी नुकसान हुआ है। लिहाजा विभिन्न राज्य सरकारों ने केंद्र से अपने लिए आर्थिक सहायता की माँग की है।

प्रवासियों के वापस आने से अन्य राज्यों की तुलना में बिहार ज्यादा प्रभावित हो रहा है। बिहार मुख्यतः कृषि आधारित राज्य है। उत्तर बिहार में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सुखाड़ से प्रभावित रहने की वजह से कृषि क्षेत्र वापस आए प्रवासियों को रोजगार देने में बहुत सक्षम नहीं है। ऐसे में बिहार सरकार के आर्थिक सलाहकारों ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग एक बार पुनः छेड़ दी है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी माने जाने वाले एडीआरआई संस्थान के निदेशक ने हालिया प्रकाशित अखबारी लेखों के माध्यम से यह माँग बिहार की जनता तक पहुँचा दी है। हालाँकि इसकी शुरुआत तो स्वयं नीतीश कुमार ने 28 फरवरी 2020 को अमित शाह की अध्यक्षता वाली पूर्वी जोनल काउंसिल की बैठक में ही कर दी थी।

वस्तुतः यह माँग तो हर चुनाव के पहले बिहार की सभी राजनैतिक दलों का प्रमुख मुद्दा बन जाता है। लेकिन सभी पार्टियों के चुनावी मुद्दे में शामिल होने के वावजूद बिहार आज तक विशेष राज्य के वर्ग में शामिल होने में असफल रहा है। तो फिर से इसकी माँग उठाना क्या आगे आने वाले चुनावी समर का सूचक है? या वित्तीय संसाधन जुटाने का एक सार्थक प्रयास, जिससे बिहार आर्थिक मंदी के असर से निकलने और लोगों को रोजगार देने में सक्षम हो?

विशेष दर्जा देने का प्रावधान पाँचवें वित्त आयोग द्वारा सुझाई गई थी। इसके अनुसार राष्ट्रीय विकास परिषद निम्नलिखित 5 कारणों से किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान कर सकती थी;

  • पर्वतीय और दुष्कर बहुलता क्षेत्र वाले राज्य
  • अत्यधिक कम जनसंख्या घनत्व अथवा अनुसूचित जनजाति बहुलता वाले राज्य
  • सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय सीमा वाले राज्य
  • आर्थिक और अवसंरचना की दृष्टि से पिछड़े राज्य
  • वित्तीय संकट परिस्थिति

वर्तमान में 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। ये राज्य हैं: असम, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड। ये सारे राज्य या तो हिमालय की गोद में हैं या अनुसूचित जनजाति बहुल राज्य हैं।

विशेष राज्य का दर्जा होने के कारण इन्हें कुल केंद्रीय सहयोग राशि का 30% सीधा-सीधा मिल जाता है। विशेष दर्जे वाले राज्य को केंद्रीय सहयोग राशि का 90% भाग अनुदान और 10% भाग कर्ज के रूप में मिलता है। वहीं, अन्य राज्यों के लिए यह क्रमशः 70% और 30% होता है। केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन में भी विशेष दर्जे वाले राज्यों को बस 10% साझेदारी करनी होती है।

लेकिन, 14वें वित्त आयोग ने इस विशेष राज्य के दर्जे वाले वर्ग को ही रद्द करने की अनुशंसा की, जिसे सरकार ने मान लिया था। केंद्र सरकार ने वित्त आयोग की उस अनुशंसा को भी स्वीकार कर लिया था, जिसके तहत केंद्रीय राजस्व में राज्य सरकारों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ा कर 42% करनी थी। इन अनुशंसाओं के पालन करने के बाद किसी भी राज्य को आर्थिक सहायता के लिए विशेष दर्जा देने का प्रावधान समाप्त हो चुका है।

ऐसे में राज्यों का ‘विशेष दर्जा’ देने की माँग राजनीति से प्रेरित दिखती है, वह भी तब जब केंद्रीय आर्थिक सहायता राशि बिना विशेष दर्जा प्रदान किए भी दी जा सकती है।

जब मध्य प्रदेश बिना विशेष राज्य के दर्जे के बावजूद स्वयं का संसाधन विकसित करते हुए विकास के मापदंडों पर आगे निकल सकता है। जब पंजाब जैसा छोटा और कृषि प्रधान राज्य भी बिना किसी विशेष सहायता के बिहार को हर क्षेत्र में पछाड़ सकता है। फिर प्रश्न उठता है कि बिहार ऐसा क्यूँ नहीं कर पाया? ऐसा न कर पाने की जिम्मेदारी किसकी है?

बिहार के मुख्यमंत्री का तीसरा कार्यकाल पूरा होने जा रहा है और बिहार विकास के अनेक मानकों पर नीचे खड़ा है। बिहार बँटवारे के बाद से अभी तक के समयकाल में तीन चौथाई समय नीतीश कुमार का शासन रहा है। ऐसे में विशेष राज्य के दर्जे की माँग के भरोसे 15 वर्ष के कार्यकाल तक बैठे रहना कहाँ तक उचित है? वह भी तब जब बिहार सरकार केंद्र द्वारा आवंटित विकास राशि का भी पूर्ण व्यय और सदुपयोग नहीं कर पाती।

इन परिस्थितियोंऐसे में विशेष दर्जा की माँग उठना न सिर्फ चुनावी जुमला दिखता है, बल्कि यह वर्तमान सरकार की राज्य के विकास के प्रति उदासीनता और अपनी अकर्मण्यता छिपाने की एक सोची-समझी रणनीति भी है।

राजनीतिक तौर पर भी इस मुद्दे को बिहार की जनता सिरे से खारिज कर चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़े थे तो उन्होंने विशेष राज्य के दर्जे को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था। उस चुनाव के नतीजों से स्पष्ट है कि जनता इसे बिहार के विकास के लिए मुद्दा मानती ही नहीं है। ऐसे में पुनः इस माँग को उठना अपने नाकारेपन और नाकाबिलियत से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता।

अब जब कोरोना संक्रमण के दौरान प्रदेश के लोगों को रोज़गार के अवसर देने होंगे और विदेशी औद्योगिक इकाइयाँ भी भारत में निवेश के नए अवसर ढूँढ रही है, ऐसे में राज्य सरकारों को अपनी उदासीनता और अकर्मण्यता त्याग कर इस चुनौती को अवसर में बदलना होगा। बिहारवासी इस चुनौती को अवसर के रूप में देख रहे हैं।

पटना स्थित सीएसआरए नामक शोध संस्थान के द्वारा चलाए जा रहे विशेषज्ञों के वक्तव्य ऋंखला में भी बिहार के विकास के लिए कृषि और उद्योग के क्षेत्र में कई अवसरों को चिह्नित किया गया है। सीएसआरए विशेषज्ञों के अनुसार बिहार में कम लागत वाली लघु-मध्यम उद्योग की असीम संभावनाएँ हैं। इनमें मखाना आधारित उद्योग, गन्ना मिल, दुग्ध आधारित उद्योग, आम, लीची, और केला संबंधित फूड प्रोसेसिंग उद्योग, जूट, सिल्क और कपास आधारित कुटीर उद्योग, कृषि आधारित उद्योग वगैरह शामिल हैं।

लेकिन बिहार सरकार और एएडीआरआई निदेशक जैसे आर्थिक सलाहकारों के रवैए से तो यही लगता है कि वे प्रदेश को अभी भी ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ की घुट्टी पिलाते हुए जनता को विशेष दर्जे की माँग से बरगलाना चाहते हैं।

बदकिस्मती यह है कि प्रमुख विपक्षी दल जैसे राजद और कॉन्ग्रेस भी इसी इसी माँग के सहारे अपनी राजनीति साधना चाहते हैं। ऐसे में यह प्रश्न तो स्वाभाविक ही है कि कब तक बिहार की बदहाली का हवाला देते हुए उसके नेता और राजनीतिक दल केंद्र से विशेष राज्य के दर्जे की भीख माँगते रहेंगे। वो भी तब जब उन्हें पता है कि यह भीख मिलने वाली नहीं है और बिना इस दर्जे के भी बिहार का विकास किया जा सकता है।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shishu Ranjan
Economist and Banker

ख़ास ख़बरें

जाकिर नाइक की तारीफ वाला महेश भट्ट का वीडियो वायरल, भगोड़े इस्लामी प्रचारक को बताया था- गौरव, बेशकीमती खजाना

फ़िल्म सड़क-2 की रिलीज डेट आने के बाद सोशल मीडिया में फिल्म डायरेक्टर महेश भट्ट का एक वीडियो वायरल हो रहा है।

हॉस्पिटल से ₹4.21 लाख का बिल, इंश्योरेंस कंपनी ने चुकाए सिर्फ ₹1.2 लाख: मनोज इलाज की जगह ‘कैद’

मनोज कोठारी पर यह परेशानी अकेले नहीं आई। उनके परिवार के 2 और लोग कोरोना संक्रमित हैं। दोनों का इलाज भी इसी हॉस्पिटल में। उनके बिल को लेकर...

CARA को बनाया ईसाई मिशनरियों का अड्डा, विदेश भेजे बच्चे: दीपक कुमार को स्मृति ईरानी ने दिखाया बाहर का रास्ता

CARA सीईओ रहते दीपक कुमार ने बच्चों के एडॉप्शन प्रक्रिया में धाँधली की। ईसाई मिशनरियों से साँठगाँठ कर अपने लोगों की नियुक्तियाँ की।

नक्सलियों की तरह DSP का काटा सर-पाँव, सभी 8 लाशों को चौराहे पर जलाने का था प्लान: विकास दुबे की दरिंदगी

विकास दुबे और उसके साथी बदमाशों ने माओवादियों की तरह पुलिस पर हमला किया था। लगभग 60 लोग थे। जिस तरह से उन लोगों ने...

बकरीद के पहले बकरे से प्यार वाले पोस्टर पर बवाल: मौलवियों की आपत्ति, लखनऊ में हटाना पड़ा पोस्टर

"मैं जीव हूँ मांस नहीं, मेरे प्रति नज़रिया बदलें, वीगन बनें" - इस्लामी कट्टरपंथियों को अब पोस्टर से भी दिक्कत। जबकि इसमें कहीं भी बकरीद या...

उनकी ही संतानें थी कौरव और पांडव: जानिए कौन हैं कृष्ण द्वैपायन, जिनका जन्मदिन बन गया ‘गुरु पूर्णिमा’

वो कौरवों और पांडवों के पितामह थे। महाभारत में उनकी ही संतानों ने युद्ध किया। वो भीष्म के भाई थे। कृष्ण द्वैपायन ने ही वेदों का विभाजन किया। जानिए कौन थे वो?

प्रचलित ख़बरें

जातिवाद के लिए मनुस्मृति को दोष देना, हिरोशिमा बमबारी के लिए आइंस्टाइन को जिम्मेदार बताने जैसा

महर्षि मनु हर रचनाकार की तरह अपनी मनुस्मृति के माध्यम से जीवित हैं, किंतु दुर्भाग्य से रामायण-महाभारत-पुराण आदि की तरह मनुस्मृति भी बेशुमार प्रक्षेपों का शिकार हुई है।

गणित शिक्षक रियाज नायकू की मौत से हुआ भयावह नुकसान, अनुराग कश्यप भूले गणित

यूनेस्को ने अनुराग कश्यप की गणित को विश्व की बेस्ट गणित घोषित कर दिया है और कहा है कि फासिज़्म और पैट्रीआर्की के समूल विनाश से पहले ही इसे विश्व धरोहर में सूचीबद्द किया जाएगा।

‘…कभी नहीं मानेंगे कि हिन्दू खराब हैं’ – जब मानेकशॉ के कदमों में 5 Pak फौजियों के अब्बू ने रख दी थी अपनी पगड़ी

"साहब, आपने हम सबको बचा लिया। हम ये कभी नहीं मान सकते कि हिन्दू ख़राब होते हैं।" - सैम मानेकशॉ की पाकिस्तान यात्रा से जुड़ा एक किस्सा।

काफिरों को देश से निकालेंगे, हिन्दुओं की लड़कियों को उठा कर ले जाएँगे: दिल्ली दंगों की चार्ज शीट में चश्मदीद

भीड़ में शामिल सभी सभी दंगाई हिंदुओं के खिलाफ नारे लगा रहे और कह रहे थे कि इन काफिरों को देश से निकाल देंगे, मारेंगे और हिंदुओं की लड़कियों को.......

इजरायल ने बर्बाद किया ईरानी परमाणु ठिकाना: घातक F-35 विमानों ने मिसाइल अड्डे पर ग‍िराए बम

इजरायल ने जोरदार साइबर हमला करके ईरान के परमाणु ठिकानों में दो विस्‍फोट करा दिए। इनमें से एक यूरेनियम संवर्धन केंद्र है और दूसरा मिसाइल निर्माण केंद्र।

नेपाल के कोने-कोने में होऊ यांगी की घुसपैठ, सेक्स टेप की चर्चा के बीच आज जा सकती है PM ओली की कुर्सी

हनीट्रैप में नेपाल के पीएम ओली के फँसे होने की अफवाहों के बीच उनकी कुर्सी बचाने के लिए चीन और पाकिस्तान सक्रिय हैं। हालॉंकि कुर्सी बचने के आसार कम बताए जा रहे हैं।

जाकिर नाइक की तारीफ वाला महेश भट्ट का वीडियो वायरल, भगोड़े इस्लामी प्रचारक को बताया था- गौरव, बेशकीमती खजाना

फ़िल्म सड़क-2 की रिलीज डेट आने के बाद सोशल मीडिया में फिल्म डायरेक्टर महेश भट्ट का एक वीडियो वायरल हो रहा है।

हॉस्पिटल से ₹4.21 लाख का बिल, इंश्योरेंस कंपनी ने चुकाए सिर्फ ₹1.2 लाख: मनोज इलाज की जगह ‘कैद’

मनोज कोठारी पर यह परेशानी अकेले नहीं आई। उनके परिवार के 2 और लोग कोरोना संक्रमित हैं। दोनों का इलाज भी इसी हॉस्पिटल में। उनके बिल को लेकर...

उत्तराखंड: रात में 15 साल की बच्ची को घर से उठाया, जुनैद और सुहैब ने किया दुष्कर्म

रेप की यह घटना उत्तराखंड के लक्सर की है। आरोपित एक दारोगा के सगे भाई बताए जा रहे हैं। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।

उस रात विकास दुबे के घर दबिश देने गई पुलिस के साथ क्या-क्या हुआ: घायल SO ने सब कुछ बताया

बताया जा रहा है कि विकास दुबे भेष बदलने में माहिर है और अपने पास मोबाइल फोन नहीं रखता। राजस्थान के एक नेता के साथ उसके बेहद अच्छे संबंध की भी बात कही जा रही है।

अपने रुख पर कायम प्रचंड, जनता भी आक्रोशित: भारत विरोधी एजेंडे से फँसे नेपाल के चीनपरस्त PM ओली

नेपाल के PM ओली ने चीन के इशारे पर नाचते हुए भारत-विरोधी बयान तो दे दिया लेकिन अब उनके साथी नेताओं के कारण उनकी अपनी कुर्सी जाने ही वाली है।

काली नागिन के काटने से जैसे मौत होती है उसी तरह निर्मला सीतारमण के कारण लोग मर रहे: TMC सांसद कल्याण बनर्जी

टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लेकर विवादित बयान दिया है। उनकी तुलना 'काली नागिन' से की है।

‘अल्लाह ने अपने बच्चों को तनहा नहीं छोड़ा’: श्रीकृष्ण मंदिर में मालिक ने की तोड़फोड़, ‘हीरो’ बता रहे पाकिस्तानी

पाकिस्तान के स्थानीय मुसलमानों ने इस्लामाबाद में बन रहे श्रीकृष्ण मंदिर में तोड़फोड़ मचाने वाले मलिक को एक 'नायक' के रूप में पेश किया है।

रोती-बिलखती रही अम्मी, आतंकी बेटे ने नहीं किया सरेंडर, सुरक्षा बलों पर करता रहा फायरिंग, मारा गया

कुलगाम में ढेर किए गए आतंकी से उसकी अम्मी सरेंडर करने की गुहार लगाती रही, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ।

CARA को बनाया ईसाई मिशनरियों का अड्डा, विदेश भेजे बच्चे: दीपक कुमार को स्मृति ईरानी ने दिखाया बाहर का रास्ता

CARA सीईओ रहते दीपक कुमार ने बच्चों के एडॉप्शन प्रक्रिया में धाँधली की। ईसाई मिशनरियों से साँठगाँठ कर अपने लोगों की नियुक्तियाँ की।

पाकिस्तानी घोटाले से जुड़े हैं हुर्रियत से गिलानी के इस्तीफे के तार, अलगाववादी संगठन में अंदरुनी कलह हुई उजागर

सैयद अली शाह गिलानी के इस्तीफ को पाकिस्तान के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन को लेकर गड़बड़ियों से जोड़कर देखा जा रहा है।

हमसे जुड़ें

234,622FansLike
63,120FollowersFollow
269,000SubscribersSubscribe