प्रिय चुनाव आयोग, ये हो क्या रहा है?

ये गिरोह यह भी कह सकता है कि मोदी सरकार ने जो भी विकास कार्य किए, वो तो भारत सरकार ने किए, अतंः किसी पार्टी को उसका नाम गिनाकर वोट माँगने का हक़ नहीं होना चाहिए। चूँकि बाकी पार्टियाँ सत्ता से दूर थीं, तो वो विकास कार्य नहीं कर पाए, अतः मोदी और भाजपा को कैम्पेनिंग में भारत सरकार की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बताने पर मनाही होनी चाहिए।

चुनाव आयोग का अधिकतर समय मजाक ही उड़ाया गया है। हर पार्टी के लोगों ने समय-समय पर चुनाव आयोग को उपहास का पात्र बनाया है। कभी बिना दाँत का शेर तो कभी काग़ज़ी बाघ आदि उपनामों से इसे नवाज़ा जाता रहा है। इसके पीछे हमेशा यह दलील होती थी कि चुनाव आयोग सिर्फ बोलता है, उसकी बातों को कोई मानता नहीं।

इस बार चुनाव आयोग ने अपने आप को गम्भीरता से लिया है और कई कालजयी आदेश पारित कर दिए हैं। इनमें से प्रमुख है मोदी की बायोपिक को बैन कर देना यह कहते हुए कि यह फिल्म ‘लेवल प्लेइंग फ़ील्ड’ को डिस्टर्ब करती है। इस तर्क से तो कई लोग और मीडिया वालों को प्रतिबंधित करना होगा क्योंकि वो भी मोदी की रैलियों को टेलिकास्ट करते हैं, स्टूडियो से पक्ष लेकर बात करते हैं, इंटरव्यू चलाते हैं।

आखिर लेवल प्लेइंग फ़ील्ड है क्या? जब हर नेता रैली कर रहा है, लोकल कार्यकर्ता पैम्फलेट बाँट रहे हैं, व्यक्ति फेसबुक पर लिख रहा है, तो फिर फिल्म, वेब सीरिज़ या टीवी सीरियल्स पर रोक लगाना अपने आप में हास्यास्पद है। मीडिया में हर दिन, चौबीस घंटे पोलिटिकल स्टोरी ही चलती है जिससे वोटर प्रभावित होता है, और सबसे ज़्यादा होता है। फिर इन्हें चलने दिया जा रहा है, और फिल्म को रोक रहे हैं।

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ऐसा नहीं है कि मुझे विवेक ओबरॉय की फिल्म में बहुत स्कोप दिख रहा है। मेरे हिसाब से बेकार फिल्म होगी, ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ टाइप की पैरोडी। लेकिन, अभिव्यक्ति और व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार तो सबको है, उस पर चुनाव आयोग किस तर्क से उलझ रहा है? कोई भी व्यवसायी अपने व्यवसाय को अपने फायदे के हिसाब से समय और जगह चुनकर चलाता है, फिर मोदी की फिल्म भी उस समय पर आने वाली थी, जब उसकी बात सबसे ज़्यादा हो रही हो। और तब चुनाव आयोग को याद आया कि फिल्म को रोक देना चाहिए।

फिर तो कुणाल कमरा जैसे चुटकुलेबाजों पर भी रोक लगनी चाहिए, जो अपने स्तर पर ही सही, मोदी के खिलाफ प्रचार करता दिखता है। फिर तो ज़ी न्यूज़ और एनडीटीवी पर भी रोक लगनी चाहिए क्योंकि दोनों ने अलग पाले पकड़ रखे हैं। फिर तो, तमाम यूट्यूब और फेसबुक के लोगों पर भी रोक लगनी चाहिए जो जागरुकता के नाम पर पार्टी के पक्ष या विपक्ष में लिख और बोल रहे हैं।

चुनाव आयोग का तर्क बेकार है। उसे बेहतर तर्क लाकर इस फिल्म को बैन करना चाहिए था। ये भी कह देते की मानवता को इस फिल्म से ख़तरा है, तो भी मैं ज़्यादा कन्विन्स होता बजाय इसके कि इससे लेवल प्लेइंग फ़ील्ड डिस्टर्ब हो रहा है।

ये तर्क इतना वाहियात है कि कल इसे आधार बनाकर विरोधी पार्टियाँ यह माँग कर सकती हैं कि मोदी दिन में तीन रैलियाँ कर रहा है, उनके नेता एक ही कर रहे हैं, अतः रैलियों की संख्या उनके हिसाब से तय होनी चाहिए। क्योंकि, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड तो यहाँ भी डिस्टर्ब हो रहा है! मैं मजाक नहीं कर रहा, ये ऐसा ही कुतर्क है चुनाव आयोग का क्योंकि आज के दौर मैं हर व्यक्ति अपने मतलब की सूचनाएँ कहीं से भी पा रहा है, वैसे में चुनाव आयोग इन क्षुद्र कार्यों में अपने आप को फँसा कर संस्था की गरिमा को ही गिरा रहा है।

जिस तरह से विपक्ष में व्याकुलता है, और जिस लेवल का फ़्रस्ट्रेशन विरोधी विचारधारा के लोगों में दिखता है, इनका गिरोह चुनाव आयोग के साथ और भी क्रिएटिव माँग लेकर पहुँच सकता है। ये गिरोह यह भी कह सकता है कि मोदी सरकार ने जो भी विकास कार्य किए, वो तो भारत सरकार ने किए, अतः किसी पार्टी को उसका नाम गिनाकर वोट माँगने का हक़ नहीं होना चाहिए। चूँकि बाकी पार्टियाँ सत्ता से दूर थीं, तो वो विकास कार्य नहीं कर पाए, अतः मोदी और भाजपा को कैम्पेनिंग में भारत सरकार की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बताने पर मनाही होनी चाहिए।

चुनाव आयोग तो इस लाइन पर सोचने भी लगेगा कि बात तो सही है, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का मतलब तो यही होता है कि दोनों पक्ष के लोग एक ही मैदान में, एक ही तरह की गेंद से, उन्हीं नियमों के साथ, उन्हीं उपकरणों के साथ खेलें जो दोनों के पास हों। यहाँ तो एक पार्टी सत्ता में है, फ़ंड को ख़र्च किया है, सड़कें बनवाई हैं, जबकि दूसरी को तो मौका ही नहीं मिला। विपक्ष के गिरोह का तो यह भी दावा हो सकता है कि उन्हें बैटिंग का मौका ही नहीं मिला, तो वो रन बना ही नहीं पाए, अब तो बॉलिंग करेंगे तो हारना तय है। अतः, टॉस करके फ़ैसला करना उचित होगा। इसीलिए, खेल के संदर्भों को चुनावों में लाना कुतर्क कहा जाएगा, समझदारी नहीं।

चुनावों के समय मॉडल कोड ऑफ कन्डक्ट लगता है जिसमें पार्टियों के लिए कुछ मानक तय होते हैं कि आप क्या कर सकते है, क्या नहीं कर सकते। कोई नया विकास कार्य शुरु नहीं किया जा सकता, बोलते हुए सीधे तौर पर किसी जाति या समुदाय के लोगों से वोट की अपील नहीं की जा सकती, प्रचार के दौरान किसी को उकसाने वाली, हिंसा भड़काने वाली बातें नहीं की जा सकती आदि।

कुल मिलाकर यहाँ नैतिकता का एक दायरा बनाना होता है ताकि किसी को भी ग़ैरज़रूरी फायदा न मिले। सत्तारूढ़ पार्टी चुनावों के समय कहीं सड़कें आदि न बनवाए क्योंकि वोट देते समय व्यक्ति उससे प्रभावित हो सकता है। किसी भी समुदाय को उकसाने पर मनाही है, लेकिन कोई उकसा रहा है तो चेतावनी ही दी जा सकती है। ऐसा पहले भी खूब हुआ है, आज भी हो रहा है।

नैतिकता के तय मानक नहीं होते, संदर्भ में लोग इसे मोड़ देते हैं। चुनाव आयोग या तो हीरो बनने के चक्कर में अपनी फ़ज़ीहत करवाने पर उतारू है, या फिर उसे कई मामलों को समझने के लिए उचित समय नहीं मिल पा रहा। हाल ही में गुजरात के एक व्यक्ति ने अपने निकाह के कार्ड पर लोगों से गिफ्ट की जगह भाजपा प्रत्याशी को वोट देने की अपील की थी। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान लिया और उसे चेतावनी दी।

ये किस तरह की बात है? किसी ने कार्ड पर वोट देने की अपील की तो वो वोटरों को प्रभावित कर रहा है? फिर मैं अपने खाली समय में क्या कर रहा हूँ? मैं भी तो फेसबुक पर एक पार्टी और नेता को जितवाने की अपील कर रहा हूँ। फिर वो सौ, दो सौ और नौ सौ कलाकारों के साझा बयान क्या हैं? क्या उससे आम आदमी प्रभावित नहीं होता? बिलकुल होता है, क्योंकि नई सूचना आने से आप नए सिरे से सारी बातों की गणना करते हैं।

एक फिल्म से क्या प्रभाव पड़ता है? उस फिल्म को व्यक्ति एक बार देखेगा, जबकि रवीश कुमार, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी समेत तमाम टीवी चैनलों के एंकर टीवी पर ही नहीं, टीवी के बाहर भी लगातार सीधे तौर पर वोटरों को प्रभावित करते दिखते हैं। और यह सही है। हमारी विचारधारा अलग हो सकती है लेकिन समाज में ओपिनियन लीडर्स, या वैचारिक रूप से बेहतर लोगों की ज़िम्मेदारी होती है कि वो तथ्यों के साथ अपनी बात कहें, ताकि आम जनता एक सही फ़ैसला ले सके।

क्या चुनाव आयोग को नहीं लगता कि एक विचारधारा के लोग ज़्यादा हैं इस देश में और वो टीवी, फेसबुक, यूट्यूब से लेकर हर मीडिया संस्थान और विश्वविद्यालय तक फैले हुए हैं? तो क्या चुनाव आयोग अब यह बताता चले कि जितनी पार्टियाँ हैं, उसी अनुपात में चैनल हों, उनके कार्यक्रम हों, उनके विचार हों?

किसी फिल्म को रोक देना या किसी व्यक्ति का कार्ड पकड़ लेना एक छोटी-सी बात है। इससे चुनावी प्रक्रिया पर सांकेतिक प्रभाव भी नहीं पड़ता। इससे चुनाव आयोग खबरों में भले ही बना रहेगा लेकिन वो अपना ही नाम खराब कर रहा है। अगर किसी बात पर प्रतिबंध लगाना है, तो सही तर्क होने चाहिए। यहाँ तर्क के मामले में चुनाव आयोग फिसड्डी साबित हुई है।

आम आदमी हर वक्त चुनावों की चर्चा करता फिर रहा है। पान की दुकान से लेकर चाय के नुक्कड़ तक लोग इसी चर्चा में उलझे हुए हैं। लोगों को पढ़ कर और सुन कर लोग प्रभावित होते हैं, वोट देने की इच्छा बनाते हैं। फिर तो रॉलेट एक्ट टाइप का कोई कानून ले आए चुनाव आयोग या फिर माइनोरिटी रिपोर्ट टाइप इंटेलीजेंट सिस्टम की व्यवस्था करे जहाँ आदमी के किसी कार्य को करने से पहले ही उसे रोका जा सके!

लोकतंत्र में मीडिया का एक बहुत बड़ा रोल होता है। उसकी भूमिका हर नई तकनीक के साथ व्यापक होती जाती है। अगर विवेक ओबरॉय वाली फिल्म के निर्माता किसी वेब प्लेटफ़ॉर्म से सौदा करते हुए उसे सीधे मोबाइल फोन पर उतार दें, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा? अगर पायरेटेड कॉपी लीक कर दी जाए, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा?

अगर ऐसी फ़िल्में प्रोपेगेंडा ही हैं, तो टीवी चैनलों के एंकर जो कर रहे हैं, क्या वो प्रोपेगेंडा नहीं है। हर रात चालीस मिनट तक सरकार की हर योजना को बेकार बताना भी प्रोपेगेंडा ही है। आखिर चुनाव आयोग इसके लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का निर्धारण करेगा कैसे? क्या मीडिया संस्थानों के लिए कोई तय क़ायदा है जहाँ चुनाव आयोग सुनिश्चित कर सके कि इतने मिनट इस पार्टी की रैली, और इतने मिनट इस पार्टी की रैली कवर की जाएगी?

चुनाव आयोग ने मधुमक्खी के छाते में हाथ डाला है। प्रश्न बहुत सारे हैं, और उनके पास उत्तर होंगे नहीं। उत्तर इसलिए नहीं होंगे क्योंकि चुनाव आयोग में बैठा जो व्यक्ति इस तरह के आदेश देता है, या तर्क गढ़ता है, वो कहीं अकेला बैठा हुआ प्रतीत होता है। चुनाव आयोग जबरदस्ती का अपने आप को निष्पक्ष दिखाने के चक्कर में कुछ भी करता दिख रहा है। जबकि, उसे ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चुनाव आयोग का कार्य सही तरीके से चुनाव कराना है, न कि इस तरह के तर्क गढ़ना जो कि तार्किकता के पैमाने पर दो सेकेंड नहीं ठहर पाते।

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