कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद की हु-तू-तू: लाखों मधुमक्खियाँ भी अपनी रानी चुनने में इतने नखरे नहीं करतीं

राज्य के नेताओं, विधायकों, सांसदों और संगठन के पदाधिकारियों से राय लेने के बाद (जैसा कि राहुल गाँधी चाहते हैं) और कई दिनों की मैराथन बैठकों के बाद कहीं कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी सोनिया गाँधी को ही आखिरी फैसले के लिए न अधिकृत कर दे।

नेहरू-गॉंधी परिवार में ही आलाकमान की मूरत देखने की आदत ने कॉन्ग्रेस को अंदर से इतना खोखला कर दिया है कि वह अपना अध्यक्ष नहीं चुन पा रही है। बीते दिनों पार्टी ने ऐलान किया था कि 10 अगस्त को वह अपना नया अध्यक्ष चुन लेगी। लेकिन, कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक शुरू होने से पहले ही तमाशा शुरू हो गया।

खबर आई कि राहुल की इच्छा का सम्मान करते हुए पार्टी के पॉंच-पॉंच नेताओं की समिति बनेगी जो सभी राज्यों के प्रतिनिधियों से बात कर नया नेता चुनेगी। फिर बैठक शुरू हुई। कुछ देर बाद सोनिया गॉंधी अपने बेटे राहुल के साथ बाहर आईं और पत्रकारों से कहा ‘हम (सोनिया और राहुल) सहमति बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होंगे, इसलिए जा रहे हैं।’ थोड़ी देर बाद बैठक से लोकसभा में पार्टी संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी बा​हर निकले और कहा कि रात आठ बजे फिर से बैठक होगी और उम्मीद है कि नौ बजे तक पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव हो जाएगा।

देश की सबसे पुरानी पार्टी में अध्यक्ष पद पर इतनी माथापच्ची तब हो रही है जब राहुल गॉंधी ने लोकसभा चुनाव के नतीजों के तत्काल बाद इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। मान-मनौव्वल से भी वे नहीं माने और तीन जुलाई को अपना इस्तीफा सार्वजनिक कर दिया। इसके बाद वयोवृद्ध मोतीलाल वोरा को अंतरिम अध्यक्ष बनाने की खबर आई जिसे वोरा ने खुद नकार दिया।

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इस बीच, शशि थरूर, कर्ण सिंह और कैप्टेन अमरिंदर सिंह जैसे नेताओं ने प्रियंका गाँधी को अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत की। यह दिखाता है कि कॉन्ग्रेस का कोई बुजुर्ग नेता हो या युवा, सभी गाँधी परिवार के पाश में ही जकड़े रहना चाहते हैं। मुंबई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे मिलिंद देवड़ा ने राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट या मध्य प्रदेश स्थित ग्वालियर के राजघराने से आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को अध्यक्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त बताया था। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में मुकुल वासनिक को आगे बताया गया क्योंकि उनका प्रशासनिक अनुभव अच्छा है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कॉन्ग्रेस ख़ुद को भाजपा के ‘शहजादा’ वाले हमले से बाहर निकालने की कोशिश में आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर यह दिखावा कर रही है?

अनुच्छेद 370 से लेकर अन्य मुद्दों तक, पार्टी के बड़े नेतागण भी बँटे से नजर आए। राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद भाजपा ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को ख़त्म करने सहित अन्य बिल पारित करा लिए। क्या इस बदले हालत में प्रियंका गाँधी जिम्मेदारी लेने से बच रही हैं?

सार्वजनिक प्लेटफॉर्म्स पर कॉन्ग्रेस नेता चाहे जितने सुझाव दे रहे हों लेकिन बैठकों का दौर चलने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पा रहा है। कॉन्ग्रेस की इस हु-तू-तू में ऐसा लग रहा है जैसे यह प्रक्रिया कभी ख़त्म ही नहीं होगी। इससे कम समय में तो लाखों मधुमक्खियाँ मिल कर अपनी रानी चुन लेती है, जितना समय कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी के इस्तीफे पर विचार करने में गँवा दिया। कॉन्ग्रेस की हालत आज मधुमक्खी के छत्ते से भी बदतर हो गई है।

कुछ ख़बरें ऐसी भी हैं कि आज अंतिम निर्णय न होने पर मैराथन बैठकों का दौर कल भी जारी रहेगा। थरूर ने ट्वीट कर सलाह दी है कि पार्टी पहले एक अंतरिम अध्यक्ष चुन ले और इसके बाद एक वृहद प्रक्रिया के तहत नया अध्यक्ष चुना जाए। उन्होंने कॉन्ग्रेस कार्यसमिति के चुनाव के लिए भी यही प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा है कि वर्किंग कमिटी ने एक मत से राहुल गाँधी को अध्यक्ष बने रहने के लिए निवेदन किया लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे। सुरजेवाला ने बताया कि वर्किंग कमिटी ने राहुल को अध्यक्ष बने रहे और पार्टी को ‘नेतृत्व और मार्गदर्शन’ देना जारी रखने को कहा। बकौल सुरजेवाला, आज जब सरकार सारी संवैधानिक संस्थाओं को कब्जे में ले रही है, कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं को लगता है कि राहुल गाँधी इस ‘कठिन समय’ में इकलौते नेता हैं जो विपक्ष का चेहरा बन सकते हैं। सुरजेवाला के अनुसार, राहुल ने इस्तीफा वापस लेने से मना करते हुए कहा है कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर काम करते रहेंगे।

कॉन्ग्रेस के नेता जिस तरह मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी राय दे रहे हैं, पार्टी को एक ऑनलाइन मीटिंग ही बुला लेनी चाहिए, जिसका लाइव प्रसारण भी हो। लगता तो ऐसा ही है कि कॉन्ग्रेस की बैठकों में ये नेता अपनी राय नहीं रख पाते, तभी तो पार्टी के आंतरिक मुद्दों पर भी सोशल मीडिया से माध्यम से ही अपनी राय शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचाते दिख रहे हैं। सिद्धू ने इस तरीके को इतने जोर-शोर से आजमाया की कैप्टेन ने उन्हें मंत्रिमंडल से उखाड़ फेंका। अब देखना यह है कि राज्य के नेताओं, विधायकों, सांसदों और संगठन के पदाधिकारियों से राय लेने के बाद (जैसा कि राहुल गाँधी चाहते हैं), कहीं कॉन्ग्रेस कार्यसमिति कई दिनों की बैठकों के बाद नए अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए अंत में सोनिया गाँधी को ही न अधिकृत कर दे।

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