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सजदे में झुकती महिलाओं के स्तन से पैंटी के रंग बताने तक मजहबी नेता काफी आगे आ गए हैं

जिन्हें आपको वोट देना है, वो देंगे ही क्योंकि पैंटी के रंग बताने वाली जाहिलियत भी अपने आप में वैसी ही क़ाबिलियत है जैसे काफ़िरों को मारने के लिए 'वो तीन शब्द' कहते हुए कोई इस्लाम के नाम पर खुद को बम से उड़ा देता है।

हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी ने महिलाओं की एंट्री बंद होने के संदर्भ में एक दलील दी थी कि वहाँ सजदे में झुकती महिलाओं के स्तन दिख जाते हैं, इसलिए उन्हें प्रवेश देना गलत है। ये बात और है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि दरगाह पर जो मर्द जाते हैं, वो औरतों के स्तन को क्यों देखते हैं। ट्रस्टी साहब ने यह भी नहीं बताया कि ये उनके निजी विचार थे या ट्रस्ट के बाकी मेंबरान भी स्तनखोजी प्रवृति के थे।

ट्रस्टी साहब ने यह भी नहीं बताया इस निर्णय तक पहुँचने के लिए उन्होंने अपनी खोजी निगाहों को ही आधार बनाया था या कोई सर्वेक्षण किया था जिसमें क़रीब 83% मर्दों ने स्वीकारा कि वो दरगाह में स्त्रियों के स्तन देखने आते हैं। ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ था, ये ट्रस्टी साहब के निजी उद्गार ही थे। मुझे याद है कि इस पर कोई बवाल नहीं हुआ था क्योंकि ट्रस्टी भी मजहब विशेष से, हाजी अली भी मजहब विशेष से, महिलाओं पर प्रतिबंध लगा, वो भी अधिकतर मजहब विशेष से हैं।

समुदाय का आदमी कुछ भी बोलता है, उस पर मीडिया में आउटरेज नहीं होता। यह दूसरी सबसे बड़ी आबादी होकर भी अल्पसंख्यक है, वह बाय डिफ़ॉल्ट सेकुलर है, बाय डिफ़ॉल्ट सेकेंड क्लास सिटिज़न है, बाय डिफ़ॉल्ट बहुसंख्यक आबादी का सताया हुआ है, वह मोदी राज में डर कर जीता है, और यह कह कर बच निकलता है कि जया प्रदा की पैंटी का रंग क्या है।

मजहब के नेता हैं आज़म खान। जब मैं ‘मजहब के नेता’ कहता हूँ तो मेरे शब्द का बिलकुल वही अर्थ है क्योंकि मजहब के नेता मजहबी आबादी के ही नहीं, अपने क्षेत्र के नहीं, अपने राज्य या देश के भी नहीं, वो कौम के नेता हो जाते हैं। वो समाज, गाँव, ज़िला, क्षेत्र, राज्य और देश की परिभाषाओं से कहीं ऊपर, पूरे इस्लाम के लिए नेता हो जाते हैं। वो जब बात करते हैं तो मजहब के हक़ की बात करते हैं, वो जब बात करते हैं तो मजहब के लिए बातें करते हैं, वो जब बात करते हैं तो उनके हर वाक्य में इस्लाम सहज रूप से अभिव्यक्त होता है।

इसमें गलत क्या है? गलत कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि जब वो बेहूदगी करेंगे तो वो भी पूरे इस्लाम के सर ही मढ़ा जाएगा क्योंकि तथाकथित अच्छे ‘सेक्युलर लोग’ इन बातों पर मौन रहना पसंद करते हैं। जब आप अपने आप को सारे मजहब का नेता मान कर, उनका नेतृत्व करने निकलते हैं, और भीड़ में किसी प्रतिद्वंद्वी या विपक्ष की पार्टी के प्रत्याशी के बारे में टिप्पणी करते हुए उसके अंडरवेयर तक पहुँचते हैं तो मैं बिम्ब और संदर्भ नहीं देख पाऊँगा, मैं आपके ठरकपन, आपकी मूर्खता और आपके सड़े हुए विचारों को शब्दशः देखूँगा और याद दिलाऊँगा कि आपकी सोच कितनी गिरी हुई है।

सत्ता से दूर और लगातार क्षेत्र की आबादी द्वारा नकारे जाते हुए आज़म खान जब ‘उर्दू गेट’ के गिराने को इस्लाम पर हुए अतिक्रमण से जोड़ सकते हैं, तो उनकी बेहूदगी किसी की पैंट से पैंटी और ब्रा तक ही नहीं रुकेगी। ये देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में मजहब के महान नेता आज़म खान अंतःवस्त्रों के रंग से नीचे उतरते हुए जननांग और स्तनों के कप साइज से मजहब की भीड़ का ज्ञानवर्धन किस महिला का नाम लेकर करेंगे।

भीड़ के सामने पोस्टर पर अखिलेश और मायावती की बड़ी तस्वीरें थीं, आज़म खान ने टोपी और चश्मा लगा कर अपनी ज़हीन शख़्सियत को आगे करते हुए कहा कि कैसे उन्होंने इस व्यक्ति (जया प्रदा) को रामपुर की गलियों तक का ज्ञान कराया, कैसे उन्होंने किसी को उनके नज़दीक नहीं आने दिया, गंदी बातें नहीं करने दी। उन्होंने बताया कि लोग राजनीति में कितना नीचे गिर जाते हैं। फिर उन्होंने बताया कि जया प्रदा के अंडरवेयर का रंग ख़ाकी है।

एक पैराग्राफ़ बोलते हुए, इस लम्पट आज़म खान ने स्वयं ही यह भी कहा कि राजनीति में लोग कितने गिर जाते हैं, और वो खुद ही रंग बताते हुए बहुत नीचे गिर गए। उन्होंने स्वयं कहा कि जया के पास भी किसी को आने नहीं दिया, छूने नहीं दिया, गाली देने नहीं दिया किसी को, और फिर अंत में स्वयं ही ऐसी बात कह दी कि पहले की बातें बेकार साबित हो गईं।

ये कौम के पढ़े-लिखे नेता हैं। ये रामपुर के नहीं, यूपी के नहीं, भारत के नहीं, मजहब के नेता हैं। ये मैं पहले भी कह चुका हूँ, और बार-बार कहूँगा। ये मैं तब तक कहूँगा जब तक कि ऐसे लोग साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करते हुए, हिन्दू बनाम मजहब विशेष की राजनीति करेंगे और ‘शांतिप्रिय’ और उनके हिमायती बस यह सोच कर मुँह बंद रखेंगे क्योंकि वो मजहबी है इसलिए उसे मुँह से विष्ठा करने की आज़ादी है।

आप राजनीति में मर्यादा खोजते हैं, आप उस गठबंधन का हिस्सा बनते हैं जो महिला सशक्तिकरण की बात दिन में दस बार यह कह कर करता है कि मोदी ने बीवी को छोड़ रखा है, और माँ से मिलने नहीं जाता। फिर आपके मन में महिलाओं की इतनी इज़्ज़त है कि आप अपनी जाहिलियत पर ठीक तरीके से उतरें तो अंडरवेयर का रंग क्या, उसके भीतर भी प्रवेश कर सकते हैं।

और, ग़ज़ब की बात तो यह होगी कि आपका समाज, आपको मजहब का नेता कहने वाले, आपको स्वीकारने वाले लोग तब भी यही सोच कर खुश होते रहेंगे कि विरोधी को नंगा किया, बहुत अच्छा किया। फिर आपका समाज क्यों पिछड़ा नहीं रहेगा? फिर आपके समाज से मात्र एक प्रतिशत लड़कियाँ ही ग्रेजुएशन क्यों नहीं करेंगी? फिर आपके समाज से ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी वाहियात प्रथाओं को मौन ही नहीं, मुखर सहमति क्यों नहीं मिलेगी?

आपकी कुंठा इसी तरीके से तो शांत होती है कि किसी ने एक हिन्दू स्त्री के अंतःवस्त्र का रंग बता कर उसे पूरी रैली में ज़लील किया। आपकी कुंठा प्रत्याशी की पार्टी के नाम लेने, सामाजिक मुद्दों को गिनाने, क्षेत्र के पिछड़ेपन पर चर्चा करने से शांत नहीं होती, आपकी कुंठा तब शांत होती है जब आप किसी के बारे में ऐसी बेहूदी बातें पब्लिक में कहते हैं, और पब्लिक तालियाँ बजाती हैं।

बाहरहाल, आज़म खान जी, अपनी परवरिश, अपनी मरी हुई माताजी (जिसकी कसम आपने उसी आधे मिनट में खाई), अपने क़ौम और अपनी पार्टी का नाम इसी तरह रौशन करते रहिए। जिन्हें आपको वोट देना है, वो देंगे ही क्योंकि ये बेहूदगी भी अपने आप में वैसी ही क़ाबिलियत है जैसे काफ़िरों को मारने के लिए ‘वो तीन शब्द’ कहते हुए कोई इस्लाम के नाम पर खुद को बम से उड़ा देता है।

इसलिए, आपकी जाहिलियत को क़ाबिलियत मान कर वाह-वाही मिलती रहेगी। इसे भी डिस्कस नहीं किया जाएगा जैसे आप ही के मजहबी भाई और पार्टी के नेता फ़िरोज़ खान की टिप्पणी पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। मुझे लगता है कि आपके इलाके का इस्लाम और वहाँ की इस्लामी आबादी बिलकुल सही हाथों में है क्योंकि अगर वो ऐसी बातों पर ताली पीटते हैं, तो वो आप जैसे चिरकुट और लम्पटों को ही डिजर्व करते हैं। लगे रहिए। आपके मुँह से, किसी और सभा में, किसी प्रत्याशी की सलवार के नाड़े या ब्रा के कप साइज के बारे में नए शोध के इंतज़ार में पूरा हिन्दुस्तान है।

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अजीत भारती
अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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