फ़्री-लान्स विरोधकर्मी से ऑन-डिमांड-एथीस्ट बनने वाली वामपंथन से नाराज हुए मार्क्स चचा

जब तक ये क्रांतिजीव JNU जैसे संस्थान में फ़्रीलांस और 'आजाद' प्रोटेस्टर के रूप में पहचानी जाती है, तब तक ये वामपंथी स्वरुप में रहती है, ये JNU में रहते वक़्त 'अकेली, आवारा और आजाद' है, लेकिन जम्मू कश्मीर पहुँचते ही हिजाब और बुर्क़े में नजर आती हैं।

‘दास कपिताल’ और कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखकर धर्म को अफीम बताने वाले कार्ल मार्क्स आज कैसा महसूस करते, जब वो देखते कि वर्तमान क्रांतिजीव कम्युनिस्ट खुद मार्क्सवाद और वामपंथ को एक कट्टर धर्म के रूप में ग्रहण कर चुके हैं और ऐसा कर के उनसे माफ़ी भी नहीं माँग रहे हैं।

आज के वामपंथी को अगर ध्यान से दो मिनट देखें, तो वो सर से  पाँव तक विचारों में नहीं बल्कि घृणा में लिप्त नजर आता है। उसके शरीर में उतनी अस्थियाँ नहीं, जितनी उसके भीतर निराशा समाई हुई है। यह ऐसी निराशा है, जिसके बारे में वामपंथ के प्रणेता तक विचार नहीं कर सके थे। इन्होंने पूर्वज आर्यों और अनार्यों की थ्योरी में सारा समय खपाया है। आर्यों को विदेशी सिद्ध करने में ही अपनी सारी बौद्धिक शक्ति झोंक दी है। ऐसा करते करते आज वामपंथ अपनी आखिरी साँसें गिन चुका है और अब जो यहाँ-वहाँ क्रांतियों की ‘चॉइस’ रखने वाले क्रांति के चितेरों में नजर आती है, वो सिर्फ दम तोड़ते वामपंथ की छटपटाहट मात्र है।

धरना प्रदर्शन के लिए किराए पर उपलब्ध आज का बौद्धिक दरिद्र कम्युनिस्ट असल मुद्दों से नहीं बल्कि घृणा से उपजने वाली विचारधारा पर तंदुरुस्त हो रहा है। आप देखिए कि यह सुबह नाश्ते में ब्राह्मणवाद को गाली देता है, सोते वक़्त पितृसत्ता को गाली देता है और उसके बाद ही स्वस्थ महसूस कर पाता है। क्या क्रांतिजीव के सुबह से शाम तक के दैनिक क्रियाकलाप के बीच में वामपंथ के मुद्दे के लिए कहीं जगह बचती भी है? या असल सवाल शायद तब ये होना चाहिए कि क्या वामपंथ में वाकई में कोई मुद्दा रह भी गया है?

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मुद्दों के अभाव में अपना अस्तित्व बचाए रखना कम्युनिस्ट्स का सबसे बड़ा चैलेंज बनकर उभरा है। इसलिए अब जो वामपंथ के नाम पर सुनाई और दिखाई देता है वो सिर्फ वामपंथ का ‘हाइब्रिड वर्जन’ है। यह वामपंथ भी ‘ऑड’ और ‘इवन डेज़’ के कॉन्सेप्ट पर काम करने लगा है। इस ऑड-इवन फॉर्मूला का सबसे ताजा मामला उभरा है, वो है मुस्लिम समुदाय की किराए पर धरना-प्रदर्शन करने वाली वामपंथी JNU दुराग्रही शेहला राशिद!

2018 में सिंगर सीनिड ओ कोनोर के इस्लाम अपनाने पर जमकर उनका स्वागत करने वाली कम्युनिस्ट और ऑन डिमांड नास्तिक, शेहला राशिद अब अल्लाह के नाम पर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने से पहले वामपंथियों से माफ़ी माँगेगी?

क्या JNU की ऑन डिमांड कम्युनिस्ट शेहला राशिद आज ये स्वीकार करेंगी कि खुद को राजनीति के लिए आस्तिक बताने के उनके बयान ने अपने घोषणापत्र, यानि मेनिफेस्टो में धर्म को वामपंथ की परिधि से बाहर करने वाले कार्ल मार्क्स की आत्मा को ठेस लगाई है? जय श्री राम कहने वाले आस्तिक हिन्दुओं और वन्देमातरम के नारे लगाने वाले देशभक्तों को हेय दृष्टि से देखने वाला क्रांतिजीव कम्युनिस्ट, क्या अल्हम्दुलिल्लाह कहने वाली शेहला को अब स्वीकार करेगा? सवाल और भी हैं। आत्मचिंतन जैसे शब्दों का अभाव ऐतिहासिक कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में आज भी बना हुआ है। कम्युनिस्ट शायद इसीलिए ऐतिहासिक गलतियाँ करते आए हैं और करते रहेंगे।

JNU के इस ताजा फ्रीलांस प्रोटेस्टर यानि शेहला राशिद की कार्य प्रणाली को समझना एक पेचीदा मसला बन चुका है। इसे समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि ये अक्सर अपने प्रोपेगैंडा की चॉइस के कारण किए गए सस्ते प्रचार अभियानों की वजह से सफलतापूर्वक राष्ट्रीय सनसनी भी बनकर उभरी है। देखा जाए तो राजनीतिक हालातों के बीच यह कम्युनिस्ट ‘जिओ-टैगिंग’ आधारित प्रणाली पर काम करती है। यानि, जब तक ये क्रांतिजीव JNU जैसे संस्थान में फ़्रीलांस और ‘आजाद’ प्रोटेस्टर के रूप में पहचानी जाती है, तब तक ये वामपंथी स्वरुप में रहती है, लेकिन जैसे ही इसके अक्षांश और देशांतर बदलते हैं, ये भूल जाती हैं कि धर्म जैसी चीजों को वामपंथ नकारता है, यही JNU की फ़्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद के साथ भी होता दिख रहा है। ये JNU में रहते वक़्त ‘अकेली, आवारा और आजाद’ है, लेकिन जम्मू कश्मीर पहुँचते ही हिजाब और बुर्क़े में नजर आती हैं।

शेहला राशिद ने हाल ही में ‘समाज सेवक’ शाह फैज़ल की पार्टी ‘जम्मू एंड कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट’ में अपना दाखिला ले लिया है। फिर भी यदि उनसे उम्मीद की जा रही है कि वो अपने ईश्वर/अल्लाह का नाम ना लें, तो यह सरासर शेहला की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर कुठाराघात करने जैसा होगा। जिस तरह से उन्होंने इस पार्टी को जॉइन करने के कुछ ही दिन के भीतर वामपंथ की ‘एथीस्ट’ (नास्तिक) विचारधारा से फ़ौरन नकारा है, उससे तो यही साबित होता है कि शेहला राशिद के भीतर एक शातिर नेता बनने की पूरी क़ाबिलियत है।

लेकिन खुद को आस्तिक यानी पारलौकिक सत्ता में विश्वास जताने वाला बताकर शेहला राशिद ने JNU और ‘टाइप-JNU’ जैसे कई युवाओं के दिल को गहरा आघात लगाया है और उनके सपनों पर खुलकर लात मारी है। ये आघात ज्यादातर ऐसे युवाओं को लगा है, जिनके भविष्य में राजनीति में जाने के बहुत ज्यादा चांसेज़ और स्कोप नहीं हैं और जो सिर्फ क्रांति की रोजी-रोटी और जीवन पर्यन्त सत्ता का सताया ‘एज़ फ्रीलांस प्रोटेस्टर’ कार्यरत रहकर जीवन यापन का स्वप्न पाले बैठे थे। ऐसे ‘आम वामपंथियों’ को कोई सत्ता का सताया हुआ शाह फैज़ल भी अपनी पार्टी जॉइन करने का निमंत्रण नहीं देने वाला है, वो ये बात खूब जानते हैं।

हालाँकि, शेहला राशीद द्वारा दिया गया हृदयाघात वामपंथी युवा के जीवन की पहली ऐसी घटना नहीं है। इसी तरह का ‘सिमिलर’ हृदयाघात आखिरी बार अभागे कम्युनिस्ट्स को उनके नए नवेले राजकुमार कन्हैया ने स्वयं को भूमिहार बताकर दिया था। इसके बाद चारा घोटाले से ‘लेस’ लालू के पाँव छू कर ‘फासिस्ट’ सरकार से बदला लेने का संकल्प लेने वाले कन्हैया कुमार ने नव-वामपंथियों के लिए वामपंथ की नई लकीर खिंच डाली थी। अभागे नव-क्रांतिजीव ने तब तक अपने फेसबुक अकाउंट से ठीक से मार्क्सवाद और कम्युनिज़्म के पोस्ट भी पूरे नहीं पढ़े थे, ना ही नव-क्रांतिजीव के तब तक दूध के दाँत टूटे थे। लेकिन वो वापमंथी ही क्या जिसकी पूँछ सीधी हो जाए, उसे तो बस क्रांति से मतलब है।

शेहला रशिद द्वारा खुद को आस्तिक बताए जाने के बाद नव-क्रांतिजीव इस ‘हाइब्रिड वामपंथ‘ अवतार से आशावान महसूस कर रहा है। वो चाहता है कि कार्ल मार्क्स आज दुबारा धरती पर अवतार लेकर एक पन्ना और जोड़ दे, जिसमें लिखा हो कि राजनीति का स्वप्न देखने वाले वामपंथियों के लिए देश, काल और वातावरण के अनुसार ऑन डिमांड आस्तिक बनना स्वीकार्य होगा।

मार्क्सवाद खालिस अर्थशास्त्र से पैदा होकर एक अलग धर्म बनकर तैयार हुआ है। ये कूप-मंडूक कम्युनिस्ट मार्क्सवादी किसी कट्टरपंथी मजहबी से भी ज्यादा उच्चकोटि के कट्टरपंथी हैं। खुद को विचारों का पुरुष सूक्त (पुरुषसूक्त, ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह) मानने वाले वामपंथ की यह वैचारिक मृत्यु दयनीय है। वामपंथ खुद को तार्किक बताता फिरता है, उसने अन्धविश्वास से अपने हर संबंध को हमेशा नकारा है। लेकिन आज देखने को मिलता है कि आज क्रांतिजीव को वाद-विवाद, तर्क, अर्थशास्त्र, विज्ञान कुछ नहीं चाहिए, उसे अगर कुछ चाहिए तो सिर्फ क्रांति! यही क्रांति इसका धर्म है, यही कट्टरता ही इसका स्वभाव है और मौकापरस्ती ही इसका ‘-इज़्म’ है।  

आज नहीं तो कल किसी भी उग्र, हिंसक विचार का अंत सुनिश्चित है। वामपंथ का महज कुछ सदियों में अस्त हो जाना किंचित भी अस्वाभाविक और गैर प्राकृतिक नहीं है। शेहला राशिद के गिरगिट-ओ-लॉजी से आज कट्टर वामपंथी स्वयं को कोड़े मार रहा है। वो इसलिए स्वयं को कोड़े मार रहा है क्योंकि मार्क्स की दृष्टि में ईसाइयत का ईश्वर भी अंधविश्वास था। मार्क्स का मानना था कि अंधविश्वास से ठगी और शोषण होता है और इसी संदर्भ में उसने ईश्वर को अफीम कहा था।

किसी विचार के बजाए घृणा और नफरत से जन्मे ‘-वादों’ का दुखद वर्तमान यह है कि स्वयं को सही साबित करने के लिए हर दूसरे शब्द के बाद ‘JNU जैसे संस्थान’ का हवाला देने वाले कुतर्की कम्युनिस्ट अपनी भारत विरोधी टिप्पणियों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हैं। लेकिन दूसरे पक्ष के सही और संवैधानिक तथ्य को भी ‘लोकतंत्र की हत्या’ और ‘थोपा जाना’ बताते हैं। इन्हें देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम चुनाव जीतने का हथकंडा लगता है। इन्हें देशभक्ति अस्वाभाविक और मूर्खों का आचरण नजर आता है, राष्ट्रगान गाना असहिष्णुता लगता है। नव-कम्युनिस्ट का मानना है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता की निष्ठा अपरिहार्य होना ‘हायपर नेशनलिज़्म’ है।

इस वर्तमान क्रांतिजीव की हालिया गतिविधियों के तार अगर एक सिरे से जोड़ते हुए देखा जाए, तो पता चलता है कि ये कोई विद्यार्थी या नेता या समाजवादी नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ एक शहरों में रहने वाला अनपढ़, कूप-मण्डूक, गतानुगतिक है, जिसे किसी भी हाल में क्रांति की तलाश थी और समय आने पर उसने अपनी क्रांति को परिभाषित भी कर डाला है, जिसका उदाहरण ऑन डिमांड आस्तिकता वाले लोग हैं। इनको ही ध्यान में रखते हुए हरिशंकर परसाई जी कह गए थे कि “तुम क्रांतिकारी नहीं, बल्कि तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो

चाहे राजनीतिक परिदृश्य कुछ भी हों, क्रांतिजीवों के विषय चाहे नरेंद्र मोदी से लेकर पितृसत्ता तक ही क्यों न घूमते रहें, कुछ सवाल वामपंथियों से हमेशा किए जाते रहने चाहिए; मसलन, कम्युनिस्ट गाँधी का विरोध क्यों करते रहे? क्रांति के नाम पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का समर्थन क्यों नहीं किया गया? उन्हें 1857 को स्वाधीनता संग्राम मानने में समस्या क्यों होती है? नरेंद्र मोदी के ‘फासिज़्म’ और इंदिरा गाँधी के आपातकाल में क्या समानताएँ हैं?

वर्चस्व की इस उग्र विचारधारा का इतिहास ये है कि भारतीय कम्युनिस्ट समाजवाद को हमेशा से ही अपना पेटेंट मानते आए हैं। ऐसा भी समय आया जब 1934 में उन्होंने कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को ‘सोशल फासिस्ट’ बताया। भूत, भविष्य और वर्तमान के इन सभी उदाहरणों से वामपंथ का कलेक्टिव निष्कर्ष यही निकलता है कि उनकी हाँ में हाँ का स्वर रखने वाला ही क्रांतिकारी कहलाए जाने के योग्य होगा और यदि उसी समकालीन परिदृश्य में जो उसी के सामान नया विचार और तथ्य रखे, वह फासिस्ट!

फासिस्ट शब्द पिछले कुछ वर्षों में खूब भुनाया गया है। JNU से लेकर मीडिया गिरोहों के जरिए फासिस्ट शब्द को प्रमुख और प्रिय गाली का दर्जा दिया गया। इन्हीं ‘हाँ में हाँ’ ना मिलाने वाले समीकरणों के अंतर्गत मोदी सरकार को भी समय समय पर फासिस्ट घोषित किया जाता रहा है, और राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बात करने वालों को मूर्ख कहा जाने लगा। यह प्रदर्शनकारी वामपंथी दूसरे की प्रतिक्रिया और दूसरे की अभिव्यक्ति से घबराता क्यों है?

इसी तरह समय बीतता गया और एक दिन अल्हम्दुलिल्लाह स्वर ‘हर हर महादेव’ और ‘जय श्री राम’ उद्घोषों पर भारी पड़ गया, क्योंकि अल्हम्दुलिल्लाह का स्वर JNU के मतावलम्बियों के श्रीमुख से निकला है। उम्मीद जताई जा सकती है कि शेहला राशिद के धार्मिक और राजनीतिक ट्वीट्स के बाद अब हिन्दुओं का खुद को आस्तिक बताना उन्हें साम्प्रदायिकता नहीं ठहराएगा। उम्मीद है कि अब जय श्री राम का नारा हिन्दुओं को ‘सभ्य वामपंथियों’ की नजरों में घृणित नहीं बनाएगा।


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