वैश्विक मंदी में भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास की गति बनाए रखना मोदी सरकार की सफलता

पिछले साढ़े पाँच वर्षों में तुलनात्मक रूप से महँगाई नहीं बढ़ी है और मुद्रास्फीति न केवल नियंत्रण में रही है, बल्कि वर्ष 2014-15 के 5.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2018-19 में केवल 3.4 प्रतिशत रह गई है।

वैश्विक मंदी को लेकर दुनियाभर में उथल-पुथल है। भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। यद्यपि पिछले साढ़े पाँच सालों में भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की मोदी सरकार की सफल नीतियों के कारण अन्य देशों की तुलना में भारत इसके प्रभाव से निपटने में सक्षम है। सरकार के वित्तीय, कर, बैंकिंग व संस्थागत सुधारों का सुखद परिणाम यह है कि आर्थिक समीक्षा 2018-19 के वर्ष 2019-20 में अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान है। 

आश्चर्यजनक बात यह है कि दुनिया के बड़े देश मंदी से कराह रहे हैं, जबकि वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ने का अनुमान लगा रही हैं। तो इसका आधार क्या है? केंद्र की मोदी सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को जो गति प्रदान की गई है, वह ऐतिहासिक है। यह केंद्र सरकार की सफल आर्थिक व मौद्रिक नीतियों का ही परिणाम है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्व आर्थिक आउटलुक (डब्ल्यूईओ), जुलाई 2019 की अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार विश्व अर्थव्यवस्था एवं ईएमडीई में 0.4 प्रतिशत बिंदु की मंदी के अनुमान के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। 

यद्यपि वैश्विक मंदी से उपजे हालात का प्रभाव भारत पर भी कुछ पड़ा है, पर कुछ राजनीतिक दलों ने निहित स्वार्थ के वशीभूत मंदी के वास्तविक प्रभाव का आंकलन करने के बजाय दुष्प्रचार करके भय का वातावरण उत्पन्न करना प्रारंभ कर दिया है। जबकि केंद्र सरकार इस वैश्विक घटना को लेकर न केवल सचेत है, बल्कि त्वरित व तत्पर कदम उठाकर यह प्रयास किया है कि मंदी का असर भारत की जनता, अर्थव्यवस्था और उद्योग जगत पर न पड़े।

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इसी क्रम में देश की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने हाल ही उपायों की घोषणा की है। इससे पूर्व बैंकिंग सुधार व सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय करके 27 के स्थान पर 12 राष्ट्रीय बैंक रखने तथा इन बैंकों को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने का निर्णय महत्वपूर्ण है। सरकार का यह कदम न केवल 5 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के संकल्प को पूरा करने में सहायक होगा, बल्कि वर्द्धित चालू खाता व बचत खाता एवं अधिक जनसंपर्क होने के कारण अर्थव्यवस्था व जनता दोनों के लिए लाभदायक होगा। 

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में यदि निवेश जारी रहता है तो मंदी से उतना चिंतित होने की आवश्यकता नहीं होती। सरकार द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति की समीक्षा कर कोयला क्षेत्र में कोयले की बिक्री हेतु शत प्रतिशत एफडीआई, कोयला खनन के लिये स्वचालित मार्ग के अंतर्गत संबद्ध प्रसंस्करण अवसंरचना सहित गतिविधियों से सक्षम प्रतिस्पर्धी बाजार निर्माण कर अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने का कदम लाभदायक होगा। 

संविदा के माध्यम से विनिर्माण में स्वचालित मार्ग के अंतर्गत एफडीआई की अनुमति न केवल इस क्षेत्र के विकास में सहायक हो रहा है, बल्कि मेक इन इंडिया के लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान दे रहा है। सरकार एकल ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिये स्थानीय सोर्सिंग मानकों को आसान बनाकर आधार वर्ष में अधिक निर्यात की पृष्ठभूमि तैयार करके अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित कर रही है।

अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता के लिए उठाए गए इन कदमों के कारण भारत मंदी से उतना प्रभावित नहीं हुआ, जितना कि अन्य विकसित और बड़े देश हुए हैं। देश के बाजार को थामने के लिए सरकार ने जो 5 लाख करोड़ रुपए की चल निधि जारी करने के लिए सार्वजनिक क्षे़त्र के बैंकों में अग्रिम 70 हजार करोड़ रुपए डालने का निर्णय लिया है, वह कॉरपोरेट, खुदरा ऋण ग्राहियों, मध्यम व लघु क्षेत्र के उद्यमों और छोटे व्यापारियों को लाभ पहुँचाएगी। इसके अतिरिक्त मध्यम व लघु उद्योगों के जीएसटी के लंबित भुगतान 30 दिनों के भीतर करने तथा भविष्य के भुगतान 60 दिनों के भीतर करने के सरकार के निर्णय से इस क्षेत्र में तेजी आएगी।

घर, वाहन व उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को प्रोत्साहन देने के लिये राष्ट्रीय आसावन बैंक द्वारा राष्ट्रीय आवासन वित्त निगम को 20 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी सहायता को बढ़ाकर 30 हजार करोड़ रुपये करना तथा गैर बैंकिंग वित्त कंपनियों व आवासन वित्त कंपनियों की 1 लाख करोड़ रुपए तक की पूल आस्तियों की खरीद हेतु आंशिक साख गारंटी योजना को प्रत्येक बैंक द्वारा उच्चतम स्तर पर निगरानी किए जाने का निर्णय किया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को गैर बैंकिंग वित्त कंपनियों की सहायक प्रणाली में मध्यम व लघु उद्योग, छोटे व्यापारियों, स्वयंसहायता समूहों तथा सूक्ष्म वित्त संस्थाओं के ग्राहकों के ऋण ग्राह्यों का त्वरित सहयोग करने को निर्देशित किया गया है।

सरकार के इन कदमों से घरेलू निवेशकों व उद्योग जगत निराशा से बचेगा और अर्थव्यवस्था की गति स्थिर बनी रहने की संभावना है। इसके लिए निम्न उपाय किए गए हैं:

  • केंद्रीय बजट 2019-20 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में और उदारीकरण
  • 25 प्रतिशत कर की निम्न कॉरपोरेट दर के लिए वार्षिक टर्नओवर सीमा को 250 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 400 करोड़ रुपए किया गया
  • विद्युत वाहनों की खरीद पर ऋण के ब्याज से 1.5 लाख रुपए अतिरिक्त आयकर कटौती और विद्युत वाहनों पर जीएसटी दर को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने के लिए जीएसटी परिषद में जाना
  • अवसंरचना विकास के बजट को प्रोत्साहन देते हुए अवसंरचना एवं राष्ट्रीय राजमार्ग कार्यक्रम के पुनर्गठन के द्वारा 100 लाख करोड़ रुपए के निवेश का प्रावधान
  • 1.5 करोड़ से कम वार्षिक टर्नओवर वाले छोटे दुकानदारों व खुदरा व्यापारियों के लिये 60 वर्ष की आयु के पश्चात 3000 रुपए मासिक की स्वैच्छिक पेंशन योजना का प्रारंभ
  • घरेलू विनिर्माण को अधिक प्रोत्साहन देने के लिये चयनित कच्चे माल व पूंजीगत माल पर सीमा शुल्क में कटौती
  • 6000 रुपए की वार्षिक प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का दायरा दो हेक्टेयर से कम भूमिधारकों से बढ़ाकर सभी किसानों के लिए करना

केंद्र सरकार के इन निर्णयों से अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने में भी सहायता मिल रही है और जनता को आर्थिक व वित्तीय संबल भी मिल रहा है, जिससे जनजीवन को मंदी के असर से बचाने में सफलता मिलेगी। रिजर्व बैंक द्वारा रेट में कटौती करके भी जनता को राहत देने का प्रयास किया गया है।

सरकार के इतने कदमों के बाद भी मंदी को लेकर भ्रम व भयावहता फैलाए जाने का ठोस आधार है भी या नहीं? यह समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि 2008-09 की वैश्विक महामंदी के समय की राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा अंतर है। मोदी सरकार की मौद्रिक नीतियों की सफलता से भारतीय बाजार का वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में प्रभाव व पैठ दोनों बढ़ा है तथा पश्चिमी देशों के उद्यमी उत्पाद से लेकर तकनीक तक भारतीय बाजारों में ला रहे हैं।

पिछले साढ़े पाँच वर्षों में तुलनात्मक रूप से महँगाई नहीं बढ़ी है और मुद्रास्फीति न केवल नियंत्रण में रही है, बल्कि वर्ष 2014-15 के 5.9 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2018-19 में केवल 3.4 प्रतिशत रह गई है। घरेलू मोर्चे पर आर्थिक वातावरण को उत्साहजनक बनाए रखने के लिए सरकार निरंतर कार्य कर रही है। इसके अंतर्गत अभी वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि सितम्बर और अक्टूबर में देशभर के 400 जिलों में बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और खुदरा ऋण लेने वालों की बैठकें होंगी और राष्ट्रीय बैंकिंग वित्त निगम को नकदी उपलब्ध कराकर खुदरा लेनदारों को ऋण दिया जाएगा। साथ ही निर्यात को प्रोत्साहन देने वालो सामानों पर आयात शुल्क में छूट, प्राथमिकता वाले क्षेत्र के अंतर्गत निर्यात ऋण के लिये 36 हजार करोड़ से 68 हजार करोड़ अतिरिक्त निर्गत किए जाएँगे।

घरेलू कंपनी के किसी प्रोत्साहन का लाभ नहीं लेने पर उसके लिए 22 प्रतिशत की दर से आयकर देने का प्रावधान किया गया है। यह विकल्प चुनने वाली कंपनियों को न्यूनतम वैकल्पिक कर भुगतान करने की बाध्यता भी समाप्त कर दी गई है। एक अक्टूबर, 2019 के बाद बनी नई घरेलू विनिर्माण कंपनियाँ बिना किसी प्रोत्साहन के 15 प्रतिशत की दर से आयकर भुगतान कर सकती हैं और यह लाभ उन कंपनियों को मिलेगा, जो किसी छूट या प्रोत्साहन को नहीं लेती हैं और 31 मार्च, 2023 से पहले उत्पादन प्रारंभ कर देती हैं। 

नई विनिर्माण कंपनियों के लिए सभी अधिशेषों व उपकर समेत प्रभावी दर 17.01 प्रतिशत कर दी गई है। जो कंपनियाँ छूट या प्रोत्साहन लेती हैं, उनके लिए न्यूनतम वैकल्पिक कर की वर्तमान दर भी 18.5 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दी गई है। कैपिटल गेन टैक्स से सरचार्ज भी हटा लिया गया है। 5 जुलाई 2019 से पूर्व शेयरों की पुनर्खरीद करने वाली कंपनियों पर कर नहीं लगेगा। 

इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा किफायती आवास योजना के अंतर्गत मकान खरीदने वालों को वित्त सुविधा उपलब्ध कराने के लिए वाह्य फाइनेंसिंग (ईसीबी) में ढील देने, 31 मार्च 2020 तक 45 लाख रुपए तक के मकान के ऋणों के ब्याज पर डेढ़ लाख रुपए की छूट देने, अटके पड़े किफायती व मध्यम वर्ग आवास परियोजना को पूरा करने के लिए पृथक निधि बनाकर 10 हजार करोड़ रुपये का योगदान देने के निर्णय से भवन निर्माण क्षेत्र में तेजी आने की संभावना है, जो मंदी के कारण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव से बचने का माध्यम बन सकता है। 

सरकार के इन उपायों से अर्थव्यवस्था में घरेलू व वैश्विक निवेशकों का विश्वास बना हुआ है। यह विश्वास मोदी सरकार की दीर्घकालिक व त्वरित आर्थिक नीतियों के सकारात्मक परिणामों के कारण बना है। जैसे कि देश का सामान्य सकल घरेलू उत्पाद 2013-14 में केवल 1.9 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर था, किंतु मोदी सरकार के आने के बाद चार सालों में 2018-19 तक आते-आते यह 42.10 प्रतिशत बढ़कर 2.7 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर हो गया। 

अर्थव्यवस्था की प्रगति की यह अभूतपूर्व गति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आने वाले पाँच सालों अर्थात 2024 तक 5 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुँचाने के संकल्प के फलीभूत होने का ठोस आधार प्रदान करती है। विश्व बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में भारत का स्थान 23 से सुधरकर 77वाँ हो गया और यह 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का होकर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का पूर्वाभास है। 

वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी के बावजूद भारत का विश्व में सबसे तेज विकास करने वाला देश बने रहना भी इस ओर संकेत करता है। ये अनेक संकेत यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मंदी को लेकर विपक्षी दलों द्वारा मचाया जा रहा हो-हल्ला तथ्य-आधारित कम और राजनीति-प्रेरित अधिक है।

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