Thursday, October 22, 2020
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35A उन्मूलन: 370 हटाने का वह ‘द्वार’, जिस पर ‘कश्मीरियत’ के जिहादी नेता दे रहे पहरा

35A के अनुसार इस देश के 'महामहिम' राष्ट्रपति भी कश्मीर में सूई की नोंक बराबर भूमि अपने नाम पर नहीं खरीद सकते हैं।

घाटी में 10,000 अतिरिक्त जवानों की तैनाती के साथ ही 35A के हटने को लेकर नए सिरे से अटकलबाज़ियाँ शुरू हो गई हैं। हालाँकि कुछ मीडिया रिपोर्टें सैन्य गतिविधि के आतंक से जुड़े होने का दावा कर रही हैं, लेकिन जानकारों की मानें तो नई सरकार के निर्वाचन के तुरंत बाद गृह मंत्री और सत्तारूढ़ भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह, और उसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल का कश्मीर दौरा संयोग नहीं है। और यह बात 35A के कश्मीरी खैरख्वाह भी जानते हैं, इसीलिए महबूबा मुफ़्ती की भाषा आग उगलने से आगे बढ़कर सीधी हिंसक हो गई है।

राष्ट्रपति भी नहीं ले सकते ‘एक इंच जमीन’…

संविधान के अनुच्छेद 35A की शब्दावली अपने आप में कम चिंताजनक नहीं है। लेकिन डान्टे (Dante) के काव्य ‘इन्फर्नो’ में जैसे नर्क के भी तल या परतें होती हैं, वैसे ही इसकी ‘चिंताजनक’ शब्दावली से भी ज़हरीला इस अनुच्छेद का इस्तेमाल है। जिहादी और उनके हिमायती इस अनुच्छेद का इस्तेमाल संविधान के दूसरे अनुच्छेद, अनुच्छेद 370 को हटने से रोकने के लिए करते हैं। अगर 35A न हो तो संभव है एक बार 370 के शांतिपूर्ण तरीके से हटने की परिस्थिति बनाई जा सकती है।

35A में जम्मू कश्मीर की राज्य सरकार और विधानसभा को यह ताकत मिली हुई है कि वह अपने नागरिक का ‘चुनाव’ करे- तय करे कि किसे वह ‘राज्य का नागरिक’ और माने किसे नहीं। अन्य राज्यों को यह ताकत नहीं है। पहली नज़र में यह महाराष्ट्र, तमिलनाडु या दिल्ली में दिखाए जा रहे बाहरी बनाम स्थानीय के क्षेत्रवाद से बहुत अलग नहीं लगता। हम रोज़ “मुंबई मराठों की”, “दिल्ली की नौकरियों कर कॉलेजों की सीटों पर पहला हक दिल्ली वालों का”, या जगन मोहन रेड्डी का “70% नौकरियाँ ‘हमारे लोगों’ को ही”, इत्यादि सुनते ही रहते हैं।

लेकिन अगर ठहर कर गौर किया जाए तो 35A की गंभीरता दिखने लगती है। हालाँकि हर राज्य में क्षेत्रवाद दबे-छिपे रूप में भाषाई आधार पर भेदभाव के लिए ही होता है, लेकिन जब यह अर्ध-अलगाववादी भावना कानून बनती है तो कमज़ोर पड़ जाती है। इसमें राज्य के जिन स्थाई निवासियों के अतिरिक्त कल्याण की बात होती है, वह स्थाई निवासी कोई भी व्यक्ति किसी भी राज्य में जा कर लम्बा समय बिताकर बन सकता है।

यानी जगन रेड्डी ने भले ही आरक्षण “राज्य के स्थाई निवासियों” की आड़ में तेलुगु-भाषियों के लिए शुरू किया हो, लेकिन अगर आप आंध्र में जाकर, एक दशक (या आंध्र विधानसभा की ‘मूल/स्थाई निवासी’ की परिभाषा के अनुसार जो भी न्यूनतम आवश्यक समय हो) का समय बिताकर, सरकारी नौकरी करते हुए या ज़मीन खरीदकर आंध्र के स्थाई निवासी बनना चाहें, तो कानून आपको नहीं रोकेगा- रोक ही नहीं सकता।

लेकिन यही अगर आप कश्मीर में 14 मई, 1954 के बाद रहने गए हों, या उसके पहले आपने वहाँ ज़मीन नहीं ले ली थी, तो आप वहाँ ज़मीन नहीं खरीद सकते, सरकारी नौकरी नहीं कर सकते, पंचायत या विधानसभा चुनाव में वोट नहीं कर सकते। आपके बच्चे जम्मू-कश्मीर सरकार के कॉलेजों में दाखिला नहीं ले सकते। आप क्या, 35A के अनुसार इस देश के ‘महामहिम’ राष्ट्रपति भी कश्मीर में सूई की नोंक बराबर भूमि अपने नाम पर नहीं खरीद सकते हैं।

आप जिस भी हालत में हों, कश्मीर सरकार के कोष से आपके लिए एक नया पैसा जारी नहीं हो सकता। इसके अलावा 35A के तहत स्थाई नागरिकों का दर्जा-प्राप्त लोगों को मिले उपरोक्त विशेष अधिकारों को राज्य के बाहर के लोग सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी इस आधार पर नहीं दे सकते कि यह संविधान-प्रदत्त कहीं भी बसने, कार्य करने, जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।

370 को कवच

केवल इतना ही नहीं, 35A हिन्दुस्तान की संसद को हिन्दुस्तान का हिस्सा होते हुए भी कश्मीर में सबसे बड़ी ताकत होने से रोकने वाले अनुच्छेद 370 के लिए ‘कवच’ का काम करता है। बकौल कश्मीरी पक्ष, 370 को हिन्दुस्तान के किसी ‘प्रेजिडेंशियल नोटिफिकेशन’ से नहीं हटाया जा सकता, भले ही यह 370 अपनी शब्दावली में खुद के अस्थाई होने की बात करता है।

तो हिन्दुस्तान की संसद की तरफ से 370 का हटाया जाना जिहादी मानसिकता वाले ‘अलगाववादी’ स्वीकार नहीं करेंगे, और अपनी तरफ से उसे हटने देने से रोकने के लिए 35A है। 35A से जिहादियों और उनके समर्थकों का बहुमत सुनिश्चित होता है-विधानसभा में सीटों की गिनती में, और घाटी के विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों की संख्या में।

अगर 35A हट जाए तो ऐसा हो सकता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति वाली कोई केंद्र सरकार वहाँ हिन्दुओं, सिखों और अन्य गैर मुस्लिमों की कॉलोनियों को पूरी सुरक्षा के साथ बसाकर जिहादियों से बहुमत छीन ले। फिर ऐसा सम्भव है कि विधानसभा 370 को खुद ही हटा दे और सही अर्थों में कश्मीर का हिन्दुस्तान में पूर्ण-विलय हो जाए। और इसी से रोकने के लिए 35A के पक्ष में ‘कश्मीरियत’ के तीनों गुट हार्डकोर जिहादी (लश्कर, जमाते-इस्लामी), ‘सॉफ़्ट’ जिहादी (हुर्रियत, आसिया अंद्राबी) और जिहादियों के हिमायती (अब्दुल्ला-मुफ़्ती खानदान, इंजीनियर रशीद) एक सुर में खड़े हैं।

अंबेडकर ने कहा गद्दारी, बिना संसद के आया 35A

वर्तमान ही नहीं, हर काल में राष्ट्रीय स्तर पर लगभग सभी देश के हितचिंतक नेताओं ने कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध किया है। अंबेडकर ने संविधान सभा के अध्यक्ष होते हुए भी 370 को लिखने वाली कलम चलाने से भी मना कर दिया, क्योंकि उनकी नज़र में यह मुल्क से गद्दारी थी। उसके बाद संविधान सभा से लेकर कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी तक हर जगह उसे ख़ारिज कर दिया गया। तब नेहरू ने विदेश में बैठे-बैठे सरदार पटेल को फोन किया और 370 पास कराने की अपील की। यह जानते हुए भी कि पटेल मनसा-वाचा-कर्मणा इस अनुच्छेद, और इसके पीछे के वृहद्तर ‘अभिप्राय’ मुस्लिम तुष्टिकरण के विपरीत ध्रुव पर खड़े थे। सरदार ने खून का घूँट पीकर संविधान सभा सत्र में इसे पास कराया

अगर 370 आपको संवैधानिक रूप से ‘अपवित्र’ लग रहा है, तो 35A आपके लिए ‘अधार्मिक’ होगा। यह संविधान का अनुच्छेद तो है, लेकिन इसे संसद से कभी भी पास ही नहीं किया गया है। यह राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा दिए गए एक ‘प्रेजिडेंशियल नोटिफिकेशन’ से लाया गया है। उसमें भी राजेंद्र प्रसाद ने पत्र लिखकर इस पर आपत्ति प्रधानमंत्री नेहरू से जताई थी, लेकिन पत्र के जवाब में नेहरू ने कहा कि वह इस बारे में ‘अनौपचारिक’ रूप से राजेंद्र प्रसाद को समझा देंगे। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद 28 फरवरी 1963 को राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु हो गई, 1964 में नेहरू की। कोई नहीं जानता कि उन्होंने कभी राजेंद्र प्रसाद को संसद को बाईपास कर, “लोकतंत्र की हत्या” कर संविधान में बदलाव करने का कारण समझाया या नहीं समझाया। लेकिन इसका दुष्प्रभाव हिन्दुस्तान आज भी झेल रहा है।

(अधिकाँश संभावित रूप से विवादास्पद तथ्यों के लिए संदर्भ की लिंक दे दी गई है। बाकी के लिए कश्मीरी हिन्दुओं के मानवाधिकार कार्यकर्ता सुशील पंडित के नीचे एम्बेड किए वीडियो और इस विषय पर उनके अन्य वक्तव्यों को देखें।)

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